Sansar डेली करंट अफेयर्स, 07 March 2020

Sansar LochanSansar DCA1 Comment

Contents

Sansar Daily Current Affairs, 07 March 2020


GS Paper 2 Source: Economic Times

sansar_economic_times

UPSC Syllabus : Indian Constitution- historical underpinnings, evolution, features, amendments, significant provisions and basic structure.

Topic : Delimitation of Constituencies

संदर्भ

केंद्र शासित क्षेत्र जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों असम, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर और नगालैंड के लोकसभा एवं विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के लिए गठित परिसीमन आयोग का अध्यक्ष शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई को नियुक्त किया गया.

यह आयोग जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून के प्रावधानों के तहत जम्मू-कश्मीर में लोकसभा एवं विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन करेगा जबकि परिसीमन कानून 2002 के प्रावधानों के मुताबिक असम, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर और नगालैंड में परिसीमन होगा.

पृष्ठभूमि

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को संघीय क्षेत्र बनाने तथा लद्दाख को एक संघीय क्षेत्र का स्वरूप देने के कारण चुनाव क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन करना अनिवार्य हो गया है.

स्मरण रहे कि 2014 में जब आंध्र प्रदेश से काटकर तेलंगाना बनाया गया था तो उस समय भी विधान सभा क्षेत्रों के परिसीमन की आवश्यकता उत्पन्न हुई थी.

परिसीमन क्या है?

परिसीमन का शाब्दिक अर्थ विधान सभा से युक्त किसी राज्य के अन्दर चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निधारण होता है.

जम्मू-कश्मीर में परिसीमन किस प्रकार होगा?

  • परिसीमन के लिए 2011 की जनगणना के आँकड़ों को आधार बनाया जाएगा.
  • सम्प्रति जम्मू-कश्मीर जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1957 को अमान्य कर दिया गया है और इसलिए अब परिसीमन का कार्य जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (यथा समय-समय पर संशोधित) तथा 2019 के अधिनियम 34 के अनुभाग 59 और 60 में विहित प्रावधानों के अनुसार किया जाएगा.

परिसीमन का कार्य कौन करता है?

  • परिसीमन का काम एक अति सशक्त आयोग करता है जिसका औपचारिक नाम परिसीमन आयोग है.
  • यह आयोग इतना सशक्त होता है कि इसके आदेशों को कानून माना जाता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है.
  • आयोग के आदेश राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित तिथि से लागू हो जाते हैं. इन आदेशों की प्रतियाँ लोक सभा में अथवा सम्बंधित विधान सभा में उपस्थापित होती हैं. इनमें किसी संशोधन की अनुमति नहीं होती.

परिसीमन आयोग और उसके कार्य

  • संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार संसद प्रत्येक जनगणना के पश्चात् एक सीमाकंन अधिनियम पारित करता है और उसके आधार पर केंद्र सरकार एक परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन करती है.
  • इस आयोग में सर्वोच्च न्यायालय का एक सेवा-निवृत्त न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और राज्यों के राज्य निर्वाचन आयुक्त सदस्य होते हैं.
  • इस आयोग का काम चुनाव क्षेत्रों की संख्या और सीमाओं का इस प्रकार निर्धारण करना है कि यथासम्भव सभी चुनाव क्षेत्रों की जनसंख्या एक जैसी हो.
  • आयोग का यह भी काम है कि वह उन सीटों की पहचान करे जो अजा/अजजा के लिए आरक्षित होंगे. विदित हो कि अजा/अजजा के लिए आरक्षण तब होता है जब सम्बंधित चुनाव-क्षेत्र में उनकी संख्या अपेक्षाकृत अधिक होती है.
  • सीटों की संख्या और आकार के बारे में निर्णय नवीनतम जनगणना के आधार पर किया जाता है.
  • यदि आयोग के सदस्यों में किसी बात को लेकर मतभेद हो तो बहुत के मत को स्वीकार किया जाता है.
  • संविधान के अनुसार, परिसीमन आयोग का कोई भी आदेश अंतिम होता है और इसको किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है.
  • प्रारम्भ में आयोग भारतीय राज्य पत्र में अपने प्रस्तावों का प्रारूप प्रकाशित करता है और पुनः उसके विषय में जनता के बीच जाकर सुनवाई करते हुए आपत्ति, सुझाव आदि लेता है. तत्पश्चात् अंतिम आदेश भारतीय राजपत्र और राज्यों के राजपत्र में प्रकाशित कर दिया जाता है.

परिसीमन आवश्यक क्यों?

जनसंख्या में परिवर्तन को देखते हुए समय-समय पर लोक सभा और विधान सभा की सीटों के लिए चुनाव क्षेत्र का परिसीमन नए सिरे से करने का प्रावधान है. इस प्रक्रिया के फलस्वरूप इन सदनों की सदस्य संख्या में भी बदलाव होता है.

परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के अलग-अलग भागों को समान प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराना होता है. इसका एक उद्देश्य यह भी होता है कि चुनाव क्षेत्रों के लिए भौगोलिक क्षेत्रों को इस प्रकार न्यायपूर्ण ढंग से बाँटा जाए जिससे किसी एक राजनीतिक दल को अन्य दलों पर बढ़त न प्राप्त हो.

चुनाव क्षेत्र परिसीमन का काम कब-कब हुआ है?

  • चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन का काम सबसे पहले 1950-51 में हुआ था. संविधान में उस समय यह निर्दिष्ट नहीं हुआ था कि यह काम कौन करेगा. इसलिए उस समय यह काम राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग के सहयोग से किया था.
  • संविधान के निर्देशानुसार चुनाव क्षेत्रों का मानचित्र प्रत्येक जनगणना के उपरान्त फिर से बनाना आवश्यक है. अतः 1951 की जनगणना के पश्चात् 1952 में परिसीमन आयोग अधिनियम पारित हुआ. तब से लेकर 1952, 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन का काम हुआ. उल्लेखनीय है कि 1976 में आपातकाल के समय इंदिरा गाँधी ने संविधान में संशोधन करते हुए परिसीमन का कार्य 2001 तक रोक दिया था. इसके पीछे यह तर्क दिया था गया कि दक्षिण के राज्यों को शिकायत थी कि वे परिवार नियोजन के मोर्चे पर अच्छा काम कर रहे हैं और जनसंख्या को नियंत्रण करने में सहयोग कर रहे हैं जिसका फल उन्हें यह मिल रहा है कि उनके चुनाव क्षेत्रों की संख्या उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में कम होती है. अतः1981 और 1991 की जनगणनाओं के बाद परिसीमन का काम नहीं हुआ.
  • 2001 की जनगणना के पश्चात् परिसीमन पर लगी हुई इस रोक को हट जाना चाहिए था. परन्तु फिर से एकसंशोधन लाया गया और इस रोक को इस आधार पर 2026 तक बढ़ा दिया कि तब तक पूरे भारत में जनसंख्या वृद्धि की दर एक जैसी हो जायेगी. इसी कारण 2001 की जनगणना के आधार पर किये गये परिसीमन कार्य (जुलाई 2002 – मई 31, 2018) में कोई ख़ास काम नहीं हुआ था. केवल लोकसभा और विधान सभाओं की वर्तमान चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं को थोड़ा-बहुत इधर-उधर किया गया था और आरक्षित सीटों की संख्या में बदलाव लाया गया था.

GS Paper 2 Source: Indian Express

indian_express

UPSC Syllabus : Indian Constitution- historical underpinnings, evolution, features, amendments, significant provisions and basic structure.

Topic : How an MP is suspended from Lok Sabha by the Speaker?

संदर्भ

कांग्रेस के सात सांसदों को हाल ही में लोकसभा से उनके अभद्र व्यवहार के चलते निलंबित कर दिया गया. इसके लिए ध्वनि मत से प्रस्ताव पारित किया गया.

लोकसभा का अध्यक्ष एक सांसद को निलंबित क्यों करता है?

यह सामान्‍य नियम है कि लोकसभा की कार्यवाही सुचारू रूप चले उसके लिए लोकसभा का अध्‍यक्ष जिम्मेदार है. यदि कोई सांसद संसद में अभद्र व्यवहार करता पाया जाता है तो लोकसभा के अध्यक्ष को यह अधिकार है कि वह उस सदस्य को किसी ख़ास समय तक संसदीय कार्यवाही से दूर रखे. इसके लिए लोकसभा का अध्यक्ष उस सदस्य को निलंबित कर देता है.

वे कौन से नियम हैं जिनके तहत अध्यक्ष को निलम्बन का अधिकार दिया गया है?

नियम 373

  • नियम संख्‍या 373 के तहत अगर लोकसभा अध्‍यक्ष को प्रतीत होता है कि किसी सदस्‍य का सदन में बर्ताव सदन को चलाने में पूर्ण रूप से बाधक बन रहा है तो वह उस सदस्‍य को त्वरित रूप से सदन से बाहर करा सकते हैं और उस सांसद को पूरे दिन के लिए कार्यवाही में सम्मिलित होने से रोक सकते हैं.
  • परन्तु सदस्‍य फिर भी नहीं संभलें या मामला अति गंभीर हो तो लोकसभा अध्‍यक्ष नियम 374 और 374ए के अंतर्गत कदम उठा सकते हैं.

नियम 374

  • नियम संख्या 374 के अनुसार, लोकसभा अध्‍यक्ष संसद की गरिमा में बाधा पहुँचाने वाले उस सदस्‍य (एक या अधिक) के नाम का ऐलान कर सकते हैं, जिसने/जिन्होंने आसन की मर्यादा तोड़ी हो या नियमों का उल्‍लंघन किया हो और सोच-समझकर कर अपने व्यवहार से सदन की कार्यवाही में बाधा पहुँचाई हो.
  • जब लोकसभा अध्‍यक्ष ऐसे सांसद/सांसदों के नाम ऐलान करते हैं, तो वह एक प्रस्‍ताव सदन के पटल पर रखते हैं. इस प्रस्‍ताव में हो-हल्ला मचाने वाले सांसद का नाम लेते हुए उसके निलंबन की बात कही जाती है.
  • निलम्बन की अवधि का भी जिक्र होता है. यह अवधि अधिकतम सत्र की समाप्‍त‍ि तक की हो सकती है.
  • सदन चाहे तो वह किसी भी समय इस प्रस्‍ताव को रद्द करने का आग्रह भी कर सकता है.
  • इस नियम के अंतर्गत निलम्बित सदस्‍य को निलम्बन की अवधि में सदन की कार्यवाही में किसी प्रकार से सम्मिलित होने का अधिकार नहीं रहता.

नियम 374A

  • लोक सभा के प्रक्रि‍या तथा कार्य-संचालन नि‍यमों के नि‍यम374 क में प्रावधान है कि‍ कि‍सी सदस्‍य द्वारा अध्‍यक्ष के आसन के नि‍कट आकर अथवा सभा में नारे लगाकर या अन्‍य प्रकार से सभा की कार्यवाही में बाधा डालकर लगातार और जानबूझकर सभा के नि‍यमों का दुरूपयोग करते हुए घोर अव्‍यवस्‍था उत्‍पन्‍न कि‍ए जाने की स्‍थि‍ति‍ में अध्‍यक्ष द्वारा सदस्‍य का नाम लि‍ए जाने पर वह सभा की सेवा से लगातार पांच बैठकों के लि‍ए या सत्र की शेष अवधि‍ के लि‍ए, जो भी कम हो, स्‍वत: नि‍लंबि‍त हो जाएगा.
  • इस नियम का उपयोग पहली बार लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने 2013 में किया था.

सांसद के निलंबन को समाप्त करने की प्रकिया क्या है?

अध्यक्ष को किसी सांसद को निलम्बित करने का अधिकार है, परन्तु इस निलम्बन को वापस लेने का अधिकार उसके पास नहीं है. यह अधिकार सदन के पास जो चाहे तो एक प्रस्ताव के द्वारा निलम्बन वापस कर सकता है.

निलंबन का इतिहास

  • नरेंद्र मोदी सरकार के पूर्व के कार्यकाल के दौरान जनवरी 2019 में 45 सांसदों को इस नियम के अंतर्गत निलंबित किया गया था. उस समय की लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन ने हंगामा करने वाले TDP और अन्नाद्रमुक के 45 सांसदों पर कार्रवाईकी थी. उन्होंने लगातार 2 दिवसों में यह कार्रवाई की थी. प्रथम दिवस में 24 सदस्य 5 दिनों के लिए निलंबित किए गए थे और ठीक अगले दिन 21 सांसद चार दिनों के लिए निलंबित किए गए.
  • फरवरी 2014 में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्षा मीरा कुमार के द्वारा अविभाजित आंध्र प्रदेश के 18 सांसदों का निलंबन कर दिया गया. ये सांसद तेलंगाना राज्य के अस्तित्व को लेकर आये प्रस्ताव का समर्थन या विरोध कर रहे थे. मीरा कुमार ने अगस्त 2013 में 12 सांसदों को पाँच दिवसों के लिए निलंबित कर दिया था. मीरा कुमार ने अप्रैल 2012 में 8 सांसदों को निलंबित किया था.
  • मार्च 1989 में राजीव गांधी सरकार के दौरान 63 सांसदों को तीन दिनों के लिए निलंबित किया गया था. सांसदों के निलंबन की संख्या के हिसाब से यह सबसे बड़ी कार्रवाई थी.

GS Paper 2 Source: Economic Times

sansar_economic_times

UPSC Syllabus : Important International institutions, agencies and fora, their structure, mandate.

Topic : Indian Ocean Commission

संदर्भ

6 मार्च, 2020 को भारत पाँचवे पर्यवेक्षक के रूप में हिंद महासागर आयोग में सम्मिलित हुआ. विदित हो कि हिन्द महासागर आयोग समूह में अन्य चार पर्यवेक्षक हैं, जिनके नाम हैं –  माल्टा, चीन, यूरोपीय संघ और OIF (इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन ऑफ ला फ्रैंकोफ़ोनी).

देखा जाए तो भारत के लिए हिन्द महासागर आयोग में एक पर्यवेक्षक के रूप में सम्मिलित होना बेहद महत्त्वपूर्ण है. महत्त्वपूर्ण इसलिए क्योंकि यह आयोग भारत को पश्चिमी हिंद महासागर में अपनी योजनाओं को पहुँचाने में सहायता प्रदान कर सकता है.

विदित हो कि हिन्द महासागर का विस्तार भारत के पश्चिम में अफ्रीका तक है. वहीं दूसरी ओर, भारत के पूर्व में इंडोनेशिया एवं ऑस्ट्रेलिया की सीमाओं तक हिन्द महासागर का विस्तार देखा जा सकता है. इस क्षेत्र में छोटे-छोटे द्वीप तो कई हैं किन्तु मेडागास्कर और श्रीलंका बड़े द्वीप हैं. मालदीव, मॉरीशस, सेशल्स और कोमोरोस छोटे द्वीप समूह हैं.

हिंद महासागर आयोग

  • हिन्द महासागर आयोग (Indian Ocean Commission—IOC) हिन्द महासागर देशों- मेडागास्कर, मॉरीशस और सिशेल्स, के बीच हुए एक समझौते के जरिये जुलाई 1982 में अस्तित्व में आया.
  • जनवरी 1984 में क्षेत्रीय सहयोग का विकास करने हेतु एक सामान्य समझौते पर हस्ताक्षर किए गए. जनवरी 1986 में जाकर फ्रांस और कोमोरो द्वीप समूह हिन्द महासागर आयोग के पूर्ण सदस्य बने.
  • आज की तिथि में हिंद महासागर आयोग के पाँच पूर्णकालिक सदस्य हैं – कोमोरोस, मेडागास्कर, मॉरीशस, रियूनियन (फ्रांस के नियंत्रण में) और सेशल्स.
  • हिंद महासागर आयोग एक अंतर-सरकारी संगठन है जिसका मुख्य कार्य दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में एक सुदृढ़ सागरीय-अभिशासन (Maritime Governance) स्थापित करना है तथा यह आयोग पश्चिमी हिंद महासागर में स्थित द्वीपीय राष्ट्रों को सामूहिक रूप से कार्य करने के लिए एक अवसर प्रदान करता है.
  • आज की तिथि में हिन्द महासागर आयोग में पाँच पर्यवेक्षक सदस्य हैं – भारत, चीन, यूरोपीय यूनियन, माल्टा तथा इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ ला फ्रांसोफोनी (International Organisation of La Francophonie- OIF) हैं.

पश्चिमी हिंद महासागर क्या है?

  • पश्चिमी हिंद महासागर (The Western Indian Ocean- WIO) हिंद महासागर का एक रणनीतिक क्षेत्र है जो अफ्रीका के दक्षिण-पूर्वी तट को हिंद महासागर से तो जोड़ता ही है, साथ ही साथ यह उसे अन्य महत्त्वपूर्ण महासागारों से भी जोड़ता है.
  • पश्चिमी हिन्द महासागर का क्षेत्र हिंद महासागर के प्रमुख चोकपॉइंट्स (Chokepoints) में से एक मोजाम्बिक चैनल के निकट अवस्थित है.
  • विदित हो कि कोमोरोस मोजाम्बिक चैनल के उत्तरी मुहाने पर स्थित है. मोजाम्बिक चैनल की पूर्वी सीमा पर मेडागास्कर अवस्थित है.
  • मोजाम्बिक चैनल का महत्त्व स्वेज नहर के बन जाने के बाद कम हो गया था. पर होर्मुज़ जलसंधि ने इस चैनल के महत्त्व को फिर से बढ़ा दिया. यह जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और दुनिया का एक प्रमुख तेल का चोक पॉइंट है जो कुल तेल के कारोबार का लगभग 30-35 प्रतिशत है.

भारत के लिये महत्त्व

  • भारत ने इस संगठन में समिलित होने का फैसला इसकी बहुआयामी महत्ता को ध्यान में रखकर किया है. भारत अपनी बढ़ती आर्थिक, समुद्री सैन्य क्षमताओं और व्यापक हिन्द-प्रशांत महासागर क्षेत्र में रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं के साथ इस क्षेत्र के देशों के साथ साझेदारी को दृढ़ करने के लिए सदा से इच्छुक रहा है. इस कदम से भारत की पश्चिमी हिंद महासागर के इस प्रमुख क्षेत्रीय आयोग में आधिकारिक पहुँच सुनिश्चित होगी.
  • भारत हिंद महासागर में केंद्र में स्थित है. हम सभी जानते हैं कि भारत की 7517 किलोमीटर की व्यापक तटरेखा है और इसके पास 2 मिलियन वर्ग कि.मी. का अनन्य आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) है. भारत की भौगोलिक स्थिति के चलते इसकी सुरक्षा, वाणिज्य एवं व्यापार समुद्री क्षेत्र के साथ जुड़ा है. हिन्द महासागर आयोग पश्चिमी हिंद महासागर के द्वीपों के साथ भारत की कनेक्टिविटी को सुदृढ़ता प्रदान करेगा.
  • भारत का यह कदम फ्रांस के साथ संबंधों को मजबूत करेगा क्योंकि फ्रांस की पश्चिमी हिंद महासागर में अच्छी-खासी उपस्थिति है. विदित हो कि पिछले वर्ष ही हिंद महासागर पर केंद्रित समुद्री निगरानी उपग्रह प्रणाली को संयुक्त रूप से विकसित करने के उद्देश्य से इसरो और सीएनईएस (फ़्रांस) के मध्य समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए थे. यह समझौता हिन्द महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा के लिए भारत-फ्रांस सहयोग में एक महत्वपूर्ण समझौता माना गया.
  • यह पहल भारत की ‘सागर पहल’; क्षेत्र में सभी के लिये सुरक्षा और विकास ( SAGAR- Security And Growth for All in the Region) नीति को और भी दृढ़ता प्रदान करता है.
  • भारत का यह कदम पूर्वी अफ्रीका के साथ सुरक्षा सहयोग में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

चुनौतियाँ

  • चीन पहले से ही पूर्वी अफ्रीकी देश जिबूती में सैन्य केंद्र, ग्वादर (पाकिस्तान) और हम्बनटोटा (श्रीलंका) में बंदरगाह के निर्माण का कार्य करके अपनी उपस्थिति को दृढ़ता प्रदान कर चुका है. इसलिए यह कहा जा सकता है कि भारत की उपस्थिति से पहले ही चीन ने हिंद महासागर में अपने दखल के बाद इस क्षेत्र की राजनीतिक व सामरिक तस्वीर को पूर्णरुपेण परिवर्तित कर दिया है.
  • हिंद महासागर के चोक पॉइंट्स दुनिया में सामरिक दृष्टि से बेहद जरूरी समझे जाते हैं, जिनमें होर्मुज़, मलक्का और बाब अल-मन्देब जलसंधि प्रमुख हैं. ऐसे में बाह्य शक्तियों की उपस्थिति भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है.
  • यह क्षेत्र केवल व्यापार हेतु ही महत्त्वपूर्ण नहीं, बल्कि वर्तमान में हम विश्व के आधे से अधिक सशस्त्र संघर्ष इसी क्षेत्र में देखते हैं. ऐसे में यह क्षेत्र भारत के लिये मात्र भू-राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भू-सामरिक दृष्टि से भी आवश्यक हो जाता है.

GS Paper 2 Source: The Hindu

the_hindu_sansar

UPSC Syllabus : Government policies and interventions for development in various sectors and issues arising out of their design and implementation.

Topic : Mineral Laws (Amendment) Bill 2020

संदर्भ

लोकसभा में खनिज विधि संशोधन विधेयक 2020 को स्वीकृति दे दी गयी जिसमें कोयला खदानों के पट्टे संबंधी नियमों एवं आवंटन संबंधी प्रावधानों को स्पष्ट किया गया है.

खनिज विधि संशोधन विधेयक 2020

  • इसमें मिश्रित लाइसेंस सह-खदान लीज के लिए कोयला/लिग्नाइट के ब्लॉकों के आवंटन का प्रावधान किया गया है.
  • जिन ब्लॉकों को केंद्र सरकार पहले ही आवंटित कर चुकी है उनके लिए पूर्वानुमति की आवश्यकता को निरस्त कर दिया गया है.
  • यह विधेयक परियोजनाओं के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में गति लाएगा और व्यवसाय की सुगमता को बढ़ावा देगा. इसमें प्रक्रिया को सरलतर बना दिया गया है, अतः इससे उन सभी पक्षकारों को लाभ मिलेगा जो उन क्षेत्रों में कार्यरत हैं जहाँ खनिज पाए जाते हैं.

पृष्ठभूमि

2018 में सरकार ने निजी प्रतिष्ठानों के द्वारा वाणिज्यिक खनन कार्य की अनुमति दे दी थी. परन्तु नीलामी म एन केवल कोयला कम्पनियों को  ही प्रतिभागिता करने दिया गया था.

अगस्त 2019 में सरकार ने खुले विक्रय और सम्बद्ध अवसंरचना, जैसे वाशरी (washeries) के निर्माण के लिए कोयला खनन में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति की घोषणा की थी.

खनिज विधि (संशोधन) विधेयक 2020 के निहितार्थ

  1. यह विधेयक कोयला के खनन में इस्पात और ऊर्जा के अतिरिक्त अन्य व्यवसायियों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है.
  2. इससे कुशल ऊर्जा का एक बाजार तैयार होगा जिससे प्रतिस्पर्धा तो बढ़ेगी ही, साथ ही कोयले के आयात में भी घटत होगी. उल्लेखनीय है कि विगत वर्ष भारत ने 235 मिलियन टन कोयले का आयात किया था. यदि यह विधेयक पहले लागू हो जाता तो 135 मिलियन टन कम कोयला आयात करना पड़ता जिसका मूल्य 171 हजार करोड़ होता.
  3. यह विधेयक कोयला प्रक्षेत्र में काल इंडिया लिमिटेड के एकाधिकार को समाप्त कर देगा.
  4. यह विधेयक विश्व-भर में खननकर्ताओं के द्वारा प्रयोग में लाई गई भूगर्भ खनन की आधुनिकतम तकनीक भारत को उपलब्ध कराने में सहायता पहुँचायेगा.

नया खनन लक्ष्य (New Mining Target)

2018 में भारत सरकार ने निजी प्रतिष्ठानों को वाणिज्यिक खनन की अनुमति देते समय 2020 तक 1 . 5 बिलियन टन के खनन का लक्ष्य निर्धारित किया था. इसमें 1 बिलियन टन खनन कोल इंडिया को करना था और शेष 500 मिलियन टन अन्य प्रतिष्ठानों को करना था. अब इस लक्ष्य को सुधार करके 2023-24 तक 1 बिलियन टन के खनन का लक्ष्य रखा गया है.

खनन की अनुमति कौन देता है?

खनन की अनुमति राज्य सरकार उन सभी खनिजों के लिए देती है जो उस राज्य की सीमा के भीतर अवस्थित हैं. ऐसा प्रावधान खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम, 1957 तथा खनिज छूट नियमावली, 1960 (Mineral Concession Rules, 1960) के तहत किया जाता है. परन्तु, खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम, 1957 की प्रथम अनुसूची में वर्णित खनिजों के खनन के लिए केंद्र सरकार का अनुमोदन अनिवार्य होता है. उल्लेखनीय है कि इस अनुसूची में वर्णित खनिज इस प्रकार हैं – हाइड्रोकार्बन, आणविक खनिज तथा धात्वीय खनिज, जैसे – लौह अयस्क, बॉक्साइट अयस्क, ताम्र अयस्क, सीसा, बहुमूल्य पत्थर, जस्ता और सोना.


GS Paper 3 Source: Indian Express

indian_express

UPSC Syllabus : Conservation related issues.

Topic : What causes coral bleaching at the Great Barrier Reef?

संदर्भ

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल वॉर्मिंग और समुद्र का तापमान बढ़ने से ग्रेट बैरियर रीफ  की हालत बेहद खराब हो सकती है.

प्रवालों का संकट

  • 2,300 किलोमीटर की विशाल प्रवाल भित्ति में कई प्रवाल जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के बढ़ते हुए तापमान के चलते मारे जा चुके हैं और उनके स्थान पर अस्थि-पंजर ही अवशिष्ट रह गये हैं. इस प्रक्रिया को प्रवाल श्वेतीकरण कहते हैं. पानी के गर्म होने पर प्रवालों के ऊपर से सूक्ष्म प्रकाश संश्लेषक काई (photosynthetic algae) उतर जाती है जिससे वे सफ़ेद पड़ जाते हैं. यदि पानी का तापमान घाट जाए तो यह काई फिर से उनपर बैठ सकती है.
  • 2016-17 में इस भित्ति के उत्तरी भागों में दोनों वर्ष अभूतवर्ष श्वेतीकरण देखा गया, जिस कारण उन्हें ऐसी क्षति पहुँची कि उसकी भरपाई होना कठिन है.

ग्रेट बैरियर रीफ  क्या है?

विशाल प्रवाल भित्ति विश्व की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति है जो ऑस्ट्रेलिया के क्वीन्सलैंड के समुद्री तट के निकट प्रवाल सागर में अवस्थित है. इसमें 2,900 से अधिक अलग-अलग भित्तियाँ हैं और 900 प्रवाल द्वीप हैं जो लगभग 344,400 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं.

विशाल प्रवाल भित्ति को बाह्य अन्तरिक्ष से भी देखा जा सकता है. हम कह सकते हैं कि यह विश्व की वह सबसे बड़ी संरचना है जो जीवों द्वारा बनाई गई है. यह भित्ति करोड़ों सूक्ष्म जीवों से बनी हुई है जिन्हें प्रवाल पोलिप (coral polyps) कहते हैं.

प्रवाल भित्तियाँ क्या हैं?

  • प्रवाल भित्तियाँ महासागरों में जैव-विविधता के महत्त्वपूर्ण हॉटस्पॉट हैं. वस्तुतः प्रवाल जेलीफिश और एनिमोन की भाँति Cnidaria श्रेणी के जानवर होते हैं. इनमें व्यक्तिगत पोलिप (polyps) होते हैं जो आपस में मिलकर भित्ति का निर्माण करते हैं. प्रवाल भित्तियों में अनेक प्रकार की प्रजातियों को आश्रय मिलता है.
  • ये भित्तियाँ तटीय जैवमंडल की गुणवत्ता को बनाए रखती हैं.
  • कार्बन डाइऑक्साइड को चूना पत्थर शेल में बदलकर प्रवाल उसके स्तर को नियंत्रित करते हैं. यदि ऐसा नहीं हो तो महासागर के जल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा इतनी बढ़ जायेगी कि उससे पर्यावरण को संकट हो जाएगा.

प्रवाल श्वेतीकरण किसे कहते हैं?

  • मूलतः श्वेतीकरण तब होता है जब प्रवालों से प्राकृतिक रूप से जुड़ी जूक्सेनथेले (zooxanthellae) नामक काई बाहर आने लगती है. ऐसा जल के तापमान बढ़ने से होता है. वस्तुतः यह काई प्रवाल की ऊर्जा का 90% मुहैया करती है. इस काई में क्लोरोफील और कई अन्य रंजक होते हैं. इन तत्त्वों के कारण प्रवालों का रंग कहीं पीला तो कहीं लाल मिश्रित भूरा होता है.
  • जब प्रवाल सफ़ेद होने लगता है तो उसकी मृत्यु तो नहीं होती, परन्तु लगभग मृत ही हो जाता है. कुछ प्रवाल इस प्रकार की घटना से बच निकते हैं और जैसे ही समुद्र तल का तापमान सामान्य होता है तो यह फिर से पुराने रूप में आ जाते हैं.
  • 2016-17 में विशाल प्रवाल भित्ति के उत्तरी भागों में दोनों वर्ष अभूतवर्ष श्वेतीकरण देखा गया, जिस कारण उन्हें ऐसी क्षति पहुँची कि उसकी भरपाई होना कठिन है.

Prelims Vishesh

What is ‘mac-binding’, the condition specified for Internet use in J&K? :-

  • सरकार के द्वारा पिछले दिनों निर्गत एक आदेश के अनुसार जम्मू-कश्मीर में इन्टरनेट सेवा बहाल कर दी गई है, किन्तु इसके लिए सम्पर्क “मैक बाइंडिंग” (mac-binding) के साथ उपलब्ध कराया जाएगा.
  • मैक बाइंडिंग का पूरा नाम – Media Access Control है.
  • यह एक हार्डवेयर पहचान संख्या है जो प्रत्येक डिवाइस के लिए अलग होती है.
  • इन्टरनेट का प्रयोग करने वाले प्रत्येक डिवाइस को एक IP पता निर्धारित कर दिया जाता है.
  • मैक बाइंडिंग का मूल कार्य मैक और IP पते को जोड़े रखना है जिससे कि उस IP पते से आने वाले सभी अनुरोध उसी कंप्यूटर से पूरे किये जा सकें जिसमें वह विशेष मैक पता होता है.
  • इसका अभिप्राय यह हुआ कि यदि IP पता अथवा मैक पता बदलता है तो सम्बंधित डिवाइस इन्टरनेट का प्रयोग नहीं कर पायेगा. इसके अतिरिक्त निगरानी रखने वाले अधिकारी यह पता लगा सकते हैं कि वह कौन-सी विशिष्ट प्रणाली है जिससे कोई ऑनलाइन गतिविधि-विशेष की गई.

Click here to read Sansar Daily Current Affairs – Sansar DCA

February, 2020 Sansar DCA is available Now, Click to Download

Books to buy

Leave a Reply

Your email address will not be published.