Sansar डेली करंट अफेयर्स, 10 October 2019

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Sansar Daily Current Affairs, 10 October 2019


GS Paper 3 Source: PIB

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UPSC Syllabus : Major crops and cropping patterns.

Topic : World Cotton Day

संदर्भ

विश्व कपास दिवस से सम्बंधित समारोह जेनेवा में 7 अक्टूबर से 11 अक्टूबर तक मनाया जा रहा है.

विश्व कपास दिवस क्या है?

  • यह एक कपास से सम्बंधित समारोह है जिसे विश्व व्यापार संगठन (WTO) आयोजित कर रहा है.
  • आयोजन में जिन अन्य संस्थाओं का सहयोग है, वे हैं – संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO), संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (UNCTAD), अंतर्राष्ट्रीय व्यापार केंद्र (ITC) तथा राष्ट्रीय कपास परामर्शी समिति (ICAC).
  • यह समारोह अफ्रीका के चार देशों के अनुरोध पर आयोजित हो रहा है जिन्हें कॉटन फोर (Cotton 4) देश कहा जाता है. ये देश हैं – बेनिन, बुर्किना फासो, चैड और माली.

आयोजन के उद्देश्य

  • कपास, इसके उत्पादन, रूपांतरण और व्यापार से सम्बद्ध सभी हितधारकों को वैश्विक मान्यता प्रदान करना.
  • कपास के विकास को सुदृढ़ करने के लिए दाताओं और लाभार्थियों को सम्मिलित करना.
  • कपास से सम्बंधित उद्योगों और उत्पादन के लिए निजी क्षेत्र एवं निवेशकों से सहयोग प्राप्त करना.
  • कपास के क्षेत्र में नई तकनीकों के साथ-साथ नए शोध को बढ़ावा देना.

कपास और उसका महत्त्व

  • कपास एक ऐसी वस्तु है जिसका उत्पादन पूरे विश्व में होता है.
  • एक टन कपास के उप्तादन का अर्थ है, औसतन 5 लोगों को वर्ष भर रोजगार मिलना.
  • कपास की फसल सूखी जलवायु वाले क्षेत्रों में भी सरलता से उत्पन्न हो जाती है. वास्तव में विश्व की सिंचित भूमि का मात्र 2.1% ही कपास के उत्पादन में प्रयुक्त होता है, परन्तु पूरे विश्व के 27% कपड़े इसी फसल से उपलब्ध हो जाते हैं.
  • कपास के रेशे का उपयोग कपड़े और परिधान बनाने में होता है. इसके अतिरिक्त खाद्य तेल और पशु चारा जैसी वस्तुएँ भी कपास के बीज से उत्पादित होती हैं.

कुछ विशेष तथ्य

  1. भारत में तरह-तरह का कच्चा कपास होता है. इनमें तमिलनाडु में उपजने वाला SUVIN कपास सबसे लम्बे रेशे वाला होता है.
  2. कर्नाटक के धारवाड़ में रंगीन कपास भी उपजते हैं. इनका रंग गहरा भूरा, हल्का भूरा, हरा और लहसुनिया होता है.
  3. 2011 से 2018 के बीच भारत ने अफ्रीका के सात देशों के लिए तकनीकी सहायता का एक कार्यक्रम चलाया जिसे कॉटन TAP-I कहते हैं. 2.85 मिलियन डॉलर के इस सहायता कार्यक्रम का लाभ जिन देशों को मिला, वे हैं – बेनिन, बुर्किना फासो, माली, चैड, युगांडा, मलावी और नाइजीरिया.

GS Paper 3 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Conservation, environmental pollution and degradation, environmental impact assessment.

Topic : Indian Forest Act amendment

संदर्भ

भारतीय वन अधिनियम, 1927 में केंद्र सरकार द्वारा संशोधन करने के प्रस्ताव को मिजोरम सरकार ने इस आधार पर अस्वीकृत कर दिया है कि इससे उस राज्य को संविधान के अनुच्छेद 371G के अन्दर मिले विशेष प्रावधानों का उल्लंघन होता है.

अनुच्छेद 371G में क्या है?

संविधान के अनुच्छेद 371G में यह प्रावधान है कि मिजो लोगों की धार्मिक और सामाजिक प्रथाओं, वहाँ के नागरिक और आपराधिक कानून, भू-स्वामित्व के हस्तांतरण तथा पारम्परिक कानूनी प्रक्रिया में संसद् तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकती है जब तक इसके लिए उसे मिजोरम विधानसभा की अनुमति न मिले.

भारतीय वन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन

  • संशोधन प्रारूप में वन अधिकारियों को बड़ी शक्तियाँ दी जा रही हैं. वे तलाशी का वारंट निकाल सकते हैं और अपने कार्यक्षेत्र के अन्दर पड़ने वाली भूमि में प्रवेश कर जाँच कर सकते हैं और वन से सम्बंधित अपराधों को रोकने के लिए हथियार का प्रयोग कर सकते हैं. संशोधन वन अधिकारियों को हथियार के प्रयोग करने पर उन्हें क्षमा देने का वादा करता है. ये अधिकारी रेंजर स्तर के नीचे के अधिकारी नहीं होंगे.
  • प्रस्तावित संशोधन में वन विकास के लिए सेस (cess) का प्रस्ताव है जो जंगल से बाहर ले जाए जाने वाले खनन उत्पादों और पानी के आकलित मूल्य का 10% तक होगा. यह राशि एक विशेष कोष में जमा की जायेगी और इसका उपयोग मात्र फिर से जंगल लगाने, जंगल की सुरक्षा करने और अन्य प्रासंगिक उद्देश्यों जैसे वृक्ष रोपण, वन विकास एवं संरक्षण पर खर्च की जायेगी.
  • प्रारूप में “समुदाय” को इस प्रकार परिभाषित किया गया है – सरकारी प्रलेखों के आधार पर लक्षित व्यक्तियों का वह समूह जो किसी विशेष स्थान में रहता है और जिसका सामान्य सम्पदा संसाधनों पर संयुक्त रूप से अधिकार होता है. इस परिभाषा में नस्ल, धर्म, जाति, भाषा और संस्कृति का कोई स्थान नहीं है.
  • प्रस्तावित संशोधन में वन की परिभाषा इस प्रकार है – किसी भी सरकारी प्रलेख में वन अथवा वनभूमि के रूप में अभिलिखित अथवा अधिसूचित कोई भी सरकारी अथवा निजी अथवा संस्थानगत भूमि तथा समुदाय द्वारा वन एवं मैन्ग्रोव के रूप में प्रबंधित भूमि तथा साथ ही ऐसी कोई भी भूमि जिसे केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार अधिसूचित कर अधिनियम के लिए वन के रूप में घोषित करे.
  • भारतीय वन अधिनियम, 1927 की प्रस्तावना में वर्णित थाकि अधिनियम मुख्य रूप से उन कानूनों पर केन्द्रित है जो वन उत्पादों के परिवहन और उन पर लगने वाले कर से सम्बंधित हैं. परन्तु प्रस्तावित संशोधन में अधिनियम के लिए मुख्य विचारणीय विषय अब ये हो गये हैं – वन संसाधनों का संरक्षण, संवर्द्धन और सतत प्रबंधन तथा पारिस्थितिकी तन्त्र की सेवाओं की शाश्वत उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पर्यावरणगत स्थिरता को सुरक्षा तथा जलवायु परिवर्तन एवं अंतर्राष्ट्रीय वचनबद्धताओं से सम्बंधित चिंता.
  • संशोधन में राज्यों की भूमिका पहले से बड़ी कर दी गई है. अब यदि कोई राज्य यह अनुभव करता है कि वन अधिकार अधिनियम (FRA) के अंतर्गत प्रदत्त किसी अधिकार से संरक्षण के प्रयासों में अड़चन आती है तो वह राज्य ऐसे अधिकार में परिवर्तन कर सकता है और इसके लिए सम्बन्धित व्यक्ति को बदले में धनराशि दे सकता है अथवा भूमि दे सकता है अथवा ऐसा कोई भी कदम उठा सकता है जिससे वन में रहने वाले समुदायों का सामाजिक सन्गठन ज्यों का त्यों बना रहे अथवा ऐसे वन समुदायों को कोई ऐसा नया वन खंड दे सकता है जिसका आकार पर्याप्त हो और जहाँ वनवासी ठीक-ठाक सुविधाओं के साथ रह सकें.
  • संशोधन के प्रारूप में वनों की एक नई श्रेणी बनाई गई है– उत्पादन वन. ये वे वन होंगे जहाँ इन वस्तुओं का विशेष रूप से उत्पादन होता है – इमारती लकड़ी, पल्प, पल्प वुड, जलावन, गैर-इमारती वन उत्पाद, औषधीय पौधे अथवा अन्य वन प्रजातियाँ.

भारतीय वन अधिनियम, 1927

  • भारतीय वन अधिनियम, 1927 (Indian Forest Act, 1927) मुख्य रूप से ब्रिटिश काल में लागू पहले के कई भारतीय वन अधिनियमों पर आधारित है. इन पुराने अधिनियमों में सबसे प्रसिद्ध था – भारतीय वन अधिनियम, 1878.
  • 1878 और 1927 दोनों अधिनियमों में वनाच्छादित क्षेत्र अथवा वह क्षेत्र जहाँ बहुत से वन्य जीव रहते हैं. वहाँ आवाजाही एवं वन-उत्पादों के स्थानान्तरण को नियंत्रित किया गया था. साथ ही इमारती लकड़ी और अन्य वन उत्पादों पर चुंगी लगाए जाने का प्रावधान किया गया था.
  • 1927 के अधिनियम में किसी क्षेत्र को आरक्षित वन अथवा सुरक्षित वन अथवा ग्राम वन घोषित करने की प्रक्रिया बताई गई है. 1927 के अधिनियम में यह भी बताया गया है कि वन अपराध क्या है और किसी आरक्षित वन के भीतर कौन-कौन से कार्य वर्जित हैं और अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन के लिए कौन-कौन से दंड निर्धारित हैं.

संशोधनों के विषय में व्यक्त की जा रहीं चिंताएँ

  • इनसे जंगलों पर नौकरशाही का दबदबा बना रहेगा. उदाहरण के लिए किसी अपराध को रोकने के लिए सरकारी कर्मियों को गोली चलाने की छूट दी जा रही है.
  • संशोधन-प्रारूप में कथित अपराधी को बंदी बनाने और ले जाने का प्रावधान किया गया है जो जनजातियों के हित में नहीं है.
  • प्रारूप में यह कहा गया है कि यदि कोई एक व्यक्ति अपराध करता है तो पूरे समुदाय को जंगल में जाने से रोक दिया जाएगा. ऐसा करने से स्पष्तः वनों में रहने वाले निर्धन समुदायों को क्षति पहुँचेगी.
  • संशोधन में ग्रामीण वानिकी को वन अधिकार अधिनियम के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा जा रहा है जिससे भ्रान्ति की स्थिति बनेगी क्योंकि ग्राम सभा पर वन विभाग के अधिकारियों का वर्चस्व हो जाएगा.

GS Paper 3 Source: PIB

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UPSC Syllabus : Disaster and disaster management.

Topic : National Disaster Response Fund (NDRF)

संदर्भ

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) से कर्नाटक और बिहार को 1813.75 करोड़ की अतिरिक्त वित्तीय सहायता मंजूर की है.

विदित हो कि इन राज्यों ने पिछले दिनों बताया था कि उनके राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष धन की कमी है जिसके चलते राहत कार्य में देरी हो रही है, अतः NDRF से अतिरिक्त धनराशि मुहैया कराई जाए.

NDRF क्या है?

  • आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अनुभाग 46 में प्रावधान किया गया NDRF केंद्र सरकार द्वारा प्रबंधित एक ऐसा कोष है जिससे आपदा होने पर राहत एवं पुनर्वास के कार्य के लिए धनराशि खर्च की जाती है.
  • पहले इस कोष का नाम राष्ट्रीय आपदा आकस्मिक कोष (NCCF) हुआ करता था. ज्ञातव्य है कि राज्यों को राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष अलग से उपलब्ध होता है. पैसा कम पड़ जाने पर NDRF उन्हें अतिरिक्त धनराशि उपलब्ध कराता है.

NDRF को पैसा कहाँ से आता है?

  • NDRF के लिए धन की व्यवस्था बजट में कुछ वस्तुओं पर लगने वाले उत्पाद एवं सीमा शुल्क पर सेस लगाकर की जाती है.
  • वर्तमान में एक राष्ट्रीय आपदा आकस्मिक शुल्क (National Calamity Contingency Duty – NCCD) भी लगाया जा रहा है जिसका पैसा NDRF को जाता है.
  • इसके अतिरिक्त आपदा प्रबंधन अधिनियम में यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति अथवा संस्था NDRF को वित्तीय योगदान कर सकता है.
  • NDRF के लेखा की जाँच भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) करता है.

GS Paper 3 Source: Indian Express

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UPSC Syllabus : Awareness in space.

Topic : Geotail

संदर्भ

चंद्रमा की मिट्टी के तत्त्वों का पता लगाने के लिए चंद्रयान 2 में लगे हुए उपकरण CLASS ने Geotail से गुजरते समय सितम्बर महीने में कुछ आविष्ट कणों (charged particles) का पता लगाया था.

Geotail क्या है और कैसे बनता है?

  • Geotail अन्तरिक्ष का वह क्षेत्र है जहाँ से खगोलीय निरीक्षण सर्वोत्तम ढंग से होता है.
  • सूर्य से आविष्ट कणों का अनवरत प्रवाह होता रहता है जिसे “सौर पवन” कहते हैं.
  • ये कण सूर्य के चुम्बकीय क्षेत्र तक फैले होते हैं.
  • पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र सौर पवन के प्लाज्मा को रोक देता है.
  • इसके फलस्वरूप पृथ्वी के चारो ओर एक चुम्बकीय आवरण बन जाता है.
  • सूर्य की ओर वाले पृथ्वी के भाग में यह आवरण पृथ्वी की त्रिज्या से 3-4 गुने बड़े क्षेत्र पर संघनित हो जाता है.
  • वहीं दूसरी ओर, सूर्य के विपरीत भाग में यह आवरण एक पूँछ का आकार ग्रहण कर लेता है जो चंद्रमा के परिक्रमा पथ के भी आगे तक चला जाता है.
  • इसी पूँछ को जियोटेल कहते हैं.
  • हर 29वें दिन पर चंद्रमा छह दिनों के लिए जियोटेल से होकर गुजरता है.

GS Paper 3 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Conservation and pollution related issues.

Topic : Multidisciplinary drifting observatory for the Study of Arctic Climate (MOSAiC) expedition

संदर्भ

आर्कटिक जलवायु के अध्ययन के लिए प्रारम्भ किये गये प्लवमान वेधशाला अभियान (MOSAiC) से जुड़ने वाले विष्णु नंदन भारत के पहले व्यक्ति होंगे.

विष्णु नंदन जिस शोध जलयान में सवार होंगे वह पोलरस्टर्न (Polarstern) नामक एक जर्मन जहाज है. यह जलयान मध्य आर्कटिक की एक बड़ी बर्फीली पट्टी में खड़ा है और धीरे-धीरे आगे की ओर तैर कर बढ़ता जा रहा है.

MOSAiC क्या है?

  • MOSAiC का पूरा नाम आर्कटिक जलवायु अध्ययन हेतु बहु-विषयक प्लवमान वेधशाला (Multidisciplinary drifting observatory for the Study of Arctic Climate) है.
  • यह अभियान आर्कटिक के विषय में होने वाला इतिहास का सबसे बड़ा अभियान है जिसमें उत्तरी ध्रुव पर रहकर समूचे वर्ष भर अध्ययन किया जाएगा.
  • इस अभियान का सूत्रधार जर्मनी में स्थित एल्फ्रेड वेग्नर इंस्टिट्यूट है.
  • इस अभियान 19 देशों के 60 संस्थान शामिल हैं.

अभियान का माहात्म्य

  • आर्कटिक क्षेत्र की जलवायु प्रणाली के विषय में इस अभियान के माध्यम से ऐसी बड़ी-बड़ी जानकारियाँ मिल सकेंगी जो अभी तक हमसे अछूती हैं.
  • आर्कटिक जलवायु की बेहतर समझ से विश्व के अन्य जलवायु प्रदेशों के बीच आर्कटिक जलवायु की स्थिति का भी सही-सही आकलन हो सकेगा.
  • इस अभियान में जिन विषयों के निरीक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, वे होंगे – आर्कटिक के आस-पास का वायुमंडल, समुद्र, समुद्री बर्फ, जैव-भू रसायनिकी और पारिस्थितिकी.

आर्कटिक को समझने की आवश्यकता क्यों?

  • वैश्विक जलवायु परिवर्तन में आर्कटिक का महत्त्व कम करके नहीं आँका जा सकता क्योंकि वैश्विक औसत की तुलना में ताप वृद्धि की दर यहाँ दुगुनी होती है और जाड़ों में तो और भी अधिक होती है.
  • संभावना जताई जा रही है कि आर्कटिक महासागर 21वीं शताब्दी में हिम-रहित हो सकता है.
  • आर्कटिक क्षेत्र में हो रहे जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पूरे उत्तरी गोलार्द्ध के मौसम और जलवायु पर पड़ता है.

Prelims Vishesh

India’s first e-waste clinic :-

मध्य प्रदेश के भोपाल में भारत का पहला ई-कचरा क्लिनिक खुलने जा रहा है जहाँ घरों और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाले कचरे को छांटने, प्रसंस्करण करने और निष्पादन का कम होगा.

Indian Council of World Affairs (ICWA) :-

  • ICWA की स्थापना 1943 में भारतीय बुद्धिजीवियों के समूह द्वारा एक थिंक टैंक के रूप में की गई थी.
  • इसे सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम 1860 (Registration of Societies Act 1860) के तहत गैर-सरकारी, गैर-राजनीतिक और गैर-लाभकारी संगठन के रूप में स्थापित किया गया था.
  • ICWA अधिनियम, 2001 में इसे राष्ट्रीय महत्त्व की संस्था घोषित किया गया था.
  • भारत के उपराष्ट्रपति ICWA के पदेनकार्यकारी अध्यक्ष होते हैं, जबकि विदेश-मंत्री इसके उपाध्यक्ष होते हैं.
  • इस परिषद् में केवल अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध एवं विदेशी मामलों का अध्ययन होता है.
  • यह परिषद् दो बड़े-बड़े महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सम्मलेन करवा चुका है – पहला सम्मलेन 1947 सरोजनी नायडू की अध्यक्षता में किया गया था जो एशियाई देशों के आपसी संबंधों (Asian Relations Conference) के विषय में था. दूसरा सम्मलेन 1994 में हुआ जिसका विषय था संयुक्त राष्ट्र संघ और नई वैश्विक व्यवस्था (New World Order).

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