Sansar डेली करंट अफेयर्स, 11 December 2018

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Sansar Daily Current Affairs, 11 December 2018


GS Paper 1 Source: The Hindu

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Topic :  No religious minority tag to Lingayat/Veerashaiva community

संदर्भ

भारत सरकार ने कर्नाटक उच्च न्यायालय को बताया है कि उसने राज्य सरकार से प्राप्त इस अनुशंसा को अस्वीकार कर दिया है जिसमें लिंगायत और वीरशैव समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक दर्जा देने की बात कही गई है. भारत सरकार ने यह दुहराया कि लिंगायत और वीरशैव समुदाय हिन्दू धर्म के ही अंग हैं.

पृष्ठभूमि

  • लिंगायत और वीरशैव समुदाय बहुत दिनों से अपने लिए एक अलग धर्म का दर्जा दिए जाने की माँग कर रहे हैं. इन दोनों समुदायों में भी इस बात को लेकर मतभेद है. लिंगायतों का कहना है कि वीरशैव हिन्दू हैं, अतः धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा केवल लिंगायतों को ही मिलना चाहिए.
  • इसी वर्ष मार्च में कर्नाटक सरकार ने दोनों समुदायों को धार्मिक अल्पसंख्यक घोषित करने का निर्णय लिया था.

लिंगायत

  • लिंगायतवाद की परंपरा की स्थापना 12वीं सदी में कर्नाटक के एक सामाजिक सुधारक और दार्शनिक बासव द्वारा की गई थी.
  • बासव/बासवन्ना ने सामाजिक व्यवस्था को सुधारने के लिए मानव स्वतंत्रता, समानता, तर्कसंगतता और भाईचारे को आधार बनाने के लिए कहा.
  • लिंगायतों का कहना है कि उनके आदिगुरु बासवन्ना ने जिस शिव को अपना इष्ट बनाया था वे हिन्दू धर्म के शिव नहीं हैं अपितु इष्ट लिंग (निराकार भगवान्) हैं जिसे लिंगायत अपने गले में लटकाते हैं.

वीरशैव

  • वीरशैव शैव-पंथी हैं और मुख्यतः कर्नाटक में रहते हैं.
  • कर्नाटक के अतिरिक्त यह समुदाय केरल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पाया जाता है.
  • वीरशैव का दावा है कि बासवन्ना लिंगायत परंपरा के संस्थापक नहीं थे अपितु वे वीरशैव सम्प्रदाय के अंतर्गत ही एक सुधारक मात्र थे.
  • वीरशैव सम्प्रदाय की जड़ें वेद और आगमों में हैं और यह शिव के अतिरिक्त किसी अन्य भगवान् की पूजा नहीं करता.

बासवन्ना

बासवन्ना 12वीं शताब्दी के एक समाज सुधारक थे. उन्होंने अपने समकालीन शरणों के साथ मिलकर ब्राह्मणों की वर्चस्वता के विरुद्ध एक बहुत प्रबल आध्यात्मिक, सामाजिक तथा धार्मिक विद्रोह चलाया था. बासवन्ना का कहना था कि कर्म ही पूजा है. उन्होंने अपने आन्दोलन में वचनों के माध्यम से महिलाओं को समान दर्जा दिया. बासवन्ना और अन्य शरण सरल कन्नड़ भाषा में वचन कहते थे जिससे कि साधारण से साधारण जन भी उनकी बातों को समझ सके.


GS Paper 2 Source: The Hindu

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Topic :  Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition Rehabilitation and Resettlement Act (Land Acquisition Act), 2013

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड और तमिलनाडु राज्यों को एक याचिका पर अपनी प्रतिक्रिया देने का निर्देश दिया है जिसमें कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इन राज्यों द्वारा भूमि-अधिग्रहण कानून में किये गये संशोधनों का इस आधार पर विरोध किया है कि इन संशोधनों से बल-पूर्वक अधिग्रहण के विरुद्ध केन्द्रीय कानून में विधान किये गये सुरक्षा उपायों को क्षति पहुँची है.

मामला क्या है?

  • गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड और तमिलनाडु राज्यों ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनः स्थापन में उचित क्षतिपूर्ति एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम (भूमि अधिग्रहण नियम, 2013) में कतिपय संशोधन किये थे.
  • इन संशोधनों के विरुद्ध कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दी थी और कहा था कि ये संशोधन अधिग्रहण विषयक केन्द्रीय कानून के मूल ढाँचे के विरुद्ध हैं.
  • याचिका के अनुसार पाँच राज्यों ने अध्यादेश लाकर कई भूमि परियोजनाओं को इन प्रावधानों से मुक्त कर दिया है – सहमति का प्रावधान, सामाजिक प्रभाव का मूल्यांकन, प्रभावित नागरिकों द्वारा आपत्ति एवं स्थानीय निकायों की प्रतिभागिता. जिन परियोजनाओं के लिए ये अध्यादेश लाये गए हैं, वे औद्योगिक गलियारों, एक्सप्रेस मार्गों, राजमार्गों इत्यादि जैसी प्रमुख श्रेणियों की परियोजनाएँ हैं.
  • याचिकाकर्ताओं का कहना था कि राज्य किसी केन्द्रीय कानून के विरुद्ध संशोधन लाने के अधिकारी नहीं हैं, अतः ये संशोधन अवैध घोषित किये जाएँ.
  • याचिका में यह दावा किया गया है कि किये गये संशोधन संविधान की धारा 21 का उल्लंघन हैं, जिसमें गरिमामय रीति से जीने का तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है.

भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुन: स्थापन में में उचित क्षतिपूर्ति एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के मुख्य तथ्य

  • यह अधिनियम उन लोक उद्देश्य की परियोजनाओं की विभिन्न श्रेणियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है जिनके लिए सरकार निजी भूमि का अधिग्रहण कर सकती है.
  • यदि किसी निजी भूभाग का अधिग्रहण किया जाता है तो इस पर 80% प्रभावित परिवारों की सहमति आवश्यक है. यदि यह कोई PPP परियोजना है तो उसके लिए 70% प्रभावित परिवारों की सहमति लेनी होगी.
  • परियोजनाओं का सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन (Social impact assessment – SIA) करना होगा जिसमें उन कारीगरों, श्रमिकों, बटैया धारकों, किराया पर खेती करने वाले किसानों आदि की सहमति लेनी होगी जिनकी आजीविका उस परियोजना से प्रभावित होगी.
  • किसी भी परियोजना के लिए दी गई क्षतिपूर्ति ग्रामीण भूमि के लिए बाजार से चौगुनी और शहरी क्षेत्र के लिए दुगुनी होगी. दुष्प्रभावित कारीगरों, छोटे-मोटे व्यापारियों, मछुआरों आदि को भी एकमुश्त भुगतान किया जाएगा चाहे उनके पास भूमि नहीं भी हो.
  • उपजाऊ, सिंचित और बहु-फसली कृषि भूमि का अधिग्रहण तभी किया जाएगा जब कोई और उपाय न बचा हो. इस प्रकार के भूमि के अधिग्रहण के पश्चात् सरकार को खेती के लिए उतनी ही बड़ी परती भूमि को विकसित करना होगा.
  • यदि सरकार किसी निजी कम्पनी की भूमि लेती है तो प्रभावित लोगों की राहत एवं पुनर्वास का उत्तरदायित्व उस निजी कम्पनी का होगा.
  • राज्य-सरकारों को विवादों के निपटारे के लिए एक निकाय स्थापित करना होगा जिसका अध्यक्ष कोई जिला न्यायाधीश अथवा सात वर्षों का अनुभव वाला अधिवक्ता होगा.
  • सरकार की ओर से यदि कोई त्रुटि होती है तो उसके लिए विभाग का प्रमुख उत्तरदायी होगा.
  • यदि परियोजना अधिग्रहण के पाँच वर्षों के भीतर आरम्भ नहीं होती है तो भूमि को उसके मूल स्वामी अथवा भूमि-बैंक (land bank) को लौटाना होगा.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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Topic :  Fixed Dose Combinations (FDCs)

संदर्भ

एक अध्ययन में पाया गया है कि भारत में उपलब्ध तपेदिक निरोधी 110 निर्धारित खुराक मिश्रण (FDC) वाली दवाओं में से केवल 32 (30% से कम) दवाओं पर ही देश के औषधि नियामक निकाय केन्द्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (Central Drugs Standard Control Organisation – CDSCO) का अनुमोदन प्राप्त है.

इस वर्ष अप्रैल तक CDSCO ने 1,288 FDCs को अनुमोदित किया था. यह संख्या अनुपाततः बहुत अधिक है क्योंकि अमेरिका जैसे कठोरतापूर्वक नियंत्रित औषधि बाजार वाले देश के FDA ने इस प्रकार की 100-200 औषधियों को ही अपना अनुमोदन दिया है.

चिंता का विषय 

  • जो FDC अनुमोदित नहीं हैं उनका दुष्प्रभाव निजी क्षेत्री में उपचार कराये जा रहे लोगों पर मुख्य रूप से होगा.
  • भारत में दवाइयों के बारे में निगरानी तन्त्र कमजोर है, अतः इन औषधियों के चलते होने वाले दुष्प्रभाव की घटनाओं के बारे में कोई आँकड़ा उपलब्ध नहीं है.
  • CDSCO के अनुमोदन की प्रक्रिया में बहुत सारी त्रुटियाँ हैं. CDSCO में कर्मचारियों की कमी है, कर्मचारियों में कौशल की कमी है और अवसरंचना भी पर्याप्त नहीं है. सबसे बड़ा दोष यह है कि CDSCO के प्रमुख महा-औषधि नियंत्रक (Drug Controller General of India – DCG) के पूर्वानुमोदन के बिना ही राज्य के लाइसेंस प्राधिकरण दवाओं के निर्माण का लाइसेंस निर्गत कर देते हैं.

FDC क्या है?

नियत डोज के सम्मिश्रण (FDC) वाली दवाएँ दो या अधिक सक्रिय औषधीय तत्त्वों को एक नियत अनुपात  में मिलाकर तैयार की जाती हैं. अमेरिका के स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने वाली संस्था IMS Health के अनुसार 2014 में भारत में जितनी दवाएँ बिक रही थीं, उनमें आधी FDC ही थी. इस प्रकार भारत ऐसी दवाओं का प्रचालन विश्व भर में सबसे ज्यादा है.

FDC भारत में लोकप्रिय क्यों?

भारत में FDC की लोकप्रियता के मुख्य कारण हैं – बढ़ी हुई प्रभावशीलता, घटे हुए दाम और वितरण में सुविधा. FDC दवाएँ उन रोगों के उपचार में कारगर हैं जो संक्रामक होते हैं, जैसे – HIV, मलेरिया, तपेदिक आदि. ये पुरानी बीमारियों में भी काम आती हैं, विशेषकर उन बीमारियों में जिनमें एक से अधिक विकृतियाँ साथ-साथ होती हैं.

FDC के खतरे

जब एक ही उपचार से जुड़ी अनेक दवाएँ, जैसे – एंटी-बायटिक सम्मिश्रित कर दी जाती हैं तो इसके कारण प्रतिरोध (resistance) उत्पन्न हो सकता है. पिछले दिनों सार्वजनिक विज्ञान पुस्तकालय की पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार भारत में बाजार में उपलब्ध 70% NSAID (non-steroidal anti-inflammatory drug) सम्मिश्रण, जिनका प्रयोग दर्द निवारक के रूप में होता है, बिना भारत सरकार की अनुमति के बेची जा रही हैं.

CDSCO क्या है?

  • केन्द्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के अंतर्गत एक राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरण है.
  • औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम (Drugs and Cosmetics Act) के अनुसार CDSCO इन कार्यों के लिए उत्तरदायी है – नई औषधियों का अनुमोदन, चिकित्सकीय परीक्षण, औषधियों के लिए मानक का निर्धारण, आयात की गई औषधियों की गुणवत्ता पर नियंत्रण एवं राज्यों के औषधि नियंत्रण संगठनों के कार्यकलाप का समन्वयन.
  • CDSCO औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने में समरूपता लाने के लिए राज्य औषधि नियंत्रण संगठनों को विशेषज्ञतापूर्ण परामर्श मुहैया करता है.
  • इसके अतिरिक्त CDSCO और राज नियामक निकाय रक्त एवं रक्त उत्पादों, I.V. द्रवों, टीकों और सीरम जैसी महत्त्वपूर्ण दवाओं की विशेष श्रेणियों के लिए लाइसेंस देने हेतु संयुक्त रूप से उत्तरदायी होते हैं.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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Topic :  Health Ministry notifies four more devices under Drugs and Cosmetics Act

संदर्भ

नेबुलाइजर, रक्तचाप मॉनिटर, डिजिटल थर्मामीटर, ग्लूकोमीटर जैसे बहुधा उपयोग में आने वाले चिकित्सा उपकारों को औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम के अंतर्गत औषधि घोषित कर दिया गया है. ऐसा करने से अब सरकार को इन उपकरणों की गुणवत्ता एवं काम को सुनिश्चित करने की सुविधा हो जायेगी.

इसके लिए देश के सर्वोच्च औषधि परामर्शी निकाय औषधि तकनीकी परामर्शी निकाय (Drug Technical Advisory Body – DTAB) का अनुमोदन ले लिया गया है.

प्रभाव

  • ऊपर बताये गये उपकरणों को औषधि घोषित करने से यह लाभ होगा कि जनवरी 1, 2020 से भारतीय औषधि महानिदेशालय (DCGI) इनके आयात, निर्माण एवं विक्रय को विनियमित कर सकेगा.
  • अब इन उपकरणों को चिकित्सा उपकरण नियम, 2017 में विहित मानकों एवं भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के द्वारा स्थापित अन्य मानकों के अंतर्गत पंजीकृत करना होगा. 
  • इन उपकरणों के निर्माण एवं आयात में लगी हुई कंपनियों को भारतीय महा-औषधि नियंत्रक से आवश्यक अनुमति अथवा लाइसेंस लेना होगा.
  • वर्तमान में 23 चिकित्सा उपकरण भारतीय महा-औषधि नियंत्रक के क्षेत्राधिकार में आते हैं. अब इन नए चार उपकरणों की अधिसूचना निर्गत होने के पश्चात् ऐसे उपकरणों की संख्या 27 हो गई है.

DTAB क्या है?

  • DTAB तकनीकी मामलों के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का सार्वोच्च निर्णायक निकाय है.
  • स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (Director General of Health Services – DGHS) इस वैधानिक निकाय के पदेन अध्यक्ष होते हैं.
  • इसका गठन औषधि एवं प्रासधन अधिनियम के अनुभाग 5 के तहत किया गया है.

GS Paper 3 Source: The Hindu

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Topic :  Regulatory Indicators for Sustainable Energy (RISE) 2018

संदर्भ

विश्व बैंक ने हाल ही में सतत ऊर्जा हेतु नियामक संकेतक, 2018 (Regulatory Indicators for Sustainable Energy (RISE), 2018) का प्रतिवेदन निर्गत किया है जिसमें सतत ऊर्जा से सम्बन्धित नीतियों में अब तक हुई वैश्विक प्रगति का विवरण दिया गया है. यह प्रतिवेदन जलवायु परिवर्तन विषयक संयुक्त राष्ट्र ढाँचा संधि (UN Framework Convention on Climate Change – COP24) पर हुए 24वें पक्षकार सम्मेलन के समय जारी किया गया.

प्रतिवेदन के मुख्य तथ्य

  • प्रतिवेदन में बताया गया कि विश्व के सबसे अधिक ऊर्जा का खपत करने वाले देशों ने नवीकरणीय ऊर्जा नियमों के मामले में 2010 से अच्छे-खासे सुधार कर लिए हैं.
  • ऊर्जा क्षमता के मामले में और भी अधिक प्रगति हुई है क्योंकि 2010 और 2017 के बीच उन्नत नीति ढाँचों (advanced policy frameworks) की वृद्धि का प्रतिशत 10 गुना बढ़ गया है.
  • जिन देशों में बहुत अधिक लोग बिना बिजली के रहते हैं, उन देशों में 75% ने 2017 तक ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ाने के लिए आवश्यक नीतियों एवं विनयमनों का निर्माण कर लिया है. फिर भी सतत ऊर्जा की वैश्विक प्रगति में अभी भी बड़े व्यवधान शेष हैं.
  • देशों का ध्यान मुख्य रूप से बिजली से सम्बन्धित स्वच्छ ऊर्जा नीतियों पर केन्द्रित रहता है. वे उत्तापन (heating) एवं परिवहन को कार्बन विहीन करने से सम्बन्धित नीतियाँ नहीं बना रहे हैं जिनमें वैश्विक ऊर्जा का 80% व्यय होता है.
  • सबसे उल्लेखनीय प्रगति नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर हुई है. RISE के अन्दर आने वाले 37% देशों ने ही 2010 तक राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य निर्धारित किये थे. परन्तु 2017 आते-आते यह प्रतिशत 93% हो गया है.
  • नवीकरणीय ऊर्जा के प्रयोग के लिए 2017 तक 84% देशों ने कानूनी ढाँचा तैयार कर लिया था जबकि 95% देशों ने निजी क्षेत्र को नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को अपनाने और चलाने की अनुमति दे दी थी.
  • चार सतत विकास लक्ष्य 7 (SDG7) के लक्षित क्षेत्रों – नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा सक्षमता, बिजली उपलब्धता एवं स्वच्छ भोजन-निर्माण उपलब्धता – में से अंतिम क्षेत्र ऐसा क्षेत्र है जिसकी सबसे अधिक अवहेलना हुई है और जिसमें नीति-निर्माताओं ने सबसे कम धन का प्रावधान किया है.
  • रसोई के चूल्हों के लिए मानक निर्धारित करने के विषय में तथा स्वच्छ तकनीकों को अपनाने के विषय में उपभोक्ता और निर्माणकर्ताओं को उत्प्रेरण देने के बारे में नहीं के बराबर प्रगति हुई है.

भारतीय परिदृश्य

भारत को नवीकरणीय ऊर्जा की नीलामी में बड़ी सफलता मिली है जिसके फलस्वरूप सौर ऊर्जा के मूल्य में अभूतपूर्व कमी आई है. फिर भी इसकी पूर्ण सम्भावना को साकार करने के लिए अभी भी देश को कुछ बड़ी कमियाँ दूर करनी होंगी, जैसे – स्वच्छ भोजन-निर्माण, उत्तापन एवं परिवहन को कार्बन मुक्त करना आदि.


Prelims Vishesh

Agni-V Missile :-

  • हाल ही में भारत ने ओडिशा के समुद्रतट के पास अब्दुल कलाम द्वीप से पाँच हजार किलोमीटर की मारण-क्षमता वाले प्रक्षेपास्त्र AGNI V का सफल परीक्षण किया है.
  • इस प्रक्षेपास्त्र में 1,500 kg. तक का आणविक आयुध ले जाने की क्षमता है.
  • 17 मीटर लम्बे इस प्रक्षेपास्त्र का भार 50 टन है और यह लगभग पूरे एशिया (पाकिस्तान और चीन सहित) एवं यूरोप तक किसी भी लक्ष्य को भेद सकता है.
  • यह भारत में निर्मित अन्य मिसाइलों की तुलना में सबसे अधिक दूरी तक जा सकती है.

NASA’s Voyager 2 spacecraft :-

  • अरुण एवं वरुण (Uranus and Neptune) ग्रहों के अध्ययन के लिए NASA द्वारा प्रक्षेपित खोजी उपग्रह Voyager 2 अब सौर मंडल से बाहर निकलकर बाह्य अन्तरिक्ष में प्रवेश कर चुका है.
  • यह अभी पृथ्वी से 11 बिलियन मील दूर पहुँच चुका है.
  • अब यह उपग्रह ऐसा पहला अन्तरिक्षयान बन गया है जिसने सौरमंडल के चारों सबसे बड़े ग्रहों – वृहस्पति, शनि, अरुण एवं वरुण – की यात्रा कर चुका है.

Kerala becomes first state to have four international airports :-

  • कन्नूर हवाई अड्डे के उद्घाटन के साथ केरल भारत का ऐसा पहला राज्य बन गया है जहाँ 4-4 अंतर्राष्ट्रीय अड्डे हैं.
  • केरल के अन्य हवाई अड्डे इन नगरों में हैं – तिरुवनंतपुरम, कोच्चि, कोझिकोड.

Kaiga power station-1 creates a world record yet again :-

  • कर्नाटक के कैगा बिजली घर – 1 ने लगातार 941 दिन चलकर निर्बाध रूप से चलने के मामले में विश्व का कीर्तिमान स्थापित कर दिया है.
  • पहले यह कीर्तिमान इंग्लैंड के एक बिजली घर का था जो लगातार 940 दिन चला था.

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