Sansar डेली करंट अफेयर्स, 17 January 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 17 January 2020


GS Paper 2 Source: Indian Express

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UPSC Syllabus : Issues relating to development and management of Social Sector/Services relating to Health, Education, Human Resources.

Topic : Rare diseases

संदर्भ

भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 450 दुर्लभ रोगों के उपचार के लिए राष्ट्रीय नीति प्रकाशित कर दी है.

ज्ञातव्य है कि यह नीति 2017 में तैयार हुई थी और 2018 में एक समिति को इसकी समीक्षा करने को कहा गया था.

दुर्लभ रोग उपचार नीति के मुख्य अवयव

  • दुर्लभ रोगों की एक पंजी बनाई जायेगी जिसका संधारण भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (Indian Council of Medical Research ICMR) करेगी.
  • इस नीति के अनुसार, ये रोग दुर्लभ कहे जाएँगे – आनुवांशिक रोग, विरले कैंसर (rare cancers), संक्रामक ऊष्ण कटिबंधीय रोग, क्षयकारी रोग आदि.
  • इस राष्ट्रीय नीति के अनुसार, जो दुर्लभ रोग एक ही बार उपचार से ठीक हो सकता है उसके लिए उससे ग्रस्त रोगी को राष्ट्रीय आरोग्य निधि योजना से 15 लाख रु. दिए जाएँगे. यह लाभ केवल उस व्यक्ति को मिलेगा जो प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का लाभार्थी होगा.
  • दुर्लभ रोगों की तीन श्रेणियाँ बताई गई हैं –
  1. वह रोग जिसमें एक बार उपचार से लाभ हो जाता है, जैसे – अस्थि क्षय एवं प्रतिरोध में कमी वाले रोग आदि.
  2. वह रोग जिसमें लम्बे उपचार की आवश्यकता होती है, परन्तु इस पर खर्च कम होता है.
  3. वह रोग जिसका उपचार लम्बा चलता है पर साथ ही व्यय भी बहुत होता है.

दुर्लभ रोग क्या होता है?

  • दुर्लभ रोग अर्थात् अनाथ रोग (orphan disease) एक ऐसा रोग है जिससे बहुत कम लोग ग्रस्त होते हैं.
  • अधिकांश दुर्लभ रोग आनुवंशिक होते हैं और ये किसी व्यक्ति के पूरे जीवन तक चलते हैं, चाहे इसके लक्षण तुरंत न दिखें. जहाँ तक यूरोप की बात है तो वहाँ दुर्लभ रोग अथवा विकृति उस रोग अथवा विकृति को कहते हैं जिसकी चपेट में 2,000 नागरिकों में से एक से भी कम नागरिक आता है.
  • दुर्लभ रोगों में भाँति-भाँति के अनेक लक्षण होते हैं जो रोगानुसार बदलते रहते हैं.
  • यदि एक से अधिक रोगी किसी एक दुर्लभ रोग से ग्रस्त हैं तो भी उनमें अलग-अलग लक्षण हो सकते हैं. बहुत से लक्षण ऐसे होते हैं जो सामान्य लक्षण हैं अतः किसी दुर्लभ रोग के निदान में बहुधा भूल हो जाती है.
  • भारत में सबसे अधिक पाए जाने वाले दुर्लभ रोग हैं – हीमोफिलिया, थैलसीमिया, सिकल-सेल एनीमिया, बच्चों में प्राथमिक इम्युनो की कमी, ऑटो-इम्यून रोग, लाइसो सोमल स्टोरेज विकृतियाँ, जैसे – पोम्पे डिजीज, हिर्स्चप्रंग रोग, गौचर की बीमारी, सिस्टिक फाइब्रोसिस, हेमांगीओमास और कुछ प्रकार के मस्कुलर डिस्ट्रोफी.

समस्या और निदान

  • सरकार का यह कर्तव्य बनता है कि वह प्रत्येक नागरिक को स्वास्थ्य की देखभाल सम्बन्धी सुविधा दे.संविधान की धारा 21, 38 और 47 में भी इस बात का उल्लेख है.
  • जो रोग दुर्लभ हैं उनसे ग्रस्त रोगी भी दुर्लभ होते हैं. कहने का अभिप्राय यह है कि यदि कोई कम्पनी इनके लिए दवा बनाए तो उसे बहुत कम मात्रा में दवा बनानी होगी. इस कारण यह मुनाफे का सौदा नहीं है. अतः आवश्यकता है कि ऐसी दवा कंपनियों को आगे आने के लिए उत्प्रेरणा देकर प्रोत्साहित किया जाए.
  • दवा बनाने वाली कंपनियाँ कम मात्रा में बनी दवाइयों से अधिक से अधिक पैसा कमाना चाहेंगी और इसलिए इनका दाम बहुत ऊँचा रखना चाहेंगी. इसलिए यह आवश्यक होगा कि सरकार अनाप-शनाप मूल्य रखने से इन्हें रोकने के लिए एक विनियमन प्रणाली स्थापित करे.
  • यह सच है कि दुर्लभ रोग हजारों में एक को ही होता है परन्तु उस एक आदमी के जीवन का भी मोल होता है. अतः सरकार को चाहिए कि इस विषय में एक राष्ट्रीय नीति लेकर आये जिससे दुर्लभ रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों को देखभाल उपलब्ध हो सके.

चिंताएँ और चुनौतियाँ

स्वास्थ्य की देखभाल से सम्बंधित तंत्र के लिए दुर्लभ रोग बहुत बड़ी चुनौती होते हैं क्योंकि इनके लिए रोग प्रसार विषयक डाटा जमा करना कठिन होता है और फलस्वरूप यह पता लगाना कठिन हो जाता है कि इनसे ग्रस्त लोगों की संख्या क्या है, इनके उपचार में कितना खर्च आएगा और इनका समय पर और सही निदान कैसे किया जाए आदि.

दुर्लभ रोग के कुछ मामले गंभीर, दीर्घकालिक और जानलेवा हो सकते हैं. कुछ ऐसे भी मामले होते हैं कि किसी दुर्लभ रोग से ग्रस्त व्यक्ति, विशेषकर बच्चे अपाहिज भी हों.

2017 के एक प्रतिवेदन में बताया गया है कि आधे से अधिक दुर्लभ रोगग्रस्त व्यक्ति बच्चे होते हैं और ऐसे रोगों से मरने वाले 35% व्यक्ति एक वर्ष से कम की उम्र के होते हैं. इन रोगों से 10% मृत्यु उन लोगों की होती है जिनकी आयु 1 से 5 के बीच होती है. इसी प्रकार 12% मृत्यु 5-15 के आयु वर्ग के बच्चों की होती है.


GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Indian Constitution- historical underpinnings, evolution, features, amendments, significant provisions and basic structure.

Topic : Centre-state disputes and Article 131

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 131 (Article 131) के अंतर्गत नागरिकता संशोधन अधिनियम / Citizenship (Amendment) Act (CAA) को चुनौती देने वाली याचिका डालकर केरल ऐसा करने वाला पहला राज्य हो गया है.

दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ सरकार ने अनुच्छेद 131 के अंतर्गत ही सर्वोच्च न्यायालय में एक दूसरी याचिका दायर की है जिसमें राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी अधिनियम / National Investigation Agency (NIA) Act को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह अधिनियम विधि एवं व्यवस्था संधारण करने विषयक राज्य की शक्तियों का अतिक्रमण करता है.

अनुच्छेद 131 (Article 131) क्या है?

संविधान के अनुच्छेद 131 के अन्दर सर्वोच्च न्यायालय के पास यह मूल क्षेत्राधिकार है कि वह केंद्र और राज्य के बीच, केंद्र और एक राज्य तथा दूसरे राज्य के बीच एवं दो या अधिक राज्यों के बीच होने वाले किसी विवाद की सुनवाई कर सकता है.

सुनवाई के लिए शर्तें

  1. किसी विवाद की सुनवाई तभी हो सकती है जब यह राज्य और केंद्र के बीच का विवाद हो और इसमें किसी ऐसे कानून अथवा तथ्य का मामला हो जिसपर राज्य अथवा केंद्र के किसी कानूनी अधिकार का अस्तित्व निर्भर करता हो.
  2. 1978 में कर्नाटक राज्य बनाम भारतीय संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश पी.एन. भगवती ने यह व्यवस्था दी थी कि सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 131 के अंतर्गत कोई याचिका यदि सुनवाई के लिए स्वीकार करता है तो राज्य के लिए यह दर्शाना आवश्यक नहीं है कि उसके किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन हुआ है, यदि विवाद में मात्र कानूनी प्रश्न निहित हो तो भी सर्वोच्च न्यायालय ऐसी याचिका हाथ में ले सकता है.
  3. अनुच्छेद 131 का उपयोग राज्य और केंद्र सरकारों के बीच राजनीतिक मतभेदों को सुलझाने के लिए नहीं किया जा सकता.

सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार के प्रकार

  1. मूल क्षेत्राधिकार (original jurisdiction) – अनुच्छेद 131 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय किसी मामले की सुनवाई प्रत्यक्ष रूप से कर सकती है अर्थात् जो मामला अपील के रूप में सर्वोच्च न्यायालय के पास नहीं आया हो और जिसकी सुनवाई प्रथमतः सर्वोच्च न्यायायलय ही कर रहा हो.
  2. अपीलीय क्षेत्राधिकार (appellate jurisdiction) – अनुच्छेद 133-136 के अंतर्गत उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील होती है.
  3. परामर्शी क्षेत्राधिकार (advisory jurisdiction) – संविधान के अनुच्छेद 143 के अन्दर राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह सर्वोच्च न्यायालय से किसी विषय पर परामर्श प्राप्त करे.

GS Paper 3 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Cyber security related issues.

Topic : Juice jacking

संदर्भ

अभी पिछले दिनों ही भारतीय स्टेट बैंक ने अपने ट्विटर हैंडल से जूस जैकिंग (juice jacking) के विषय में एक सार्वजनिक चेतावनी निर्गत की है. इसमें ग्राहकों और जनसामान्य को परामर्श दिया गया है कि वे सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशनों पर अपना मोबाइल चार्ज करने के लिए नहीं लगायें अन्यथा हैकरगण उनके स्मार्ट फ़ोन में एक मैलवेयर डालकर भाँति-भाँति के जालसाजियों को अंजाम दे सकते हैं.

जूस जैकिंग क्या है और यह कैसे काम करता है?

  • जूस जैकिंग एक प्रकार साइबर आक्रमण है जो तब किया जाता है जब चार्ज करने वाला पोर्ट डाटा कनेक्शन का भी काम करता है, विशेषकर USB के ऊपर.
  • इसमें या तो मोबाइल में मैलवेयर डाल दिया जाता है अथवा गुप्त रूप से किसी स्मार्टफोन, टेबलेट या कंप्यूटर से संवेदनशील डाटा चुरा लिया जाता है.
  • इस प्रकार के साइबर आक्रमण की पहली सूचना ब्रायन क्रेब्स नामक शोधकर्ता ने दी थी और उसी ने जूस जैकिंग यह नाम गढ़ा था.
  • हवाई अड्डों, रेल स्टेशनों, होटलों, कैफ़े इत्यादि में कहीं-कहीं चार्जिंग स्टेशन लगे होते हैं. साइबर अपराधी इन चार्जिंग स्टेशनों में पहले से हेरा-फेरी करके रख सकते हैं. यदि कोई ग्राहक इस प्रकार के स्टेशन में अपना मोबाइल चार्ज करता है तो हैकरों को उनके बारे में बहुत-सारी गुप्त-जानकारियाँ मिल जाती हैं.
  • चार्जिंग पोर्ट में हैकर मैलवेयर डालकर यूजर डाटा को खाली कर सकते हैं. फ़ोन में अंकित व्यक्तिगत डाटा तक पहुँच के लिए वह फिरौती माँग सकता है और साथ ही व्यक्तिगत और वित्तीय खाते को हाईजैक कर सकता है.

इस समस्या का समाधान कैसे होगा?

जूस जैकिंग से बचने के लिए ग्राहक को निम्नलिखित सावधानियां बरतनी होंगी –

  1. सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन से बचना चाहिए. ऐसे स्टेशन असुरक्षित होते हैं और इनकी निगरानी बहुधा नहीं हो पाती. इसलिए हैकरों के लिए ये आसान शिकार होते हैं.
  2. सदा अपना ही AC चार्जिंग एडाप्टर और केबल प्रयोग में लाना चाहिए.
  3. अपने मोबाइल को AC वॉल सॉकेट में ही लगाना चाहिए, न कि USB वॉल सॉकेट में.
  4. किसी अनजान व्यक्ति के लैपटॉप या पी.सी. से अपने किसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को चार्ज नहीं किया करें.
  5. यदि कोई आकस्मिक परिस्थिति हुई तो अपने डिवाइस के लिए एक अभिप्रमाणित पॉवर बैंक खरीद कर रखना चाहिए.
  6. एक ऐसे केबल का प्रयोग करने की चेष्टा की जाए जो किसी डाटा केबल के रूप में नहीं अपितु मात्र चार्जिंग केबल के रूप में कार्य करे.
  7. जो लोग बहुत अधिक घूमते हैं, उनको चाहिए कि वे एक USB ब्लॉकर को व्यवहार में लाएँ.

GS Paper 3 Source: Indian Express

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UPSC Syllabus : Awareness in the fields of IT, Space, Computers, robotics, nano-technology, bio-technology and issues relating to intellectual property rights.

Topic : ‘Virtual human’ NEONs

संदर्भ

सैमसंग कम्पनी की संस्था स्टार लैब्स ने कृत्रिम मनुष्य के निर्माण की परियोजना हाथ में ली है जिसके लिए कृत्रिम मनुष्य का नाम NEON रखा गया है. कहा जाता है कि ये विश्व के पहले कृत्रिम मनुष्य होंगे.

NEON क्या हैं?

  • NEON वे आभासी मनुष्य (virtual human) हैं जो कंप्यूटर से सृजित किये गये हैं.
  • NEON शब्द दो शब्दों को मिलाकर बना है = NEO (new)+human
  • आज की तिथि में ये आभासी मनुष्य भावनाओं का प्रदर्शन कर सकते हैं, परन्तु इसके लिए उनको हाथ से नियंत्रित करना आवश्यक होगा.
  • भविष्य में इनको इतना बुद्धिमान बनाने का लक्ष्य है कि वे पूरी तरह से स्वचालित हो जाएँ और न केवल भावनाएं ही दिखाएँ, अपितु कौशल अर्जित कर सकें और स्मृतियाँ संचित कर सकें.

NEON की तकनीक क्या है?

इन आभासी मनुष्यों के पीछे दो मूलभूत तकनीकें हैं –

  1. पहली, CORE R3 तकनीक जो किसी नियोन की वास्तविकता रियल-टाइम और प्रतिक्रियात्मकता के पहलुओं के लिए जिम्मेदार होती है.
  2. अगले चरण की दूसरी तकनीक का नाम SPECTRA है जो CORE R3 द्वारा सृजित बुद्धि, ज्ञान, भावना और स्मृति से एक कदम आगे बढ़कर नियोन को अधिक सक्षम बनाती है.

NEON का उपयोग

  • NEON बैंक में आपके प्रश्नों का उत्तर देंगे, किसी रेस्त्राँ में आपका स्वागत करेंगे अथवा रात-बिरात टेलीविज़न में कोई नया समाचार पढेंगे.
  • NEON का और भी प्रभावकारी उपयोग संभव है. उदाहरण के लिए भाषाओं को पढ़ाने में ये सहायक सिद्ध हो सकते हैं.

नियोन आभासी सहायकों (Virtual Assistants) से अलग कैसे हैं?

आभासी सहायक उसी डाटा से सीखते हैं जो उनके अन्दर प्लग किया गया है. दूसरी ओर, नियोन जो जानते हैं और जो सीखते हैं वहीं तक सीमित हैं. NEON व्यक्ति-विशेष अथवा उसके मित्रवर्ग के लिए काम करेंगे. उनसे किसी गाने के लिए अनुरोध नहीं किया जा सकता है परन्तु उनसे कोई मित्रवत बात कर सकता है और अपने अनुभवों को साझा साझा कर सकता है.उनसे साझा कर सकता है.


GS Paper 3 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Conservation, environmental pollution and degradation, environmental impact assessment.

Topic : Centre eases CRZ rules for ‘Blue Flag’ beaches

संदर्भ

भारत सरकार ने ब्लू फ्लैग समुद्र तटों से सम्बंधित CRZ के नियमों में ढील दी है जिससे कि राज्यों को अवसंरचना के निर्माण और ब्लू फ्लैग प्रमाणपत्र प्राप्त करने में सहायता मिले.

ब्लू फ्लैग कार्यक्रम क्या है?

  • बीचों के लिए अभिकल्पित ब्लू फ्लैग कार्यक्रम का संचालन डेनमार्क के कोपेनहेगन में स्थित “Foundation for Environmental Education (FEE)” नामक एक अंतर्राष्ट्रीय, गैर-सरकारी और लाभ-रहित संगठन करता है.
  • इसका आरम्भ सबसे पहले 1985 में फ़्रांस में हुआ था. 1987 में जाकर यह कार्यक्रम यूरोप में लागू हुआ और फिर जब इसमें दक्षिण अफ्रीका शामिल हुआ तो 2001 के पश्चात् यह कार्यक्रम यूरोप के बाहर भी कार्यशील हो गया.
  • जापान और दक्षिण कोरियापूर्व एशिया के एकमात्र ऐसे देश हैं जहाँ ब्लू फ्लैग बीच अस्तित्व में है.
  • 566 बीचों के साथस्पेन ब्लू फ्लैग प्रमाणपत्र के मामले में शीर्षस्थ देश है.
  • स्पेन के बादग्रीस और फ़्रांस का स्थान आता है जहाँ क्रमशः 515 और 395 ऐसे बीच हैं जिन्हें ब्लू फ्लैग प्रमाणपत्र मिला हुआ है.

ब्लू फ्लैग के लिए आवश्यक मानदंड

ब्लू फ्लैग का प्रमाणपत्र लेने के लिए किसी भी बीच में लगभग 33 विशेष गुण होने चाहिएँ. इनमें से मुख्य हैं – ग्रे वाटर के उपचार हेतु संयंत्र, चलंत शौचालय, सौर ऊर्जा संयंत्र, बैठने की सुविधा, CCTV, जल की गुणवत्ता के विशेष मानकों का पूरा होना, कचरा-प्रबंधन की सुविधा, दिव्यांगो के लिए अनुकूल परिवेश होना, प्राथमिक चिकित्सा का प्रबंध, बीच से पालतू पशुओं को दूर रखना. इन मानदंडों में कुछ स्वैच्छिक हैं और कुछ अनिवार्य हैं. परन्तु CRZ कानून यह कहता है कि समुद्र तट और द्वीपों में इस प्रकार का निर्माण-कार्य नहीं करने दिया जाता है.

ब्लू फ्लैग के लिए भारत में चुने गये समुद्र तट

  • भारत के 13 तटों को ब्लू फ्लैग के रूप में अभिप्रमाणन के लिए चुना गया है. इनमें से प्रमुख हैं – घोघला बीच (दिउ), शिवराजपुर बीच (गुजरात), भोगवे (महाराष्ट्र), पदुबिद्री और कसरकोड बीच (कर्नाटक), कप्पड़ बीच (केरल) आदि.
  • ओडिशा के कोणार्क के समीप स्थित चंद्रभागा बीच वह पहला बीच है जिसके लिए टैग अभिप्रमाणन प्रक्रिया पूरी कर ली गई और जो ब्लू फ्लैग पाने वाला एशिया का पहला बीच होने जा रहा है.

Prelims Vishesh

Yada Yada virus :-

  • ऑस्ट्रेलिया के मच्छरों में पिछले दिनों याडा-याडा नामक वायरस की खोज की गई है.
  • यह वायरस चिकुनगुनिया और एस्टर्न एक्विन नामक कपाल-ज्वर (encephalitis) की तरह एक अल्फ़ावायरस है. परन्तु याडा-याडा मनुष्यों के लिए खतरा नहीं है क्योंकि यह उन वायरसों में से है जो केवल मच्छरों को संक्रमित करते हैं.
  • इस प्रकार के अन्य वायरस हैं – ताई फारेस्ट अल्फावायरस, एगुआ सलूद अल्फावायरस आदि.

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