Sansar डेली करंट अफेयर्स, 17 February 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 17 February 2020


GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Statutory, regulatory and various quasi-judicial bodies. Mechanisms, laws, institutions and bodies constituted for the protection and betterment of these vulnerable sections.

Topic : Tribes of Tripura

संदर्भ

त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद् (Tripura Tribal Areas Autonomous District Council – TTAADC) ने मिजो, काइपेंग और मालसोम जनजातियों के पारम्परिक कानूनों की संहिता बनाने के लिए संकल्प पारित किया है.

त्रिपुरा में रहने वाली अन्य जनजातियाँ

  • भील
  • भूटिया
  • चैमल
  • चकमा
  • गारो
  • हलाम
  • जमतिया
  • काशिया
  • कूकी
  • लेपचा
  • लुशाई
  • मॉग
  • मुंडा
  • नौतिया
  • ओरंग
  • रियांग

स्वायत्त जिला परिषद् क्या हैं?

संविधान की छठी अनुसूची के अनुसार, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में जनजातीय क्षेत्र हैं जो तकनीकी रूप से अनुसूचित क्षेत्रों से अलग होते हैं. यद्यपि ये क्षेत्र राज्य के कार्यकारी अधिकार क्षेत्र में आते हैं, परन्तु कतिपय विधायी एवं न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करने के लिए इनमें जिला परिषदों एवं क्षेत्रीय परिषदों का प्रावधान किया गया है. प्रत्येक जिला एक स्वायत्त जिला होता है और राज्यपाल अधिसूचना निर्गत कर के इन जनजातीय क्षेत्रों की सीमाओं में परिवर्तन कर सकता है अथवा उन्हें विभाजित कर सकता है.

अपनी अधिसूचना के माध्यम से राज्यपाल निम्नलिखित काम कर सकता है –

  1. कोई भी क्षेत्र सम्मिलित कर सकता है
  2. कोई भी क्षेत्र को भारत कर सकता है
  3. नया स्वायत्त जिला बना सकता है
  4. स्वायत्त जिले का क्षेत्र बढ़ा सकता है
  5. स्वायत्त जिले का क्षेत्र घटा सकता है
  6. स्वायत्त जिले का नाम बदल सकता है
  7. किसी स्वायत्त जिले की सीमाओं को परिभाषित कर सकता है

जिला परिषदों एवं क्षेत्रीय परिषदों की बनावट

  1. जिला परिषद् में अधिक से अधिक 30 सदस्य होंगे जिनमें अधिकतम चार व्यक्ति को राज्यपाल नामित करेगा और शेष वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाएँगे.
  2. स्वायत्त क्षेत्र के रूप में सृजित प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक अलग क्षेत्रीय परिषद् होगी.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Government policies and interventions for development in various sectors and issues arising out of their design and implementation.

Topic : Major Port Authority Bill, 2020

संदर्भ

देश के बड़े-बड़े बंदरगाहों के प्रशासन के लिए 1963 में बने कानून के स्थान पर भारत सरकार एक नया कानून लाने पर विचार कर रही है. इस उद्देश्य से एक बृहद पत्तन प्राधिकरण विधेयक का प्रारूप तैयार हुआ है जिसे मंत्रिमंडल ने अपना अनुमोदन दे दिया है.

पृष्ठभूमि

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि अभी बड़े-बड़े पत्तनों का प्रशासन 1963 के पत्तन कानूनों के अंतर्गत होता है. अचल संपत्तियों के सृजन की दिशा में इन पत्तनों में अपेक्षित स्तर का काम नहीं हुआ है और बृहद पत्तन टैरिफ प्राधिकरण (Tariff Authority for Major Ports – TAMP) के पुराने विनियमों के कारण ढुलाई की लागत में भी उछाल देखा गया है.

बृहद पत्तन प्राधिकरण विधेयक में दिए गये प्रस्ताव

  1. प्रस्तावित कानून का उद्देश्य पत्तनों की समग्र कार्यकुशलता में बढ़ोतरी करना है.
  2. अब बड़े-बड़े बन्दरगाह पत्तन से जुड़ी विभिन्न सेवाओं के लिए टैरिफ निर्धारित कर सकेंगे तथा साथ ही उनके साथ काम करने को इच्छुक निजी निर्माताओं के लिए शर्तें रख सकेंगे.
  3. प्रत्येक बंदरगाह का प्रशासन एक पत्तन प्राधिकरण करेगा जिसे विभिन्न पत्तन सेवाओं के लिए टैरिफ निश्चित करने की शक्ति होगी.
  4. विधेयक के अनुसार पत्तन प्राधिकरण के निर्णयों की समीक्षा के लिए सर्वोच्च स्तर पर एक न्याय निर्णय करने वाले बोर्ड का गठन होगा जिसके पास पत्तन प्राधिकरणों तथा PPP ऑपरेटरों के बीच उठने वाले विवादों को सुलझाने की शक्ति होगी.

भारत के बड़े बंदरगाह कौन से हैं?

वर्तमान में भारत में ये 12 बड़े बंदरगाह हैं – दीनदयाल (पुराना नाम कांडला), मुंबई, जेएनपीटी, मोरमुगाँव, न्यू मंगलौर, कोचीन, चेन्नई, कामराजार (पहले एन्नोर), वीओ चिदंबरनार, विशाखापट्टनम, पारादीप और कोलकाता (हल्दिया सहित).


GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Salient features of the Representation of People’s Act.

Topic : Voting Rights of Prisoners

संदर्भ

दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिछले दिनों एक याचिका निरस्त कर दी जिसमें बंदियों को मताधिकार देने की माँग की गई थी.

न्यायालय की टिप्पणियाँ

  • मताधिकार कोई मौलिक अधिकार अथवा एक साधारण कानूनी अधिकार नहीं है और इसका प्रावधान विधान (statute) के द्वारा ही किया जाता है.
  • इससे सम्बंधित विधान है – जनप्रतिनिधित्व अधिनियम. इस अधिनियम पर भी कानून द्वारा निर्देशित प्रतिबंध लागू होते हैं. ज्ञातव्य है कि यह बंदियों को कारावास से मत डालने की अनुमति नहीं देता.

कौन मत दे सकता है और कौन नहीं?

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुभाग 62(5) स्पष्टतः कहता है कि यदि कोई व्यक्ति पुलिस संरक्षा में है या न्यायालय से सजा पाकर कारावास भुगत रहा है तो वह मत नहीं डाल सकता है. विचाराधीन बंदी को भी ऐसा करने का अधिकार नहीं है चाहे उसका नाम चुनाव पंजी में हो भी तो. केवल वही व्यक्ति डाक से मतदान कर सकता है जिसे किसी कारण निवारक कारण (preventive detention) से बंदी बनाया गया हो.

विचाराधीन व्यक्तियों को मताधिकार देने के लिए याचिका में दिया गया तर्क

  1. बंदियों पर लगाया गया वर्तमान प्रतिबंध यह नहीं देखता कि सम्बंधित बंदी का अपराध कितना बड़ा है या उसे दिया गया कारावास कितना लम्बा है. साथ ही इसमें सभी बंदियों को शामिल कर लिया गया है चाहे वह दण्डित बंदी हो, उस पर मुकदमा अभी चल ही रहा हो और जो पुलिस की संरक्षा में हो. तात्पर्य यह है कि सभी बंदियों को एक ही लाठी हाँक दिया जाता है.
  2. जब तक कानून किसी का दोष सिद्ध नहीं कर देता तब तक वह निरपराध ही माना जाना चाहिए. फिर भी एक ओर जहाँ उस व्यक्ति को मताधिकार नहीं दिया जाता है जिसपर मुकदमा चल रहा है, वहीं दूसरी ओर निवारक कारणों से बंदी बनाए गये व्यक्ति को मत देना का अधिकार है.
  3. इस प्रकार यहाँ पर संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत दिए गये समानता के अधिकार का हनन हो रहा है. यह प्रतिबंध निरंकुश है न कि तार्किक.

विश्व में बंदियों के मताधिकार से सम्बंधित कानून क्या हैं?

  • यूरोप महादेश के अन्दर कुछ देशों में बंदियों को मत देने का अधिकार है, जैसे – स्विट्जरलैंड, फिनलैंड, नॉर्वे, डेनमार्क, आयरलैंड, बाल्टिक राज्य और स्पेन.
  • यूरोप के कुछ अन्य देशों में मध्यम मार्ग अपनाते हुए बंदी के कारावास दंड की मात्रा आदि को ध्यान में रखकर बंदियों को सशर्त मतदाधिकार दिया जाता है, जैसे – रोमानिया, आइसलैंड, नीदरलैंड, स्लोवाकिया, लक्जमबर्ग, साइप्रस और जर्मनी.
  • इन देशों में गंभीर अपराध के लिए दिए गये दंड में मतदान का अधिकार निरस्त करने का भी आदेश दिया जाता है. बल्गेरिया में दस वर्ष से कम की सजा पाने वाले व्यक्ति को मत डालने दिया जाता है. ऑस्ट्रेलिया में पाँच वर्ष से कम की सजा वालों को मताधिकार मिला हुआ है.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Government policies and interventions for development in various sectors and issues arising out of their design and implementation.

Topic : Vivad Se Vishwas scheme

संदर्भ

फ़रवरी 1, 2020 को बजट प्रस्तुत करते समय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विवाद से विश्वास नामक एक योजना की घोषणा की जिसका उद्देश्य प्रत्यक्ष कर के लंबित असंख्य मामलों का निपटारा करना है.

उल्लेखनीय है कि वर्तमान में कई अपीलीय मंचों में प्रत्यक्ष कर से जुड़े 483,000 मामले अ निष्पादित पड़े हैं. सरकार की इस योजना से आशा की जाती है कि अब ये मामले शीघ्र ही निष्पादित हो जाएँगे.

विवाद से विश्वास योजना के मुख्य तथ्य

  • यह एक माफ़ी योजना है जो उन विवादों से सम्बंधित है जो आय कर अपीलीय ट्रिब्यूनल (Income Tax Appellate Tribunals – ITAT), उच्च न्यायालयों, सर्वोच्च न्यायालय तथा अंतर्राष्ट्रीय पंचाटों में लंबित चले आ रहे हैं.
  • विवाद से विश्वास योजना के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति मार्च 31 तक अपने लंबित करों का भुगतान कर देता है तो उसको पूर्ण रूप से ब्याज और दंड से मुक्ति मिल जायेगी.
  • इस योजना का उद्देश्य उन करदाताओं को लाभ पहुँचाना है जिनके मामले अनेक मंचों पर फँसे पड़े हैं.
  • यदि करदाता मार्च 31 तक प्रत्यक्ष करों का भुगतान नहीं कर पायेगा तो उसको फिर जून 30 तक का समय दिया जाएगा. परन्तु इसके लिए उसे 10% अधिक कर देना होगा.
  • यदि मात्र ब्याज और दंड पर विवाद है तो करदाता को विवादित राशि का 25% मार्च 31 तक भुगतान करना पड़ेगा और उसके बाद 30% का भुगतान करना होगा.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Statutory organisations.

Topic : Debts Recovery Tribunals

संदर्भ

सरकार ने निर्णय किया है कि विवाद से विश्वास विधेयक, 2020 (The Direct Tax Vivaad se Vishwas Bill, 2020) में उन मुकदमों को भी सम्मिलित किया जाएगा ऋण वसूली न्यायाधिकरणों (debt recovery tribunals – DRTs)  में चल रहे हैं.

ऋण वसूली न्यायाधिकरण – DRT क्या है?

  • ऋण वसूली न्यायाधिकरणों की स्थापना बैंकों और अन्य वित्त संस्थानों के ग्राहकों से ऋण की वसूली करने के लिए की गई थी. इन न्यायाधिकरणों की स्थापना बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं को देय ऋण वसूली अधिनियम, 1993 (Recovery of Debts due to Banks and Financial Institutions Act – RDBBFI,1993) के अंतर्गत हुई थी.
  • DRT के द्वारा पारित किसी आदेश के विरुद्ध अपील ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण (Debts Recovery Appellate Tribunal – DRATके पास की जा सकती है.
  • DRT का अध्यक्ष केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक ऐसा अधिकारी होता है जो जिला जज बनने की योग्यता रखता हो.
  • इसका कार्यकाल 5 वर्ष अथवा 62 वर्ष की उम्र तक होता है.
  • उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के अतिरिक्त देश का कोई भी न्यायालय इस न्यायाधिकरण द्वारा विचारित मामले पर क्षेत्राधिकार नहीं रखता है.

ऋण वसूली न्यायाधिकरण – DRT की शक्तियां एवं कार्य

  • DRT का काम 1993 के RDDBFI, 1993 अधिनियम (Recovery of Debts Due to Banks and Financial Institutions) तथा साथ ही SARFAESI अधिनियम, 2002 (Securitization and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interests) के प्रावधानों को लागू करना है.
  • DRT को व्यापक आदेश पारित करने की पूरी शक्ति मिली हुई है और यह पूर्ण न्याय के लिए व्यवहार प्रक्रिया संहिता से भी आगे जा सकता है. यह क्रॉस सूट एवं विरोधी दावों की भी सुनवाई कर सकता है और सेट ऑफ़ की अनुमति भी दे सकता है.
  • परन्तु DRT (Debts Recovery Tribunal) ऋण दाताओं की ओर से दिए गये क्षति के दावों पर विचार नहीं कर सकता है. साथ ही यह ऋणदाताओं के द्वारा उपलब्ध कराई गई सेवाओं की कमियों अथवा संविदा उल्लंघन अथवा आपराधिक उपेक्षा से सम्बंधित मामलों को हाथ में नहीं ले सकता है. इसके अतिरिक्त ऋण वसूली न्यायाधिकरण न तो लंबित सूची के आगे जा सकता है और न ही अपने क्षेत्राधिकार के बाहर जाकर कोई मन्तव्य व्यक्त कर सकता है.
  • Debts Recovery Tribunal (DRT) अपने कार्यों के निष्पादन के लिए रिसीवर और आयुक्त नियुक्त कर सकता है तथा एकपक्षीय एवं अंतरिम आदेश पारित कर सकता है. साथ ही उसे अपने निर्णयों की समीक्षा करने का तथा ट्रिब्यूनल के रिकवरी अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों के विरुद्ध अपील सुनने का भी अधिकार है.

DRT में कैसे मामले विचारित होते हैं?

DRT  में ऋण वसूली के लिए बैंकों आदि के द्वारा आवेदन दिया जाता है. 2018 में केंद्र सरकार द्वारा ऋण वसूली न्यायाधिकरणों (Debts Recovery Tribunals – DRT) के पास ऋण वसूली के लिए बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा जमा किये गये आवेदन हेतु वित्त की सीमा दस लाख रु. से बढ़ाकर बीस लाख रु. कर दी गई.

दरअसल, देश भर के 39 ऋण वसूली न्यायाधिकरणों के पास लंबित मामलों की संख्या घटाने के लिए यह कदम उठाया गया था. यदि अब बाकी रह गये कर्ज की राशि 20 लाख रु. से कम है तो कोई बैंक अथवा वित्तीय संस्था DRT में मामला दर्ज नहीं कर पायेगा.


Prelims Vishesh

Central Administrative Tribunal :-

  • संविधान के 42वें संशोधन के द्वारा संविधान में अनुच्छेद 323A की प्रविष्टि की गई थी. इसे देखते हुए 1985 में प्रशासनिक ट्रिब्यूनल अधिनियम पारित हुआ था. इसके तहत गठित केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण का कार्य लोक सेवाओं और पदों में नियुक्ति तथा सेवा शर्तों से जुड़े विवादों का निष्पादन करना है.
  • इसमें एक अध्यक्ष और 65 सदस्य होते हैं. सदस्यों में 33 न्यायिक क्षेत्र से (अध्यक्ष सहित) और 33 प्रशासनिक क्षेत्र से आते हैं.
  • सामान्यतः अध्यक्ष किसी उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होता है.

Assam is proposing a census of indigenous Muslim groups :

  • असम के अल्पसंख्यक कल्याण एवं विकास विभाग ने निश्चय किया है कि वह असमिया मुसलमान के नाम से जाने जाने वाले चार समुदायों की जनगणना करेगा. ये समुदाय हैं – गोरिया, मोरिया, देशी और जुल्हा.
  • ज्ञातव्य है कि असम की 3.3 करोड़ की जनसंख्या में इन समुदायों की संख्या लगभग 16 लाख है.

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