Sansar डेली करंट अफेयर्स, 16 August 2019

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Sansar Daily Current Affairs, 16 August 2019


GS Paper 1 Source: Indian Express

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UPSC Syllabus : History of the world.

Topic : What happened during Gulf War? How was India involved?

संदर्भ

खाड़ी युद्ध (Gulf War) की समाप्ति के 28 वर्ष के पश्चात् इराक ने पिछले दिनों 48 कुवैतियों के अवशेष लौटा दिए हैं.

खाड़ी युद्ध क्या था?

कुवैत को अपना 19वाँ प्रांत मानते हुए इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने उस देश पर आक्रमण कर दिया है. इसके लिए उसे संयुक्त राष्ट्र से चेतावनी दी गई थी पर वह नहीं माना. इस पर अमेरिका और उसके साथी देशों ने इराक से युद्ध छेड़ दिया था. इसी युद्ध को खाड़ी युद्ध कहा जाता है जो अगस्त 1990 से लेकर फरवरी 1991 तक चला था.

खाड़ी युद्ध में क्या हुआ था?

  1. सर्वप्रथम इराक ने अगस्त 2, 1990 को पड़ोसी देश कुवैत पर कब्ज़ा कर लिया. विदित हो कि कुवैत इराक के दक्षिण-पूर्व में स्थित है और यह इराक की तुलना में 25 गुना छोटा है. सद्दाम हुसैन का दावा था कि कुवैत इराक का अंग है. परन्तु वास्तव में उसने इसलिए आक्रमण किया था कि वह कुवैत के तेल भंडार पर कब्ज़ा जमा सके और साथ ही इराक पर कुवैत का जो विशाल बकाया था उसको रद्द कर सके.
  2. हुसैन ने अपने आक्रमण को फिलिस्तीनी संघर्ष से भी जोड़ने की चेष्टा की थी.
  3. इराक की कार्रवाई के लिए संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् (United Nations Security Council) ने कड़ी निंदा की और यह चेतावनी दी कि जनवरी 15, 1991 तक इराक अपनी सेनाएँ वापस नहीं लेता तो उसके विरुद्ध सैन्य कार्रवाई की जायेगी.
  4. सद्दाम हुसैन संयुक्त राष्ट्र की कई चेतावनियों को अनसुना कर दिया तो अमेरिका के नेतृत्व में 35 देशों के 7 लाख सैनिकों का एक संयुक्त गठबंधन सऊदी अरब में जमा हुआ. ज्ञातव्य है कि हुसैन की आक्रामक कार्रवाई से सऊदी अरब को भी खतरा अनुभव हो रहा था.
  5. जब इराक ने जनवरी 15 की अंतिम तिथि तक वापसी की कार्रवाई नहीं की तो संयुक्त सेनाओं ने ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म (Operation Desert Storm) चलाकर इराक की हवाई रक्षा प्रणाली, तेल शोधक कारखानों और मुख्य अवसंरचनाओं को नष्ट कर दिया. उसके बाद जमीन पर कुवैत को स्वतंत्र कराने के लिए एक अलग ऑपरेशन चला जिसका नाम ऑपरेशन डेजर्ट सैबर (Operation Desert Sabre) था.
  6. अंततः यह युद्ध फ़रवरी 28, 1991 को समाप्त हो गया.

युद्ध के प्रति भारत की नीति  

जब खाड़ी युद्ध आरम्भ हुआ तो उस समय भारत सरकार ने युद्ध के प्रति तटस्थता की नीति अपनाई. किन्तु उसने इराक की इस माँग को निरस्त कर दिया कि वह जो कार्रवाई कर रहा है वह फिलिस्तीनी संघर्ष के संदर्भ में की गई है. अगस्त 13 से लेकर अक्टूबर 20, 1990 तक भारत ने युद्धग्रस्त कुवैत से 1,75,000 से अधिक नागरिकों को खाली कराया. यह अपने प्रकार की भारत की सबसे बड़ी कार्रवाई थी. खाली कराने का काम नागरिक वायुयानों से किया गया था. गिनिस बुक में इस कार्रवाई को हवाई मार्ग से खाली कराये जाने वाले नागरिकों की सबसे बड़ी संख्या के रूप में अंकित किया गया. 2016 में “एयरलिफ्ट” नामक एक हिंदी फिल्म आई थी जिसमें इस घटना को फिल्माया गया था.

1990 में जब पश्चिमी एशिया में खाड़ी युद्ध हुआ था तो उस समय भारत के समक्ष खनिज तेल को लेकर एक बहुत बड़ा संकट आ गया था. उस समय भारत के पास बस इतना ही तेल बचा हुआ था जिससे मात्र तीन दिन काम चलाया जा सकता था. उस समय तो किसी प्रकार से संकट टल गया था परन्तु आज भी इस प्रकार के संकट की आशंका बनी हुई है.


GS Paper 3 Source: PIB

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UPSC Syllabus : Indian Economy and issues relating to planning, mobilization of resources, growth, development and employment.

Topic : Partial credit guarantee scheme to PSBs

संदर्भ

वर्ष 2019-20 के बजट में की गई घोषणा के अनुसार भारत सरकार ने आंशिक ऋण गारंटी से सम्बंधित एक योजना का आरम्भ किया है. इस योजना के अन्दर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को वित्तीय रूप से सही गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) की परिसम्पत्तियों को खरीदने के लिए एक एकमुश्त अंशकालिक ऋण गारंटी दी जायेगी.

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उद्देश्य

ऋण अदायगी में चूक कर रही एनबीएफसी/एचएफसी की परिसंपत्तियों और देनदारियों में अस्‍थायी असंतुलन को समाप्‍त करना इसका उद्देश्‍य है. ऐसे में एनबीएफसी/एचएफसी की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए उनकी परिसंपत्तियों की अंधाधुंध बिक्री करने की जरूरत नहीं होगी.

भारत सरकार द्वारा दी जाने वाली गारंटी योजना के निर्गत होने की तिथि से छह महीने अथवा तब तक खुली रहेगी जब तक बैंक एक लाख करोड़ रु. की परिसम्पत्तियाँ नहीं खरीद लेती हैं.

आंशिक ऋण गारंटी योजना का महत्त्व

वर्तमान में अर्थव्यवस्था ढीली चल रही है जिसका कारण यह माना जा रहा है कि छोटे व्यवसाइयों और उपभोक्ताओं तक ऋणों का प्रवाह घट गया है और गैर-बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों एवं एचएफसी पर दबाव बढ़ रहा है. आंशिक ऋण गारंटी योजना से गैर-बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों में तरलता आएगी और अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने में वे अपनी भूमिका पहले की भाँति निभा सकेंगी.

उल्लेखनीय तथ्य

  • बजट में घोषित इस योजना के दिशानिर्देशों के अनुसार आर्थिक मामलों का विभाग (Department of Economic Affairs) किसी बैंक द्वारा गैर-बैंकिंग वित्तीय कम्पनी अथवा HFCs से खरीदी गई परिसंपत्ति के मूल्य के 10% तक की राशि की सरकारी गारंटी देगा.
  • वित्तीय सेवा विभाग सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से उनके लेन-देन की जानकारी एक विहित प्रपत्र में लेगा और फिर उसकी एक प्रति को विभाग के बजट प्रभाग को भेज देगा. सरकार बैंकों द्वारा प्रस्तुत दावों का निपटारा पाँच कार्य-दिवसों के भीतर कर देगा.
  • गैर-बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों को उनके द्वारा बैंकों को बेची गई परिसंपत्तियों के मूल्य का 25% प्रति वर्ष सरकार को शुल्क देना होगा. वे मार्च 31 की तिथि को उनके पास जो मानक परिसंपत्तियाँ हैं, उनका 20% (अधिकतम 5,000 करोड़ रु.) बेच सकेंगी.
  • जिन परिसंपत्तियों को बेचा जाएगा उनकी रेटिंग कम से कम AA अथवा समतुल्य होनी चाहिए.
  • NBFC/HFC के पास पर्याप्त पूँजी होनी चाहिए और उनकी अलाभकारी सम्पत्ति (NPA) (पढ़ें > NPI in Hindi) 6% से कम होनी चाहिए. बेचने वाली कम्पनी पिछले दो वित्तीय वर्षों से लाभ में चलने वाली कम्पनी होनी चाहिए.
  • एकमुश्त गारंटी परिसंपत्तियों के क्रय की तिथि से 24 महीने तक वैध रहेगी. गारंटी को पहले भी बंद किया जा सकता है यदि परिसंपत्तियों को खरीदने वाला बैंक गारंटी की वैधता की तिथि से पहले उनको दुबारा उसी NBFC या HFC को किसी अन्य प्रतिष्ठान को बेच देता है.

GS Paper 3 Source: Indian Express

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UPSC Syllabus : Indian Economy and issues relating to planning, mobilization of resources, growth, development and employment.

Topic : Negative rate policy

संदर्भ

अपनी मुद्राओं में होने वाली अवांछित वृद्धि को रोकने के लिए आजकल कुछ केन्द्रीय बैंक नकारात्मक दर की नीति अपना रहे हैं. विदित हो कि यूरोप और जापान जैसी लगातार कम मुद्रा स्फीति वाली अर्थव्यस्थाएँ यह नीति अपनाती रही हैं.

नकारात्मक दर कुछ केन्द्रीय बैंकों द्वारा क्यों अपनाई जा रही है?

  1. 2008 में लेहमेन ब्रदर्स के पतन से उत्पन्न वैश्विक वित्तीय संकट से जूझने के लिए कई केन्द्रीय बैंकों ने ब्याज की दरें लगभग शून्य कर दी थीं.
  2. एक दशक के उपरान्त आर्थिक वृद्धि धीमी रहने के कारण अधिकांश देशों में ब्याज की दरें कम चल रही हैं.
  3. दरों को और अधिक घटाने की गुंजाइश नहीं बची है, अतः कुछ बड़े-बड़े केन्द्रीय बैंक अन्य अपारम्परिक नीतियों का सहारा ले रहे हैं जिनमें नकारात्मक दर की नीति भी एक है.
  4. यूरोपीय संघ, स्विट्ज़रलैंड, डेनमार्क, स्वीडन और जापान में तो ये दरें शून्य से भी कुछ नीचे चली गई हैं.

नकारात्मक दर की नीति कैसे काम करती है?

इस नीति के अंतर्गत वित्तीय संस्थानों से उनके द्वारा केन्द्रीय बैंक में रखे गये अधिकाई रिज़र्व पर ब्याज देना पड़ता है. इस प्रकार नकद जमा रखने वाले वित्तीय सस्न्थानों को केन्द्रीय बैंक दण्डित करते हैं. उनको आशा होती है कि ऐसा करने से उन संस्थाओं को ऋण देने के लिए बाध्य किया जा सकता है.

नकारात्मक दरों के गुण

  • उधारी की लागत घटती है.
  • देश की मुद्रा दर कमजोर होती है और वह अन्य मुद्राओं की तुलना में निवेश के लिए कम आकर्षक हो जाती है.
  • मुद्रा कमजोर होने से देश से होने वाला निर्यात प्रतिस्पर्धात्मक रूप से लाभकारी हो जाता है.
  • इससे आयात की लागत बढ़ जाती है जिसके परिणामस्वरुप मुद्रा स्फीति में वृद्धि होती है.

नकारात्मक दरों के दुर्गुण

  • नकारात्मक दरों से समूचे Yield Curve पर निम्नगामी दबाव पड़ता है.
  • वित्तीय संस्थानों द्वारा ऋण देकर होने वाली कमाई की मार्जिन कम हो जाती है.
  • यदि अत्यधिक कम दरें लम्बे समय तक बनी रहती है तो उससे वित्तीय संस्थानों के स्वास्थ्य को धक्का पहुँचता है और इस कारण वे ऋण देना ही बंद कर सकते हैं और इस प्रकार अर्थव्यवस्था को क्षति पहुँचा सकते हैं.
  • यदि केन्द्रीय बैंक दरों को बहुत ही अधिक नकारात्मक स्तर पर रखता है तो जमा करने वाले इसका प्रतिरोध करते हुए नकद अपने पास रखने का निर्णय ले सकते हैं.

GS Paper 3 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Inclusive growth and issues arising from it.

Topic : RBI regulatory sandbox

संदर्भ

वित्तीय तकनीक के क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक ने नियामक सैंडबॉक्स के लिए अंतिम संरचना का अनावरण कर दिया है.

नियामक सैंडबॉक्स क्या है?

नियामक सैंडबॉक्स उस सुरक्षित स्थान को कहते हैं जहाँ व्यवसायीगण शिथिल नियामक दशाओं में अपने नवाचारी उत्पादों की जाँच कर सकते हैं. इसमें सम्मिलित होने वाली कंपनियाँ अपने नए उत्पादों का विमोचन एक नियंत्रित परिवेश के अन्दर गिने-चुने उपभोक्ताओं के समक्ष एक सीमित समय के लिए करती हैं.

मुख्य तथ्य

  • भारतीय रिज़र्व बैंक यह सैंडबॉक्स उन प्रतिष्ठानों के लिए उपलब्ध कराएगा जिनका शुद्ध मूल्य नवीनतम अंकेक्षित बैलेंस शीट के अनुसार न्यूनतम 25 लाख रु. होगा.
  • यह कम्पनी निगमित होने के साथ-साथ पंजीकृत होनी चाहिए. इस सैंडबॉक्स में बैंक भी हिस्सा ले सकते हैं.
  • सैंडबॉक्स से एक ओर ओर जहाँ धन-हस्तांतरण सेवापं, डिजिटल KYC, वित्तीय समावेश और साइबर सुरक्षा उत्पादों को सैंडबॉक्स सुविधा में रखा गया है, वहीं दूसरी ओर क्रिप्टो मुद्रा, क्रेडिट रजिस्टरी और क्रेडिट सूचना को इससे बाहर रखा गया है.

नियामक सैंडबॉक्स का महत्त्व और लाभ

  • नियामक सैंडबॉक्स से Fintech कम्पनियों को अपने नवाचारी उत्पादों को कम लागत पर और कम समय में अनावरण करने में सहायता मिलेगी.
  • सैंडबॉक्स की व्यवस्था से यह लाभ भी है कि Fintech कंपनियाँ अपने नए उत्पादों और सेवाओं का परीक्षण प्रत्यक्ष रूप से अथवा आभासी रूप से कर सकती हैं.
  • इससे कंपनियाँ बिना किसी व्यापक और खर्चीले तामझाम के अपने उत्पाद की व्यवहार्यता का परीक्षण कर सकेंगी.
  • नियामक सैंडबॉक्स का एक अतिरिक्त लाभ यह है कि Fintech कंपनियाँ अपने उत्पादों से सम्बंधित नए-नए प्रयोग कर पाएँगे और इसमें विफलता का खतरा कम होगा और यदि होगा भी तो उसके कारणों का विश्लेषण किया जा सकता है.

नियामक सैंडबॉक्स की आवश्यकता क्यों?

  • नीति आयोग के अनुसार भारत का फिनटेक बाजार विश्व में सबसे अधिक तेजी से बढ़ने वाला बाजार है. एक औद्योगिक अनुसंधान से पता चला है कि 2029 तक एक ट्रिलियन डॉलर अर्थात् खुदरा और SME का 60% कर्ज डिजिटल तरीके से भुगतान किया जाएगा.
  • भारतीय फिनटेक अर्थतंत्र विश्व का तीसरा बड़ा अर्थतंत्र है जिसने 2014 से लगभग 6 बिलियन डॉलर के निवेश को आकर्षित किया है. फिनटेक अथवा वित्तीय तकनीक वाली कंपनियाँ विभिन्न वित्तीय सेवाओं के लिए तकनीक का प्रयोग करती हैं, जैसे – भुगतान, पियर टू पियर उधारी, क्लाउड फंडिंग आदि.
  • इसलिए ग्राहकों की सुरक्षा तथा सभी हितधारकों के हितों की रक्षा के लिए आज फिनटेक प्रतिष्ठानों के नियन्त्रण हेतु नियामक और पर्यवेक्षणात्मक तन्त्र की अत्यंत आवश्यकता है.

Prelims Vishesh

New burrowing frog species confirmed in Jharkhand :-

  • झारखंड के छोटानागपुर पठार क्षेत्र में बिल बनाने वाले मेढ़क की एक नई प्रजाति का पता चला है जिसे Spahaerotheca Magadha का नाम दिया गया है.
  • इस प्रकार के मेढ़क कोडरमा जिले के नवाडीह और जौंगी गाँव के कृषि क्षेत्रों में बहुतायत से पाए जाते हैं.

‘Golden Butterfly’ variety tea :-

  • पिछले दिनों गुवाहाटी चाय नीलामी केंद्र (Guwahati Tea Auction Centre – GTAC) ने एक प्रकार की चाय को 75 हजार रु. प्रति किलो की दर से बेचा और इस प्रकार एक अंतर्राष्ट्रीय कीर्तिमान रच दिया.
  • इस चाय का नाम गोल्डन बटरफ्लाई है जो डिब्रूगढ़ के निकट डिकोम चाय बगान में उत्पन्न होता है.
  • यह चाय चाय की पत्तियों से नहीं, अपितु चाय की कलियों से बनाई जाती है.

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