Sansar डेली करंट अफेयर्स, 08 February 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 08 February 2020


GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Important aspects of governance, transparency and accountability, e-governance- applications, models, successes, limitations, and potential; citizens charters, transparency & accountability and institutional and other measures.

Topic : Supreme Court panel recommends several prison reforms

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि जेलों में कैदियों की ज्यादा भीड़ होना अदालतों की कार्यप्रणाली से जुड़ा मामला है. वह शीघ्र ही इस मामले में दिशानिर्देश जारी करेगा जिससे देश की 1,341 जेलों की दशा में सुधार आएगा.

इन जेलों में 3.83 लाख सजायाफ्ता या विचारणीय कैदी रखने की क्षमता है लेकिन इनमें वर्तमान समय में 4.68 लाख कैदी रह रहे हैं. शीर्ष अदालत ने जेलों में अराजकता की स्थिति पर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही है.

आज की तिथि में भारतीय जेल व्यवस्था में क्या-क्या खामियाँ हैं?

  1. क्षमता से अधिक बंदियों का होना.
  2. इनमें वर्षों से पड़ी हुई महिला कैदियों की समस्या.

कारागारों में सुधार की आवश्यकता

  • कैदियों के भी मानवाधिकार होते हैं और उन्हें कारागार में “पशुओं” की तरह नहीं रखा जा सकता.
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आँकड़ें बताते हैं कि जेल में अपने परिवार और मित्रों से अलग रह रहे कैदी के द्वारा आत्महत्या करने की संभावना 50% अधिक होती है. सामान्य नागरिकों में आत्महत्या की घटनाएँ एक लाख में 11 के अनुपात से होती है जबकि यह अनुपात जेल में एक लाख में 16.9 होता है.
  • भारतीय कारगारों की 3 समस्याएँ हैं – i) कैदियों का कारागार की क्षमता से अधिक होना ii) जेल कर्मियों की कमी तथा iii) कम निधि की व्यवस्था. अधिक कैदी होने का एक बड़ा कारण जेलों में बहुत अधिक विचाराधीन (under trial) कैदियों का होना है.
  • जेलों में कर्मियों के जितने पद चाहियें उनमें 33% खाली रहते है. इसके अतिरिक्त निरीक्षक स्तर के अधिकारीयों के 36% पद खाली हैं.
  • अधिक कैदी होने के कारण जेल की परिस्थितियाँ मनुष्य के रहने लायक नहीं होती हैं. साथ ही साफ़-सफाई ठीक नहीं होती तथा कैदियों और जेल अधिकारियों के बीच हिंसक संघर्ष भी होते रहते हैं.

विशेष तथ्य

इनकी बहुत बुरी और अमानवीय हालत के कारण जेलों में अपराधियों का पनपना एक आम बात है. भारतीय जेलों को उभरते हुए अपराधियों का विश्वविद्यालय कहा जाता है. जब तक ऐसी परिस्थतियाँ रहती हैं तब तक ये जेल राजनीतिक पहुँच वाले अपराधियों के लिए स्वर्ग तथा सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित विचाराधीन कैदियों के लिए नरक रहेगा.


GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Government policies and interventions for development in various sectors and issues arising out of their design and implementation.

Topic : Cooperative banks under RBI

संदर्भ

केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने देश में सहकारी बैंकों को मजबूत करने के लिए हाल ही में बैंकिंग विनियमन अधिनियम में संशोधन की मंजूरी दे दी. प्रस्‍तावित कानून में भारतीय रिजर्व बैंक के बैंकिंग-विनियमन संबंधी दिशा निर्देशों को सहकारी बैंकों में भी लागू करने का प्रस्‍ताव है. लेकिन प्रशासनिक मामलों में ये बैंक सहकारिता-पंजीयक के दिशा निर्देशों से संचालित होंगे.

इस कदम से सहकारी बैंकों के कामकाज में और अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता आयेगी.

निर्णय का माहात्म्य

  • जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए सहकारी बैंकों का नियमन आरबीआई के दायरे में लाया जा रहा है. इसके पश्चात् केंद्रीय बैंक के बैंकिंग संबंधी सभी दिशा-निर्देश सहकारी बैंकों पर भी लागू होंगे.
  • सहकारी बैंकों का पदाधिकारी बनने के लिए न्यूनतम अर्हता तय होगी, जबकि मुख्य कार्यकारी अधिकारी तथा शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति के लिए पूर्वानुमति की जरुरत होगी.
  • ऋण माफी के लिए भी सहकारी बैंकों को आरबीआई के दिशा-निदेर्शों का पालन करना होगा. उनका भी ऑडिट किया जाएगा.
  • आरबीआई के दायरे में आने के बाद सहकारी बैंकों के खाताधारकों को भी जमा पर पांच लाख रुपए तक की गारंटी मिल सकेगी.
  • बैंक में गड़बड़ी की बात सामने आने पर रिजर्व बैंक को उसका प्रबंधन अपने हाथ में लेने का अधिकार होगा. आरबीआई चरणबद्ध तरीके से इसे लागू करेगा.

सहकारी बैंक क्या होते हैं?

सहकारी बैंक वे वित्तीय इकाइयाँ हैं जिनकी स्थापना सहकारिता के आधार पर होती है और जिनका स्वामित्व उनके सदस्यों के पास होता है. तात्पर्य यह कि किसी सहकारी बैंक के ग्राहक ही इसके स्वामी भी होते हैं.

इन बैंकों में नियमित बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के कई प्रकार के काम भी होते हैं.

भारत में सहकारी बैंकों की बनावट

  • भारत में सहकारी बैंक दो प्रकार के होते हैं – शहरी और ग्रामीण.
  • ग्रामीण सहकारी बैंकों की भी दो श्रेणियाँ होती हैं – अल्पावधि और दीर्घावधि.
  • इनमें अल्पावधि सहकारी बैंकों को कई उपश्रेणियों में बाँटा जा सकता है, जैसे – राज्य सहकारिता बैंक, जिला केन्द्रीय सहकारिता बैंक, प्राथमिक कृषि साख सोसाइटियाँ. जहाँ तक दीर्घावधि सहकारी बैंकों की बात है, ये या तो राज्य सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक कहलाते हैं अथवा प्राथमिक सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक कहलाते हैं.
  • शहरी सहकारिता बैंक दो प्रकार के होते हैं – अनुसूचित अथवा गैर-अनुसूचित. इन दोनों के भी दो प्रकार के होते हैं – बहु-राज्यीय और एक राज्यीय.

सहकारी बैंकों का पर्यवेक्षण कौन करता है?

सहकारिता बैंकों का पंजीकरण राज्य सहकारिता सोसाइटी अधिनियम (States Cooperative Societies Act) के तहत होता है. दो अधिनियमों के अधीन ये बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक के नियमन के दायरे में आ जाते हैं. ये अधिनियम हैं – बैंकिंग नियमन अधिनयम, 1949 और बैंकिंग कानून (सहकारिता सोसाइटी) अधिनियम, 1955.

इसके अतिरिक्त 1966 में इन बैंकों को भारतीय रिज़र्व बैंक की निगरानी में डाल दिया गया था जिसके पश्चात् इनके नियमन में दुहराव की समस्या आन खड़ी हुई.

आगे की राह

देश में विभिन्न श्रेणियों के 1540 सहकारी बैंक हैं. इनमें आठ करोड़ 40 लाख खाताधारकों के पांच लाख करोड़ रुपए से ज्यादा जमा हैं. अधिकतर बैंक ईमानदारी से काम करते हैं, लेकिन कुछ बैंकों के गलत काम के कारण सबकी छवि खराब होती है.


GS Paper 3 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Cyber security related issues.

Topic : Maharashtra tops list of States hit by global medical data leak 

संदर्भ

हाल ही में एक जर्मन साइबरसिटी फर्म ग्रीनबोन सस्टेनेबल रेज़िलिएंस (Greenbone Sustainable Resilience) द्वारा प्रकाशित एक प्रतिवेदन के अनुसार 120 मिलियन से अधिक भारतीय रोगियों का चिकित्सा विवरण लीक हुआ है.

विदित हो कि अभी तक फेसबुक और सोशल मीडिया डाटा लीक की ही प्रतिवेदन सामने आती थी लेकिन अब मेडिकल डाटा भी लीक होने लगी है. करीब 10 लाख भारतीय मरीजों का डाटा लीक हुआ है जिनमें एक्सरे, सीटी स्कैन और डॉक्टर की प्रतिवेदन शामिल हैं.

पृष्ठभूमि 

  • मेडिकल में प्रैक्टिस के लिए एक खास फाइल फॉर्मेट का प्रयोग होता है जिसे डिजिटल इमेजिंग एंड कंम्यूनिकेशन इन मेडिसिंस (DICOM) कहा जाता है.
  • इस फॉर्मेट में मेडिकल से संबंधित फोटो साझा और जमा की जाती हैं. DICOM को पिक्चर आर्काइविंग एंड कंम्यूनिकेशन सिस्टम (PACS) सर्वर पर जमा किया जाता है.
  • प्रतिवेदन में कहा गया है कि इसी सर्वर में सेंध लगी है, क्योंकि यह सर्वर सुरक्षित नहीं था. इस सर्वर पर मरीजों के प्रतिवेदन की तस्वीरें बिना पासवर्ड उपलब्ध हैं.

प्रतिवेदन के मुख्य तथ्य

  • प्रतिवेदन के अनुसार, रोगियों के चिकित्सा विवरण से संबंधित डेटा के लीक होने के मामले में महाराष्ट्र देश में शीर्ष पर है.
  • चिकित्सा डेटा लीक के मामले में कर्नाटक दूसरे स्थान पर है.
  • ग्रीनबोन सस्टेनेबल रेजिलिएंस द्वारा प्रथम प्रतिवेदन अक्टूबर, 2019 में प्रकाशित की गईथी जिसमें बड़े पैमाने पर डेटा लीक की बात बतलाई गई थी.
  • डाटा लीक में सीटी स्कैन (CT scans), एक्स-रे, (X-rays) एमआरआई (MRIs) और यहाँ तक कि रोगियों की तस्वीरें आदि भी शामिल थीं.

प्रतिवेदन के आधार पर देशों का वर्गीकरण

  • नवंबर में प्रकाशित इसकी एक फॉलो प्रतिवेदन विभिन्न देशों की सरकारों द्वारा डेटा लीक की घटनाओं को रोकने के लिये की गई कार्यवाही के आधार पर देशों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है – अच्छा (Good), बुरा (Bad) और बहुत बुरा (Ugly).
  • भारत को प्रतिवेदन में ‘बहुत बुरे’ श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है जो कि अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है.
  • प्रतिवेदन में बताया गया है कि अक्टूबर में प्रकाशित पहली प्रतिवेदन के 60 दिनों बाद ही मरीज़ों के बारे में सूचना देने वाले डेटा ट्रावरों (Data Troves) की संख्या 6,27,000 से बढ़कर 1.01 मिलियन हो गई है तथा मरीज़ों के विवरण का आँकड़ा बढ़कर 105 मिलियन से 121 मिलियन हो गया.
  • प्रतिवेदन के अनुसार, भारत में वर्तमान प्रणाली जो डेटा संग्रहण के लिये उत्तरदायी हैं डेटा के 100% अभिगमन (access) की अनुमति देते हैं.

GS Paper 3 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Achievements of Indians in science & technology; indigenization of technology and developing new technology.

Topic : India develops new vaccine to control classical swine fever

संदर्भ

आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) ने एक सेल कल्चर क्लासिकल स्वाइन फीवर टीकाकरण का निर्माण किया है.

नए टीके का लाभ

  • यह नया टीका, मौजूदा टीके की तुलना में काफी सस्ता होगा.
  • विदित हो कि स्वाइन बुखार का मौजूदा घरेलू टीके 15-20 रुपये प्रति खुराक और कोरिया से आयातित टीका 30 रुपये प्रति खुराक का है. इसकी तुलना में नया टीका केवल दो रुपये में पड़ता है.
  • वैज्ञानिकों ने सैल कल्चर से टीके बनाने की विधि खोज ली है. इस विधि को खोजने के बाद अब खरगोश को मारने नहीं पड़ेंगे. अब तक जो स्वाइन फीवर का वैक्सीन बाजार में मिलता है उसे खरगोश को मार कर उसकी स्प्लीन से बनाया जाता है. एक खरगोश से मात्र 50 टीके बनाए जा सकते हैं, जबकि जरूरत दो करोड़ टीकों की है.

आवश्यकता

  • यह बुखार सूअरों के लिए जानलेवा साबित होता है और इससे देश में इनकी संख्या गिर रही है और सालाना अरबों रुपये का नुकसान होता है.
  • वर्ष 2019 की पशुगणना के अनुसार भारत में सूअरों की तादाद वर्ष 2007 के एक करोड़ 11.3 लाख की तुलना में 6 लाख रह गई है.
  • सूअरों में बर्बर बुखार राष्ट्र के मांस के पूर्ण निर्माण का 10% कम कर देता है.
  • क्लासिकल स्वाइन बुखार संभवतः सूअरों का सबसे घातक कुप्रभाव है जो भारत को हर साल 400 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा रहा है.

आगे की राह

भारतीय स्रोत का उपयोग करके नए टीके का विकास किया गया है तथा कोशिका कल्चर तकनीक का उपयोग करके इसकी लाखों खुराक बहुत आसानी से उत्पादित कर देश की आवश्यकता को आसानी से पूरा किया जा सकता है. अगले छह महीनों में इस वैक्सीन की बिक्री शुरू हो जाएगी. विभिन्न राज्य सरकारों, निजी निर्माताओं और नेपाल सरकार ने इसमें रुचि दिखाई है. उन्होंने कहा कि नए टीके की लागत कम होगी, क्योंकि मौजूदा वैक्सीन की दो खुराक की जगह नये टीके की बस एक खुराक ही एक वर्ष में देनी होगी.


GS Paper 3 Source: PIB

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UPSC Syllabus : Achievements of Indians in science & technology; indigenization of technology and developing new technology.

Topic : Vikram Sarabhai

संदर्भ

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation – ISRO) और परमाणु ऊर्जा विभाग (Department Of Atomic Energy – DAE) द्वारा डॉ. विक्रम साराभाई की 100वीं जयंती के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय स्तर पर एक वर्ष तक चलने वाले कार्यक्रम के तहत विभिन्न आयोजन किये जा रहे हैं.

विक्रम साराभाई और उनका योगदान

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक माने जाने वाले डॉ. विक्रम साराभाई का जन्‍म 12 अगस्‍त, 1919 को अहमदाबाद में हुआ था. अंतरिक्ष विभाग के लिए डॉ. साराभाई के बहुमूल्‍य योगदान सर्वविदित हैं. हालांकि, परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्‍यक्ष के रूप में परमाणु ऊर्जा विभाग के लिए उनके योगदान समान रूप से अत्‍यंत आवश्यक हैं.

मुख्य तथ्य

  • डॉक्टर होमी जे. भाभा की प्लेन क्रैश में मौत के बाद 1966 में इन्होंने परमाणु ऊर्जा विभाग के अध्यक्ष का पद संभाला था.
  • इनको विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में सन 1966 में भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था और 1972 में इन्हें पद्म विभूषण से भी नवाजा गया था.
  • ये इसरो के भी अध्यक्ष रहे. इन्होंने परमाणु उपकरणों को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए प्रयोग किए जाने के पक्ष में अपने तर्क दिए.
  • साराभाई निरस्त्रीकरण और परमाणु उपकरणों के शांतिपूर्ण इस्तेमाल पर होने वाली कई कांफ्रेंस और अंतरराष्ट्रीय पैनलों के अध्यक्ष रहे.
  • 1962 में इन्हें इसरो का कार्यभार सौंपा गया. उनकी निजी संपत्ति को देखते हुए उन्होंने अपने काम के लिए मात्र एक रुपए की टोकन सैलरी में काम किया.
  • डॉक्टर साराभाई ने अहमदाबाद में एक प्रायोगिक उपग्रह के ज़रिए संचार माध्यम बनवाने में भूमिका निभाई जो भारतीय गांवों के लिए एक शैक्षिक टेलीविज़न परियोजना की आवश्यक कड़ी थी. इसे एक साल बाद अमरीकी उपग्रह के साथ शुरू होना था लेकिन बाद में वो भारत निर्मित और भारत से लॉन्च होने वाले उपग्रह में बदल जाना था.
  • वे केरल के थुंबा रॉकेट-लॉंचिंग स्टेशन में होने वाली एक कॉन्फ्रेन्स में हिस्सा लेने के लिए वहां पहुंचे थे. इसके विकास में उनका योगदान था.
  • 30 दिसंबर 1971 में केवल 52 साल की उम्र में ही इनकी मौत हो गई. केरल के एक सरकारी होटल में नींद में ही उन्होंने प्राण त्याग दिया था.

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