Sansar डेली करंट अफेयर्स, 14 August 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 14 August 2020


GS Paper 2 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Bilateral Groupings & Agreements.

Topic : Israel-UAE Peace Deal

संदर्भ

इज़राइल और संयुक्त अरब अमीरात ने ऐतिहासिक वाशिंगटन-ब्रोकेड समझौते (Washington-brokered Deal) के अंतर्गत पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित करने के लिये सहमति व्यक्त की है.

मुख्य तथ्य

  • ऐसी घोषणा करने वाला UAE खाड़ी क्षेत्र का प्रथम तथा तीसरा अरब देश है जिसके इज़राइल के साथ सक्रिय राजनयिक संबंध हैं.
  • इससे पूर्व मिस्र ने साल 1979 ई. में तथा जॉर्डन ने साल 1994 ई. में इज़राइल के साथ ‘शांति समझौते’ किये थे.
  • संयुक्त अरब अमीरात और इज़राइल दोनों पश्चिम एशिया में संयुक्त राज्य अमेरिका के निकटतम सहयोगी हैं.

इज़राइल-यूएई शांति समझौता

  • ‘वाशिंगटन-ब्रोकेड समझौता’ को ‘इज़राइल-यूएई शांति समझौता’ (Israel-UAE Peace Deal) के नाम से भी जाना जाता है.
  • यह इज़राइल द्वारा फिलिस्तीनी क्षेत्रों को अपने हिस्सों में को जोड़ने की योजना को ‘निलंबित’ कर देगा.
  • समझौते के अंतर्गत इज़राइल, वेस्ट बैंक के बड़े हिस्से पर कब्जा करने की अपनी योजना को निलंबित कर देगा.
  • वेस्ट बैंक, इज़राइल और जॉर्डन के मध्य स्थित है. इसका एक प्रमुख शहर फिलिस्तीन की वास्तविक प्रशासनिक राजधानी ‘रामल्लाह’ (Ramallah) है.
  • संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात और इज़राइल द्वारा एक संयुक्त बयान जारी किया गया है जिसमें कहा गया है कि आने वाले हफ्तों में प्रतिनिधिमंडल सीधी उड़ानों, सुरक्षा, दूरसंचार, ऊर्जा, पर्यटन और स्वास्थ्य देखभाल के सौदों पर हस्ताक्षर करेंगे.

समझौते की पृष्ठभूमि

  • वर्ष 1971 से संयुक्त अरब अमीरात फिलिस्तीनियों की भूमि पर इज़राइल के नियंत्रण को मान्यता नहीं देता था.
  • गत वर्षों में ईरान के साथ साझा दुश्मनी और लेबनान के आतंकवादी समूह हिज़्बुल्लाह के कारण खाड़ी अरब देशों और इज़राइल के मध्य निकटता आ गई है.
  • आतंकवादी समूह ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ और ‘हमास’ के चलते भी दोनों देशों के बीच निकटता में वृद्धि हुई है.

वेस्ट बैंक विवाद का इतिहास

  • 1948 के अरब-इजराइली युद्ध में जॉर्डन ने वेस्ट बैंक पर आधिपत्य कर लिया था.
  • 1967 के छह दिवसीय युद्ध के समय इजराइल ने जॉर्डन से यह भूभाग छीन लिया और तब से इस पर इजराइल का ही कब्ज़ा है.
  • इजराइल ने यहाँ 130 औपचारिक बस्तियाँ बनाई हैं. इसके अतिरिक्त इतनी ही बस्तियाँ पिछले 20-25 वर्षों में यहाँ बन चुकी हैं.
  • यहाँ 26 लाख फिलिस्तीनी रहते हैं. इसके अतिरिक्त यहाँ 4 लाख इजराइली बस गये हैं. यहूदियों का मानना है कि इस भूभाग पर उनको बाइबिल में ही जन्मसिद्ध अधिकार मिला हुआ है.
  • फिलिस्तीनी लोगों का कोई अलग देश नहीं है. उनका लक्ष्य है कि इस भूभाग में फिलिस्तीन देश स्थापित किया जाए जिसकी राजधानी पूर्वी जेरुसलम हो. इस कारण यहूदियों और फिलिस्तीनियों में झगड़ा होता रहता है. फिलिस्तीनियों का मानना है कि 1967 के बाद वेस्ट बैंक ने जो यहूदी बस्तियाँ बसायीं, वे सभी अवैध हैं.
  • संयुक्त राष्ट्र महासभासुरक्षा परिषद् और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय भी यही मानता है कि वेस्ट बैंक में इजराइल द्वारा बस्तियाँ स्थापित करना चौथी जिनेवा संधि (1949) का उल्लंघन है जिसमें कहा गया था कि यदि कोई देश किसी भूभाग पर कब्ज़ा करता है तो वहाँ अपने नागरिकों को नहीं बसा सकता है.
  • रोम स्टैच्यूट (Rome Statute)के अंतर्गत 1998 में गठित अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (International Criminal Court) के अनुसार भी इस प्रकार एक देश के लोगों को कब्जे वाली भूमि पर बसाना एक युद्ध अपराध है.

अमेरिका और भारत का दृष्टिकोण

अमेरिका इजराइली बस्तियों को अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं मानता है, अपितु उन्हें इजराइल की सुरक्षा के लिए आवश्यक मानता है. भारत पारम्परिक रूप से इस मामले में दो देशों के अस्तित्व के सिद्धांत (2-state solution) पर चलता आया है और इसलिए वह एक संप्रभु और स्वतंत्र फिलिस्तीन देश के स्थापना का समर्थन करता है. फिर भी इजराइल से भारत के रिश्ते दिन-प्रतिदिन प्रगाढ़ होते रहे हैं.

क्या है पश्चिम एशिया शान्ति योजना?

  • इजराइल और फिलिस्तीनियों के बीच स्थगित वार्ता को फिर से शुरू करने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा पश्चिम एशिया के लिए एक शान्ति योजना (West Asia Peace Plan) घोषित की गयी थी.
  • जिसमें एक स्वतंत्र फिलिस्तीन देश के निर्माण और पश्चिम तट की बस्तियों पर इजराइल की सम्प्रभुता स्थापित करने की बात काही गयी थी.
  • इस योजना में यह भी कहा गया था कि यदि फिलिस्तीनी इससे सहमत होता है तो अमेरिका दस वर्षों में इस शांति एवं पुनर्निर्माण प्रक्रिया के लिए 50 मिलियन डॉलर का निवेश करेगा.

भारत-इजराइल संबंधों की पृष्ठभूमि

  • इजराइल राज्य के निर्माण पर भारत की प्रतिक्रिया कई कारकों से प्रभावित थी. इन कारकों में स्वयं भारत का धार्मिक आधार पर विभाजन और अन्य देशों के साथ भारत के संबंध शामिल थे.
  • इसके साथ ही, भारत में एक बड़ी मुस्लिम आबादी थी जो कि परंपरागत रूप से फिलीस्तीनी भूमि पर इजरायल के निर्माण का विरोध करती थी.
  • भारत ने सितंबर, 1950 में इजराइल की आजादी को औपचारिक रूप से मान्यता प्रदान की. द्रष्टव्य है कि भारत की इजराइल नीति फिलस्तीन के पक्ष के सैद्धांतिक समर्थन तथा भारत की घरेलू आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण पर आधारित है.
  • घरेलू स्तर पर, राजनेताओं को यह डर था कि यदि इजराइल के साथ संबंधों को साम्रान्य किया जाएगा तो वे अपना वोट बैंक खो देंगे.
  • इसके अतिरिक्त भारत, फारस की खाड़ी में स्थित अरब देशों में काम कर रहे अपने नागरिकों की बड़ी आबादी को खतरे में नहीं डालना चाहता था जो कि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के लिए महत्त्वपूर्ण थी.
  • इसके अतिरिक्त, भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए तेल की आपूर्ति हेतु भी अरब देशों पर निर्भर था.
  • 1950 के दशक में गुट-निरपेक्ष आंदोलन का उद्धव हुआ जिसमें भारत एक संस्थापक सदस्य था. इन परिस्थितियों में भारत किसी भ्री रूप में इस्राइली पक्ष का सार्वजनिक रूप से समर्थन करने में अक्षम था.

1992 में पूर्ण राजनयिक संबंधों की स्थापना

1992 में भारत ने अंततः इज़राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए. हालाँकि, इससे पूर्व फ़िलिस्तीनी राष्ट्रपति यासर अराफात को विश्वास में लिया गया. इसके पीछे दो कारण थे:

  • पहला कारण यह था कि उस समय इजराइल और फिलिस्तीन के बीच शांति प्रक्रिया उन्नत चरण में थी.
  • दूसरा कारण, संयुक्त राज्य अमेरिका का दबाव था. नौकरशाही मान्यताओं के अनुसार, 1991 में आर्थिक उदारीकरण को अपनाने का निर्णय लेने के बाद भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक वैश्विक इंटरफ़ेस की आवश्यकता महमूस की गयी. इसके साथ ही USSR के पतन के बाद इसे अपनी रक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नए बाजार की जरुरत थी.
मुख्य परीक्षा के लिए प्रश्न
 

भारत और इजरायल के बीच संबंधों की संक्षेप में चर्चा करें. (Note : इस आर्टिकल की मदद लें > भारत-इजराइल सम्बन्ध)

Briefly discuss the relationship between India and Israel. (Note: Take help from this article : Indo-Israel Relations)


GS Paper 3 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Effects of liberalization on the economy, changes in industrial policy and their effects on industrial growth.

Topic : Business Responsibility Reporting

संदर्भ

हाल ही में कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs- MCA) द्वारा कंपनी जवाबदेही रिपोर्टिंग’ (बिजनेस रिस्पांसिबिलिटी रिपोर्टिंग – BRR) पर समिति की रिपोर्ट निर्गत की गयी है.

प्रतिवेदन के मुख्य तथ्य

समिति ने गैर-वित्तीय मापदंडों पर रिपोर्टिंग के उद्देश्‍य और दायरे को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करने के लिए कंपनी जवाबदेही एवं निरंतरता रिपोर्ट (Business Responsibility and Sustainability Report– BRSR)’ नामक एक नई रिपोर्टिंग रूपरेखा की अनुशंसा की है.

  1. समिति ने संस्तुति की कि BRR को MCA 21 पोर्टल के साथ एकीकृत कर दिया जाए.
  2. BRSR फाइलिंग के जरिये प्राप्‍त होने वाली जानकारियों का प्रयोग कंपनियों के लिए ‘कंपनी जवाबदेही-निरंतरता सूचकांक’ (Business Responsibility-Sustainability Index) बनाने में किया जाना चाहिए.
  3. शीर्षस्थ 1000 कंपनियों को BRR पेश करना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए.
  4. कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय द्वारा गैर-सूचीबद्ध कंपनियों हेतु कुल कारोबार अथवा चुकता पूंजी की निर्दिष्ट सीमा से ऊपर कंपनी जवाबदेही रिपोर्टिंग (BRR) आवश्यक किया जा सकता है.

BRR क्या है?

  1. यह किसी सूचीबद्ध कंपनी द्वारा अपने सभी हितधारकों के लिएउत्तरदायी कारोबार संचालन’ प्रक्रियाओं को अपनाने का प्रकाशन है.
  2. कंपनी जवाबदेही रिपोर्टिंग (Business Responsibility Reporting- BRR) सभी प्रकार की कंपनियों पर लागू होती है जिसमें विनिर्माण, सेवाएँ आदि शामिल हैं.

भारत में बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी रिपोर्टिंग का विकास

  • कंपनी जवाबदेही की अवधारणा को मुख्य धारा में लाने के लिए 2009 में कॉर्पोरेट स्वैच्छिक दिशानिर्देश जारी किये गये;
  • 2011 में भारत द्वारा व्यापार और मानव अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के मार्गदर्शक सिद्धांतों का समर्थन किया गया;
  • कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय (MCA) द्वारा ‘कंपनियों की सामाजिक, पर्यावरणीय एवं आर्थिक जवाबदेही पर राष्ट्रीय स्वैच्छिक दिशा-निर्देश (National Voluntary Guidelines- NVG), 2011’ के रूप में इन दिशा-निर्देशों में संशोधन किया गया;
  • सेबी द्वारा 2012 में NVG के आधार पर बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी रिपोर्ट (BRR) दाखिल करने के लिए बाजार पूंजीकरण द्वारा शीर्षस्थ 100 सूचीबद्ध कंपनियों को अनिवार्य किया गया;
  • SEBI ने 2015 में बाजार पूंजीकरण द्वारा शीर्ष 500 कंपनियों के लिए BRR रिपोर्टिंग का विस्तार किया;
  • 2019 में रिस्पॉन्सिबल बिज़नेस कंडक्ट (NGRBC) पर राष्ट्रीय दिशानिर्देश निर्गत किए गए.

कंपनी जवाबदेही रिपोर्टिंग की आवश्यकता

सामाजिक व पर्यावरणीय उत्तरदायित्व सार्वजनिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. इससे संस्थानों की समाज के प्रति जवाबदेही को तय किया जाता है. उदाहरण के तौर पर कंपनियों की नैगमिक सामाजिक दायित्व (Corporate social responsibility – CSR) तय करने से उन्हें समाज व पर्यावरण के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को समझना पड़ता है. यह समाज के सतत् व समावेशी विकास के लिये महत्वपूर्ण है. गोवा में सेसा गोवा कंपनी विभिन्न विद्यालयों, अवसंरचनात्मक विकास, खेलों के आयोजन और बंद खानों के ‘रेस्टोरेशन’ के माध्यम से अपनी सामाजिक-पर्यावरणीय दायित्व को निभाती है. इससे समाज में समरसता का प्रचार होता है.

मेरी राय – मेंस के लिए

 

सामाजिक उत्तरदायित्व का विचार हमारे देश में बहुत पुराना है. व्यवसायियों द्वारा समाज के हित के लिए अपनी सम्पदा में से हिस्सा देने की अवधारणा हमारे देश के लिए न तो आधुनिक है, और न ही पश्चिमी देशों से आयातित. प्राचीन भारतीय समाज में व्यवसायी का महत्वपूर्ण सम्मानित स्थान था तथा वे समाज के हित के लिए मूल तंत्र की भांति कार्य करते थे. बाढ़, सूखा, महामारी आदि प्राकृतिक विपत्तियों के समय वे अपने खाद्यान्न के गोदाम सामान्य जनता के लिए खोल देते थे तथा अपने धन से राहत कार्यों में सहायता करते थे. धर्मशालाओं तथा मंदिरों का निर्माण, रात्रि शरणस्थल (Night Shelters), जगह-जगह पीने के पानी की व्यवस्था, नदियों के किनारे घाटों का निर्माण, कुऐं बनवाना, इत्यादि व्यवसायियों के लिए आम बात थी. इसी प्रकार विद्यालयों में शिक्षा के लिए दान देना तथा गरीब लड़कियों के दहेज की व्यवस्था करना उनके लिए सामान्य कार्य था. स्वतंत्रता के पश्चात् व्यवसायी वर्ग ने अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को निम्न प्रकार से पूरा किया – 

स्वयं के प्रति 

व्यवसायी वर्ग ने अपने प्रति उत्तरदायित्व को अच्छी तरह से निभाया है. व्यवसायी वर्ग (मुख्य रूप से निजी क्षेत्र) का प्रमुख उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है. व्यवसायियों ने लाभ का अर्जन कर तथा उसका पुनर्विनियोग कर अपने व्यवसाय का बहुमुखी विकास किया है. निजी क्षेत्र में समस्त आर्थिक क्रियाएं न केन्द्रित हो जाएं, इस हेतु सरकार ने विभिन्न स्तर पर कदम उठाये हैं. व्यवसायियों ने नये-नये उत्पाद बनाकर नये बाजारों में प्रवेश किया है. अनुसंधान तथा आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया है. 

स्वामियों के प्रति 

व्यवसायियों ने स्वामियों या अंशधारियों के प्रति पूर्णरूप से उत्तरदायित्व का निर्वहन नहीं किया है. अंशधारियों का हित इसमें होता है कि उन्हें समय से पर्याप्त मात्रा में लाभांश मिलता रहे. चूंकि अंशधारी बिखरे हुए होते हैं, अत: वे संचालक मण्डल पर विश्वास करके उसे अपना ट्रस्टी बना देते हैं. व्यवहार में अंशधारियों को कभी-कभी लाभांश मिलता ही नहीं है या मिलता भी है तो बहुत थोड़ी मात्रा में इससे अंशधारियों के हित कुप्रभावित होते हैं. सरकार ने अंशधारियों के हितों की रक्षा के लिए कई कदम उठाये हैं. ‘सेबी’ की स्थापना इन्हीं कदमों में से एक है.

कर्मचारियों के प्रति 

कुछ व्यवसायिक संगठनों को छोड़कर अधिकांश संगठनों ने कर्मचारियों के प्रति अपने सामाजिक उत्तरदायित्व की अवहेलना ही की है. टाटा, बिड़ला, जे0के0, रिलायन्स, मफतलाल, हिन्दुस्तान लीवर, डालमिया, इत्यादि कुछ गिने-चुने संगठन कर्मचारियों के प्रति उत्तरदायित्व को प्रभावी तरीके से सम्पादित करते हैं. अधिकांश व्यवसायी अपने कर्मचारियेां का अधिकाधिक शोषण करते हैं. न तो इन व्यवसायियों के पास कार्य मापन हेतु उचित पैमाना होता है और न ही कर्मचारियों को कार्य करने के लिए उचित पर्यावरण ये व्यवसायी प्रदान करते हैं. गुलामों की भांति इन कर्मचारियों का भी क्रय-विक्रय किया जाता है.

उपभोक्ताओं के प्रति 

उपभोक्ताओं को अच्छी किस्म की तथा स्वास्थ्यवर्धक वस्तुएं उचित मूल्य पर प्राप्त करने का अधिकार है. परन्तु इस उत्तरदायित्व का निर्वहन करने में भारतीय व्यवसायी असफल रहा है. आज व्यवसायी नकली वस्तुओं को बेचकर, मिलावटी सामान बेचकर या अन्य किसी अनैतिक या अवैधानिक तरीके से थोड़े से समय में अधिक से अधिक लाभ कमाना चाहता है. किन्तु विगत कुछ वर्षों से व्यवसायी वर्ग में अपने उपभोक्ताओं के प्रति जागरूकता आयी है. अब व्यवसायी उपभोक्ताओं की रूचि तथा आवश्यकता, विज्ञापन में मिथ्यावर्णन न करना, अच्छी व सस्ती वस्तुएं उपलब्ध कराना, विक्रय के पश्चात् सेवा, वितरण प्रणाली को सरल बनाना, वस्तुओं को प्रमापित करवाना, उपभोक्ता की शिकायतों को सुनना तथा उनका उचित तरीके से समाधान करना, इत्यादि पर ध्यान देने लगा है.

सरकार के प्रति 

जहाँ तक भारतीय व्यवसायियों द्वारा सरकार के प्रति अपने उत्तरदायित्व को निभाने का प्रश्न है, इसमें वे एक बड़ी सीमा तक असफल रहे हैं. व्यवसायियों के लिए करों की चोरी, रिश्वत देकर अधिकारियों को भ्रष्ट करना, राजनैतिक सम्बन्धों का अपने तुच्छ हितों हेतु दुरूपयोग करना, इत्यादि सामान्य बातें हैं. व्यवसायी काला बाजारी, मिलावट आदि करके विभिन्न सरकारी नियमों- अधिनियमों का खुला उल्लंघन करते हैं.

समुदाय के प्रति 

व्यवसायी ने अपने आस-पास के समुदाय तथा राष्ट्र के लिए एक सीमा तक अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किया है. समुदाय के लाभार्थ उन्होंने विद्यालयों, चिकित्सालयों, धर्मशालाओं, पुस्तकालयों इत्यादि के निर्माण में योगदान दिया है. शिक्षा का प्रसार तथा जनसंख्या पर नियंत्रण जैसे कार्यों में भी वे पीछे नहीं रहे हैं. व्यवसायिक क्रियाओं के माध्यम से विस्थापितों का पुनर्वास, लघु उद्योगों तथा आनुषंगिक उद्योगों को प्रोत्साहन, शोध एवं विकास के कार्यों को विशेष महत्व दिया है. 

विभिन्न औद्योगिक एवं व्यवसायिक नेताओं जैसे जी0डी0 बिरला, जे0आर0डी0 टाटा, लाला श्री राम, कस्तुरभाई लालाभाई, धीरूभाई अम्बानी एवं अन्य लोगों ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्थानों की स्थापना करने के साथ-साथ भारतीय कला, इतिहास व सभ्यता से सम्बन्धित केन्द्रों की स्थापना भी की है. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फन्डामेन्टल रिसर्च, पिलानी तथा रांची में स्थापित बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, धीरूभाई अम्बानी के रिलायन्स ग्रुप द्वारा गांधीनगर में स्थापित टेक्नोलाजी इंस्टीट्यूट (मुम्बई), इत्यादि प्रमुख संस्थान निजी क्षेत्र द्वारा स्थापित किये गये हैं. इसी प्रकार सांस्कृतिक रंगमंचों की कमी को पूरा करने के लिए श्री राम बन्धुओं द्वारा दिल्ली में श्रीराम सेन्टर फॉर आर्ट्स एण्ड कल्चर स्थापित किया गया है.

मुख्य परीक्षा के लिए प्रश्न
 

लोक सेवा के संदर्भ में ‘जवाबदेही’ का क्या अर्थ है? लोक सेवकों की व्यक्तिगत और सामूहिक जवाबदेही को सुनिश्चित करने के लिये क्या उपाय अपनाए जा सकते हैं

What does ‘accountability’ mean in the context of public service? What measures can be adopted to ensure the individual and collective accountability of public servants?


GS Paper 3 Source : Business Standard

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UPSC Syllabus : Infrastructure: Energy, Ports, Roads, Airports, And Railways etc.

Topic : One Sun, One World, One Grid (OSOWOG) initiative

संदर्भ

हाल ही में ‘केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय’ (MNRE) द्वारा अपने ‘एक विश्वएक सूर्यएक ग्रिड’ (One Sun One World One Grid- OSOWOG) कार्यक्रम के लिये इच्छुक कंपनियों मांगे गए प्रस्तावों पर अगली सूचना तक रोक लगा दी है.

वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड (OSOWOG) परियोजना

  • OSOWOG अक्षय ऊर्जा संसाधनों को आपस में जोड़ने के लिए वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण भारत द्वारा प्रारम्भ की गयी एक पहल है.
  • OSOWOG का ब्लू प्रिंट विश्व बैंक के तकनीकी सहायता कार्यक्रम के अंतर्गत विकसित किया जाएगा.
  • OSOWOG को तीन चरणों में पूरा करने की योजना है. इसके पहले चरण में मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया (MESASEA) को परस्पर जोड़ा जाएगा. दूसरे चरण में अफ्रीका को जोड़ा जाएगा और तीसरे एवं आखिरी चरण में पूरी परियोजना का वैश्वीकरण होगा.

परियोजना का महत्त्व

  • वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड परियोजना (OSOWOG) भारत की एक महत्त्वाकांक्षी सौर ऊर्जा परियोजना है जिसका उद्देश्य सामान्य संसाधनों का उपयोग करके बुनियादी ढांचे और सौर ऊर्जा के लाभों को साझा करने के लिए एक वैश्विक सहयोग बनाना है. इसे भारत की सम्प्रभुता को चुनौती देने वाली चीन की वन बेल्ट वन रोड पहल प्रत्युत्तर में भारत का प्रयास भी कहा जा सकता है. इसकी आवश्यकता निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर समझी जा सकती है:
  • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) की सफलता: जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में एक अग्रणी देश के रूप में, भारत ने 2015 में अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का विचार प्रस्तुत किया था. आईएसए का लक्ष्य सभी को 24*7 सस्ती कीमत पर सौर ऊर्जा उपलब्ध कराना है. लगभग 120 देशों के प्रमुखों ने आईएसए में अपनी भागीदारी की पुष्टि की है. ऐसे में OSOWOG निवेश और सहयोग को बढ़ावा देगा. सभी के लिए 24*7 बिजली: समान आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए सरकार का लक्ष्य सभी को 24*7 बिजली प्रदान करना है. OSOWOG सीमा और सामरिक क्षेत्रों जैसे उत्तर पूर्वी राज्य अरुणाचल प्रदेश, पश्चिमी हिमालयी राज्यों और बिहार और उत्तर प्रदेश मे बिजली प्रदान करने के लिए मंच प्रदान करेगा.
  • पेरिस समझौते की प्रतिबद्धताओं की पूर्ति: भारत सरकार ने 2022 के आखिर तक 175 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है. इस विजन को गति देने के लिए इस क्षेत्र में वैश्विक सहयोग की आवश्यकता पर बल देना भारत की तार्किक सोच को दर्शाता है. भारत, लक्षित राष्ट्रीय निर्धारित योगदान(NDC) पर संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन संरचना सम्मेलन (UNFCCC) में प्रस्तुत अपने प्रतिवेदन के अनुसार, 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा संसाधनों से 40 प्रतिशत संचयी विद्युत ऊर्जा क्षमता अर्जित करेगा. इस लक्ष्य को प्राप्त करने में OSOWOG परियोजना महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
  • सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना: संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2016 में 781 मिलियन से अधिक लोगों (दुनिया की 39% जनसंख्या) तक खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन और प्रौद्योगिकियों तक पहुंच नहीं है. एसडीजी के लक्ष्य 7 के अनुसार वर्ष 2030 तक सभी लोगो के लिए सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा की पहुंच सुनिश्चित करने में OSOWOG परियोजना महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. ऊर्जा पहुंच का विस्तार करने के लिए, ऊर्जा दक्षता और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश में वृद्धि किया जाना अति महत्त्वपूर्ण है.
  • पड़ोसी प्रथम नीति को मजबूती प्रदान करना: नेपाल और भूटान जैसे स्थलबद्ध पड़ोसी जलविद्युत संसाधनों में समृद्ध हैं. OSOWOG उन्हें अपनी अधिशेष बिजली को बिजली की कमी वाले राष्ट्रों को निर्यात करने के लिए अपेक्षित मंच प्रदान करेगा. भारत सरकार नेपाल के सहयोग से अरुण- III जल विद्युत संयंत्र और भूटान के सहयोग से मंगदेछु जलविद्युत परियोजना जैसे निर्यात-उन्मुख जल- विद्युत परियोजनाएँ विकसित कर रही है.
  • बहुपक्षवाद और वैश्वीकरण के प्रति प्रतिबद्धता: संयुक्त राष्ट्र संघ के एक जिम्मेदार सदस्य के रूप में, भारत का उद्देश्य सौर ऊर्जा संपन्न देशों और सौर ऊर्जा दुर्लभ राष्ट्रों के बीच सहयोग और समन्वय को बढ़ावा देकर दुनिया में आर्थिक और सामाजिक विषमताओं को दूर करना है. OSOWOG आपदा रोधी संरचना के लिए गठबंधन (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure-CDRI) को भी मजबूती प्रदान करेगा.
  • चीन की आर्थिक मुखरता का मुकाबला करना: OSOWOG को चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) को भारत के प्रत्युत्तर के रूप में देखा जा रहा है. BRI मुख्य रूप से 78 भागीदार देशों के बीच संपर्क और सहयोग बढ़ाकर कर उनकी घरेलू अर्थव्यवस्था में सुधार करने की चीन की एक आर्थिक कूटनीति है.

अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन

  • ISA (International Solar Alliance) की स्थापना CoP21 पेरिस घोषणा के अनुसार हुई है. 6 दिसम्बर, 2017 को ISA का फ्रेमवर्क समझौता लागू हो गया और इसके साथ ही यह संधि पर आधारित एक अंतर्राष्ट्रीय अंतर-सरकारी संगठन के तौर पर औपचारिक रूप से अस्तित्व में आया.
  • इस संघ का उद्देश्य है सौर ऊर्जा के उत्पादन को बढ़ावा देना जिससे पेट्रोल, डीजल पर निर्भरता कम की जा सके.
  • सौर संघ का प्रधान लक्ष्य विश्व-भर में 1,000 GW सौर ऊर्जा का उत्पादन करना और इसके लिए 2030 तक सौर ऊर्जा में 1,000 बिलियन डॉलर के निवेश का प्रबंध करना है.
  • यह एक अंतर्राष्ट्रीय, अंतर-सरकारी संघ है जो आपसी समझौते पर आधारित है.
  • अब तक 54 देशों ने इसके फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं.
  • यह 121 ऐसे देशों का संघ है जो सौर प्रकाश की दृष्टि से समृद्ध हैं. (Source : ISA official website)
  • ये देश पूर्ण या आंशिक रूप से कर्क और मकर रेखा के बीच स्थित हैं.
  • इसका मुख्यालय भारत में है और इसका अंतरिम सचिवालय फिलहाल गुरुग्राम में बन रहा है.

OSOWOG को बढ़ावा देनी वाली पहल

  • सोलर मिनी ग्रिड कार्यक्रम: वैश्विक सलाहकार कंपनी डेलॉयट के समर्थन में आईएसए सचिवालय, मिनी-ग्रिड कार्यक्रम के लिए एक ठोस कार्यान्वयन योजना विकसित कर रहा है. आईएसए सचिवालय ने राष्ट्रीय फोकल बिंदुओं के लिए एक मॉडल मिनी-ग्रिड नीति का मसौदा भी तैयार किया.
  • वर्ल्ड सोलर बैंक: भारत द्वारा OSOWOG को धरातल पर उतारने हेतु आने वाली वित्तीय चुनौतियों के मद्देनजर इस परियोजना के लिए समुचित मात्रा में वित्त आपूर्ति हेतु वर्ल्ड सोलर बैंक’ (World Solar Bank- WSB) की स्थापना के प्रयास किए जा रहे हैं.
  • स्केलिंग सोलर रूफटॉप: आईएसए सचिवालय पेरू और घाना के अधिकारियों के साथ मिलकर काम कर रहा है ताकि रूफ-टॉप परियोजनाओं की तैयारी के लिए तकनीकी सहायता प्रदान की जा सके. आईएसए सचिवालय ने भारत में RESCO मॉडल के तहत रूफटॉप सौर पैनल के लिए दूतावासों/मिशनों को प्रस्ताव भी दिया है.
  • अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का विस्तार: पहले जहां अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का दायरा केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों तक था अब इसे बढ़ाकर विश्व के सभी देशों के लिए कर दिया गया है.

OSOWOG परियोजना से जुड़े मुद्दे

‘वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड’ परियोजना से जुसे प्रमुख मुद्दे निम्नलिखित है:

  • भू-राजनीति: यह परियोजना को विश्व का नेतृत्व करने के भारतीय प्रयास के रूप में देखा जा रहा है. लेकिन COVID-19 के कारण उत्पन्न अनिश्चितताओं में, OSOWOG जैसी परियोजनाओं के भू-राजनीतिक निहितार्थों को समझना मुश्किल है. परियोजना के भागीदार देशों की सामाजिक-आर्थिक प्राथमिकताओं को देखते हुए एक निश्चित लागत-साझाकरण तंत्र विकसित करना चुनौतीपूर्ण होगा. इसके अतिरिक्त, कोई भी द्विपक्षीय/बहुपक्षीय मुद्दा महाद्वीपों और देशों के बीच महत्त्वपूर्ण सेवाओं को प्रभावित कर सकता है. इसलिए संभव है कि कई देश इसमें भाग लेने के लिए तैयार ही न हो.
  • वैश्वीकरण बनाम वि-वैश्वीकरण: कोरोनोवायरस महामारी ने वैश्वीकरण की अवधारणा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं और इसका प्रभाव परिवर्तनकारी होंगे. संरक्षणवाद, व्यापार-युद्ध और बहुपक्षीय समझौतों का द्विपक्षीय और क्षेत्रीय समझौतों में बदलाव के इस युग में, OSOWOG का विचार बहुत ही धूमिल नजर आ रहा है. विभिन्न सरकारों और बाजार की शक्तियों से निपटना अक्षय ऊर्जा उत्पादकों के लिए एक कठिन अनुभव होगा. भारत में अक्षय ऊर्जा उत्पादकों के लिए प्रमुख मुद्दा विभिन्न राज्य सरकारों अर्थात विभिन्न कानूनों और नियमों से निपटना है.
  • आर्थिक लाभ: इस एकीकृत ग्रिड के माध्यम से ऊर्जा की आपूर्ति के लिए बिजली के प्रसारण के हजारों किलोमीटर लंबी ट्रांसमिशन लाइनों की आवश्यकता होगी. ऐसे में अकेले विद्युत ट्रांसमिशन लागत भूमि और सौर विकिरण के लाभों पर भरी पड़ सकती सकती है.
  • तकनीक: इसके कार्यान्वयन में तकनीक की सबसे बड़ी चुनौती है उदाहरण के लिए सौर पैनलों के निर्माण के बजाय सौर नीति का उद्देश्य सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना पर अधिक रहा है, जिसके कारण भारत में सौर पैनल निर्माण को सुनिश्चित करने के लिए कोई वास्तविक योजना नहीं है.
  • वित्त: इस परियोजना के कार्यालय में सबसे बड़ी चुनौती वित्त को लेकर है क्योंकि अफ्रीका एवं एशिया इत्यादि के कई सारी देश के पास सौर ऊर्जा से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए वित्त का अभाव है. जब तक एक विशेषकृत एजेंसी द्वारा इसकी व्यवस्था नहीं की जाएगी यह योजना फलीभूत नहीं हो पाएगा.
  • पर्यावरण मुद्दें: एनर्जी कंसल्टेंसी फर्म ब्रिज टू इंडिया (BTI) लिमिटेड द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार भारत के फोटोवोल्टिक अपशिष्ट की मात्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. अध्ययन के अनुसार फोटोवोल्टिक अपशिष्ट की मात्र 2030 तक 2 लाख टन और 2050 तक लगभग 18 लाख टन बढ़ने का अनुमान है. सौर ई-अपशिष्ट से पर्यावरण चुनौतिया के कारण इसका पुनर्चक्रण एक प्रमुख समस्या है.

आगे की राह

  • विश्व बैंक कि समीक्षाओं से पता चलता है कि इस तरह के क्रॉस बॉर्डर ट्रांसमिशन लाइनों के आर्थिक लाभों को सही मायने में अधिकतम किया जाता है जब उनका निर्माण सामान्य उद्देश्यों वाले राजनीतिक संघ के अंतर्गत किया जाता है जैसे यूरोपीय संघ या स्कैंडेनेवियन देश.
  • भारत को चीन के साथ सहयोग करना चाहिए क्योंकि उसे अल्ट्रा-हाई वोल्टेज नेटवर्क निर्माण में विशेषज्ञता हासिल है. चीन ने पहले ही ग्लोबल एनर्जी इंटरकनेक्शन डेवलपमेंट एंड कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन के तत्वावधान में एक ग्लोबल ट्रांसमिशन ग्रिड प्रोजेक्ट अनावृत कर चुका है, जो विश्व-भर में ऊर्जा के सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है.
मुख्य परीक्षा के लिए प्रश्न
 

भारत में नवीकरणीय ऊर्जा को संधारणीय रूप से बढ़ावा देने में क्या चुनौतियाँ हैं? चर्चा कीजिये कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए क्या किया जा सकता है?

What are challenges in promoting sustainable renewable energy in India?  Discuss what can be done to overcome these challenges?


GS Paper 3 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Conservation related issues.

Topic : How the tiger can regain its stripes?

संदर्भ

भारत में बाघों की संख्या में वृद्धि करने के लिए दो वैधानिक प्रावधान किये गए हैं:

  1. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972
  2. वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980

यह दोनों अधिनियम प्रोजेक्ट टाइगर को मजबूती तथा वैधानिक आधार प्रदान करते है.

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण

  • राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन गठित एक वैधानिक निकाय है जिसका गठन वन्य जीव (सुरक्षा) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत किया गया है.
  • इस निकाय के गठन का उद्देश्य बाघों को अधिनियम के तहत प्रदत्त शक्तियों और कार्यों के अनुसार संरक्षण प्रदान करना है. इसके लिए निकाय समय-समय पर परामर्श तथा आदर्श-मार्गदर्शन निर्गत करता है. ये परामर्श और मार्गदर्शन बाघों की परिस्थिति, संरक्षण के कार्यान्वयन की स्थिति और विशेष रूप से गठित समितियों की अनुशंसाओं पर आधारित होते हैं.

NTCA के कार्य

  • व्याघ्र अभयारण्यों के सञ्चालन में आदर्श मानकों के पालन को सुनिश्चित करना.
  • अभयारण्य प्रणाली पर विशेष ध्यान देते हुए बाघों के संरक्षण की योजना तैयार करना.
  • संसद के समक्ष वार्षिक प्रतिवेदन एवं लेखा-प्रतिवेदन उपस्थापित करना.
  • राज्य-स्तर पर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में संचालन समिति तथा व्याघ्र संरक्षण फाउंडेशन का गठन करना.
  • बाघों के नए अभ्यारण्य घोषित करने के प्रस्ताव पर स्वीकृति प्रदान करना.

समस्याएँ एवं चुनौतियाँ

विश्व के देशों में भारत का उन देशों में आता है जहाँ प्रति-व्यक्ति जंगल सबसे कम है. जंगल जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने वाला एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण तंत्र होता है क्योंकि यह कार्बन को सोख लेता है. जंगलों को काटे जाने से बाघों के निवास स्थान संकुचित होते जा रहे हैं.

भारत और पूरे विश्व में व्याघ्र संरक्षण में एक बहुत बड़ी समस्या उनका शिकार है. जब तक बाघ के शरीर के अवयवों का अवैध बाजार रहेगा तब तक यह समस्या रहेगी.

भारत के सुन्दरबन में जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का जल-स्तर बढ़ रहा है जिसका बहुत बड़ा दुष्प्रभाव उस क्षेत्र में रहने वाले रॉयल बंगाल बाघों पर हुआ है.

संरक्षण के लिए किये गये प्रयास

राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने वन संरक्षकों के लिए एक मोबाइल अनुश्रवण प्रणाली विकसित की है जिसका नाम M-STrIPES (Monitoring System for Tigers – Intensive Protection and Ecological Status) दिया गया है.

2010 में St. Petersburg व्याघ्र शिखर सम्मलेन में बाघों की आबादी वाले 13 देशों के नेताओं ने यह संकल्प लिया था कि बाधों की संख्या की दुगुनी कर दी जायेगी और इसके लिए एक नारा दिया था – ‘T X 2’

भारत में 1973 में ही बाघों के संरक्षण के लिए Project Tiger आरम्भ किया गया था. इस परियोजना के तहत अभी तक देश में 50 अभ्यारण्य बनाए जा चुके हैं जिनका भौगोलिक क्षेत्रफल देश का 2.2% है.

विश्व बैंक के वैश्विक व्याघ्र पहल (Global Tiger Initiative – GTI) कार्यक्रम ने बाघों से सम्बंधित एजेंडा को सबल बनाने के लिए वैश्विक प्रतिभागियों को प्रेरित किया है. कालांतर में यह कार्यक्रम वैश्विक व्याघ्र पहल परिषद् (Global Tiger Initiative Council – GTIC) का रूप ले चुकी है. इस परिषद् के अन्दर दो अलग-अलग उप कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं जो हैं – वैश्विक व्याघ्र मंच कार्यक्रम (Global Tiger Forum) और वैश्विक हिम तेंदुआ पारिस्थितिकी सुरक्षा कार्यक्रम (Global Snow Leopard Ecosystem Protection Program).

कुछ विवादास्पद परियोजनाएँ

  • कान्हा और पेंच बाघ रिजर्व को जोड़ने वाले गलियारे में राजमार्ग और रेलवे लाइनों का विस्तार किया जा रहा है.
  • महाराष्ट्र के मेलघाट बाघ रिजर्व से होकर एक रेलवे लाइन का निर्माण किया जा रहा है.
  • मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व का लगभग 100 वर्ग किलोमीटर केन-बेतवा नदी लिंकिंग परियोजना में चला जाएगा.

प्रीलिम्स बूस्टर

 

बाघों की संख्या :

मध्य प्रदेश में  सर्वाधिक बाघ हैं (526 ), उसके बाद कर्नाटक में (524) हैं. तीसरे स्थान पर उत्तराखंड है, जहाँ 442 बाघ हैं.

मुख्य परीक्षा के लिए प्रश्न
 

प्रोजेक्ट टाइगर के विषय में संक्षिप्त चर्चा करें.

What do you know about the Project Tiger?


GS Paper 3 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Indian Economy and issues relating to planning, mobilization of resources, growth, development and employment.

Topic : NATIONAL INVESTMENT AND INFRASTRUCTURE FUND (NIIF)

NIIF क्या है?

  • NIIF लंबित आधारभूत परियोजनाओं हेतु विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए भारत में एक प्रमुख मंच के रूप में कार्य करता है.
  • ज्ञातव्य है कि यह कोष (NIIF) 2015 में भारत सरकार द्वारा 40,000 करोड़ रु. की राशि से देश में अवसंरचनात्मक परियोजनाओं में निवेश करने के लिए गठित की गई थी जिसमें 49% धन सरकार निवेश करेगी और शेष धन तृतीय-पक्ष (third-party) निवेशकों, जैसे – सॉवरेनसंपदा कोष (sovereign wealth funds), बीमा तथा पेंशन कोष, दान इत्यादि से उगाहा जायेगा.
  • यह ऊर्जा, परिवहन, आवास, जल, कचरा निपटान तथा अन्य आधारभूत संरचना से सम्बंधित क्षेत्रों में निवेश करता है.
  • वर्तमान में NIIF तीन अलग-अलग निवेश कोष चला रहा है जो सभी SEBI में वैकल्पिक निवेश फण्ड के रूप में पंजीकृत हैं.

तीन अलग-अलग निवेश कोष

मास्टर कोष :- यह कोष मुख्य रूप से सड़कों, बंदरगाहों, हवाई अड्डों, बिजली कारखानों आदि अवसंरचना के शुद्ध प्रक्षेत्रों में निवेश करता है.

कोषों का कोष :- यह उन कोषों में निवेश करता है जिनको वैसे कोष प्रबंधक संभाल रहे हैं जिन्होंने अवसंरचना एवं सम्बद्ध प्रक्षेत्रों में अच्छा काम किया है. यह कोष जिन प्रक्षेत्रों पर अधिक ध्यान देता है, वे हैं – हरित अवसरंचना, मध्य आय एवं सस्ती आवास योजना, अवसंरचनात्मक सेवाएँ और सम्बद्ध प्रक्षेत्र.

रणनीतिक निवेश कोष :- सेबी में पंजीकृत होने वाला तीसरा निवेश कोष रणनीतिक निवेश कोष कहलाता है और इसे वैकल्पिक निवेश कोष 2 का नाम दिया गया है.

मुख्य परीक्षा के लिए प्रश्न
 

“प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, साथ ही वित्तीय स्थिरता, विकास और संवृद्धि की एक निश्चित अवस्था प्राप्त करने में भी सहायता करता है.” इस कथन के संदर्भ में विभिन्न सरकारी पहलों की चर्चा कीजिये.

“Foreign direct investment (FDI) plays an important role in development of the Indian economy. It also helps in achieving a certain stage of financial stability, development and growth.” Discuss various government initiatives in the context of this statement.


Prelims Vishesh

SRIJAN :-

रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में रक्षा उत्पादन विभाग, एमओडी के पोर्टल सृजन का शुभारम्भ किया, जो एक ‘वन स्टॉप शॉप’ ऑनलाइन पोर्टल है और यह वेंडर्स (कंपनियों) को ऐसे सामानों की जानकारी देता है, जिनका स्वदेशीकरण किया जा सकता है.

Swasthya Portal :-

  • इस पोर्टल को जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा आनावृत किया गया है.
  • यह ऑनलाइन पोर्टल वन-स्टॉप सॉल्यूशन के रूप में कार्य करेगा जो जनजातियों के स्वास्थ्य और पोषण से संबंधित सभी जानकारी प्रस्तुत करेगा.
  • पोर्टल का प्रबंधन जनजातीय कार्य मंत्रालय के उस उत्कृष्टता केंद्र के द्वारा किया जाएगा जो स्वास्थ्य एवं पोषण के विषय में ज्ञान प्रबंधन से जुड़ा हुआ है. 

National Health Authority :-

  • आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत जनस्वास्थ्य एवं बीमा कार्यक्रम को लागू करने के लिए जो सर्वोच्च निकाय उत्तरदायी है उसका नाम राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) है.
  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण उस राष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसी के स्थान पर लाया गया है जो 23 मई, 2018 से पंजीकृत सोसाइटी के रूप में कार्यशील था.
  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण का प्रशासन एक प्रशासी बोर्ड करता है जिसके अध्यक्ष केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री होते हैं.

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