Sansar डेली करंट अफेयर्स, 06 February 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 06 February 2020


GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Separation of powers between various organs dispute redressal mechanisms and institutions.

Topic : Gram Nyayalayas

संदर्भ

जिन राज्यों ने ग्राम न्यायालय के गठन की अधिसूचना अभी तक नहीं निकाली है उन राज्यों को निर्देश दिया है उनको सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि चार सप्ताह में इन न्यायालयों गठन कर लें. साथ ही उसने उच्च न्यायालयों को कहा है कि वे इस विषय में राज्य सरकार से परामर्श करके गठन की प्रक्रिया में गति लाएँ.

मामला क्या है?

अभी तक मात्र 11 राज्यों ने ही ग्राम न्यायालयों से सम्बंधित अधिसूचना निर्गत करने के लिए कदम उठाये हैं. कई राज्यों ने ग्राम न्यायालयों का गठन तो कर लिया है पर ये सभी न्यायालय काम नहीं कर रहे हैं. केवल केरल, महाराष्ट्र और राजस्थान में ही ऐसे न्यायालय कार्यशील हैं.

12वीं पंचवर्षीय योजना में यह अपेक्षा थी कि 2,500 ग्राम न्यायालय गठित किये जाएँ. परन्तु अभी तक 208 ग्राम न्यायालय ही देश में काम कर रहे हैं.

ग्राम न्यायालय क्या होते हैं?

देश के ग्रामीण क्षेत्रों में न्यायतन्त्र को गति देने और उसे सुलभ बनाने के लिए ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 (Gram Nyayalayas Act, 2008) के अंतर्गत ग्राम न्यायालयों का गठन करने का प्रावधान है.

यह अधिनियम 2 अक्टूबर, 2009 से प्रभावी है.

ग्राम न्यायालय का स्वरूप

  • किसी ग्राम न्यायालय का अध्यक्ष न्यायाधिकारी कहलाता है जिसके पास वही शक्ति और वही वेतनमान-लाभ आदि होते हैं जोकि एक प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी के पास होते हैं.
  • न्यायाधिकारी की नियुक्ति राज्य सरकार राज्य के उच्च न्यायालय के साथ परामर्श कर के करती है.
  • राज्य सरकार उच्च न्यायालय के साथ परामर्श करके ग्राम न्यायालय के गठन की जो अधिसूचना निकालती है उसमें लिखा होता है कि इस न्यायालय का न्यायाधिकार किस क्षेत्र के ऊपर होगा.
  • यह न्यायालय चलंत न्यायलय बनकर के अपने न्याय क्षेत्र में कहीं भी जाकर काम कर सकता है, परन्तु इसके लिए उसे पहले से जनसाधारण को सूचित करना होगा.
  • ग्राम न्यायालय को व्यवहारिक और आपराधिक दोनों प्रकार के मामलों पर न्यायाधिकार होगा.
  • ग्राम न्यायालय का धन विषयक न्यायाधिकार सम्बंधित उच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित किया जाता है.
  • ग्राम न्यायालयों को ऐसे कुछ साक्ष्य स्वीकार करने की शक्ति मिली हुई है जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत अन्यथा स्वीकार्य नहीं होते.

न्याय प्रक्रिया

  • व्यवहार मामलों में ग्राम न्यायालय कुछ ऐसी विशेष प्रक्रियाओं का अनुसरण कर सकता है जो न्याय के हित में उचित एवं तर्कसंगत हों.
  • ग्राम न्यायालय वाद पर विचार करने के पहले इस बात पर बल देता है कि विवाद का निपटारा आपसी सहमति से हो जाए.

अपील

आपराधिक मामले : ग्राम न्यायालय के किसी न्याय निर्णय के विरुद्ध अपील सत्र न्यायालय में हो सकती है.

व्यवहार मामले : ऐसे मामलों पर ग्राम न्यायालय द्वारा किये गये न्याय निर्णय पर अपील जिला न्यायालय में की जा सकेगी.

माहात्म्य

ग्राम न्यायालयों का गठन न्यायिक सुधार के लिए एक अत्यावश्यक कार्य है क्योंकि इससे जिला न्यायालयों में दायर वादों की संख्या घटेगी. अनुमान तो यह है कि इसके चलते जिला न्यायालयों में लंबित वादों के मामले 50% तक घट सकते हैं.


GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Functions and responsibilities of the Union and the States, issues and challenges pertaining to the federal structure, devolution of powers and finances up to local levels and challenges therein.

Topic : Recommendations of the 15th Finance Commission

संदर्भ

पिछले दिनों संसद में 15वें वित्त आयोग का प्रतिवेदन और साथ ही की गई कार्रवाई से समबन्धित प्रतिवेदन (Action Taken Report) उपस्थापित किया गया. विदित हो कि इस आयोग के अध्यक्ष एन.के. सिंह ने यह प्रतिवेदन दिसम्बर, 2019 में राष्ट्रपति को समर्पित किया था.

राजस्व का वितरण किस प्रकार हुआ है?

  • किस राज्य को करों का कितना अंश दिया जाएगा इसके लिए वित्त आयोग ने 2011 की जनसंख्या के साथ-साथ वन क्षेत्र, कराधान के प्रयास, राज्य के क्षेत्रफल और जनसांख्यिक प्रदर्शन को आधार बनाया है.
  • राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए किये गये प्रयासों का पुरस्कार देने के निमित्त आयोग ने एक मानदंड बनाया है. इस मानदंड में 1971 में राज्य की जनसंख्या तथा 2011 में इसकी प्रजनन दर का अनुपात देखा जाता है और 12.5% की वेटेज दी जाती है.
  • करों को बाँटने के फोर्मुले में राज्य के कुल क्षेत्रफल, वनाच्छादन के क्षेत्रफल और “आय की दूरी” जैसे कारकों का वित्त आयोग द्वारा प्रयोग किया गया है.

वित्त आयोग के मुख्य सुझाव

  • वित्त आयोग ने लम्वत वितरण (vertical devolution) अर्थात् केंद्र और राज्य के बीच कर राजस्व का वितरण 42% से घटाकर 41% कर दिया गया है.
  • आयोग ने कहा है कि वह चाहता है कि एक व्ययगत नहीं होने वाला रक्षा व्यय कोष (non-lapsable fund) बनाने के लिए विशेषज्ञ समूह का गठन हो.

राज्यवार वितरण

  • तमिलनाडु को छोड़कर सभी दक्षिणी राज्यों का अंश घट गया है और इनमें सबसे अधिक हानि कर्नाटक को हुई है.
  • प्रतिस्थापन स्तर (replacement level) के नीचे रह गई प्रजनन दरों वाले कुछ राज्यों के अंश बहुत थोड़ी मात्रा में बढ़े हैं. ये राज्य हैं – महाराष्ट्र, हिमाचल, पंजाब और तमिलनाडु.
  • निम्न प्रजनन दरों वाले कुछ राज्यों के अंश घट गये हैं. ये हैं – आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल.
  • राज्य वित्त विषयक अपने प्रतिवेदन में भारतीय रिज़र्व बैंक ने कहा है कि 2017-18 में सबसे अधिक कर-GSDP अनुपात कर्नाटक में था. परन्तु विडंबना है कि अंश वितरण में इसी राज्य को सबसे अधिक हानि हुई.

GS Paper 2 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Welfare schemes for vulnerable sections of the population by the Centre and States and the performance of these schemes; mechanisms, laws, institutions and bodies constituted for the protection and betterment of these vulnerable sections.

Topic : Pradhan Mantri Matru Vandana Yojana (PMMVY)

संदर्भ

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) के अंतर्गत श्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए राज्यों/संघीय क्षेत्रों और जिलों को पुरस्कृत किया गया है.

श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले राज्य/जिले

  1. योजना के आरम्भ की तिथि से श्रेष्ठतम प्रदर्शन करने वाले एक करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में प्रथम स्थान मध्य प्रदेश को दिया गया और उसके पश्चात् क्रमशः आंध्र प्रदेश और हरियाणा का स्थान रहा.
  2. उसी श्रेणी में एक करोड़ से कम जनसंख्या वाले राज्यों/संघीय क्षेत्रों में प्रथम स्थान दादर नगर हवेली को मिला. तत्पश्चात् क्रमशः हिमाचल और चंडीगढ़ का स्थान रहा.
  3. जहाँ तक जिला-स्तरीय पुरस्कारों का प्रश्न है, एक करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले राज्यों/संघीय क्षेत्रों में पहला स्थान मध्य प्रदेश के इंदौर जिले को मिला. इसी श्रेणी में एक करोड़ से कम जनसंख्या वाले राज्यों/संघीय क्षेत्रों में पहले स्थान पर मिजोरम का सेरचिप्प जिला रहा.

PMMVY क्या है?

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना एक मातृत्व लाभ की योजना है जिसका आरम्भ 2010 में इंदिरा गाँधी मातृत्व सहयोग योजना के नाम से (IGMSY) हुआ था. इस योजना के अंतर्गत पहले बच्चे के जन्म के लिए 19 वर्ष अथवा उससे अधिक उम्र की गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को नकद राशि दी जाती है.इस राशि से बच्चा होने और उसकी देखभाल करने के कारण दिहाड़ी की क्षति का सामना करने वाली महिला को आंशिक क्षतिपूर्ति दी जाती है और साथ ही इससे सुरक्षित प्रसव और उत्तम पोषण का प्रबंध किया जाता है.

  • अपवाद :जो महिलाएँ केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार अथवा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में काम करती हैं अथवा जिन्हें इसी प्रकार का लाभ पहले से मिल रहा है, उनको इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा.
  • वित्त पोषण :यह एक केंद्र संपोषित योजना है जिसमें केंद्र और राज्य की लागत 60:40 होती है. पूर्वोत्तर राज्यों में और तीन हिमालयवर्ती राज्यों में यह अनुपात 90:10 है. जिन केंद्र शाषित क्षेत्रों में विधान सभा नहीं है वहाँ इस योजना के लिए केन्द्रीय योगदान 100% होता है.

समस्या

प्रधानमन्त्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) के कार्यान्वयन में कुछ अड़चनें देखी जा रही हैं. ये अड़चनें इस प्रकार हैं –

  1. तीन वर्ष पूरे हो जाने के पश्चात् भी यह योजना वास्तविक रूप से सार्वभौम नहीं बन पाई है.
  2. अनपढ़ लोगों को इससे सम्बंधित लम्बे-लम्बे कागजात पूरे करने में समस्या हो रही है.
  3. आवेदन की प्रक्रिया में स्त्रियों को घूस देना पड़ता है.

प्रधान मंत्री मातृ वंदना योजना का महत्त्व

आज भी महिलाओं में कुपोषण की समस्या है. भारत में हर तीसरी महिला कुपोषित है और हर दूसरी महिला में रक्ताल्पता की शिकायत है. कुपोषित महिला से जन्मे बच्चे का भार भी कम होता है. जब बच्चा पेट में है, उसी समय से पोषाहार मिले तो इसका लाभ बच्चे को जीवन-भर के लिए मिल जाता है. यह योजना इसी समस्या को केंद्र में रखकर पोषाहार पर विशेष बल देती है.


GS Paper 3 Source: Down to Earth

down to earth

UPSC Syllabus : Awareness in the fields of IT, Space, Computers, robotics, nano-technology, bio-technology and issues relating to intellectual property rights.

Topic : Quantum computing gets funds

संदर्भ

फरवरी 1, 2020 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन के द्वारा प्रस्तुत 2020-21 के केन्द्रीय बजट में राष्ट्रीय कणिका प्रौद्योगिकी एवं अनुप्रयोग मिशन (National Mission on Quantum Technologies and Applications) के लिए आगामी पाँच वर्षों में 8,000 करोड़ रु. का आवंटन प्रस्तावित हुआ है.

कणिका प्रौद्योगिकी क्या है?

कणिका प्रौद्योगिकी के अन्दर ये सब आते हैं – कणिका संगणन, कणिका संचार, कणिका प्रकाशिकी, कणिका सूचना प्रसंस्करण, कणिका इन्टरनेट और कणिका कृत्रिम बुद्धि.

कणिका प्रौद्योगिकी पर बल देने के कारण

  • कणिका कंप्यूटर बहुत ही रोचक एवं उत्तेजनापूर्ण उपकरण है क्योंकि यह साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में आवश्यक जटिल आकलन करने की क्षमता रखता है. कहना नहीं होगा कि आजकल डिजिटल कंप्यूटर इस प्रकार के आकलन किया करते हैं.
  • कणिका संचार से साइबर सुरक्षा बढ़ेगी और इससे अनूठे उंगली के चिन्ह भी प्राप्त हो सकते हैं. साथ ही इन्टरनेट संजाल के लिए यह वर्तमान बैंडविथ में बढ़ोतरी ला सकता है.

कणिका कंप्यूटर क्या है?

  • कणिका यांत्रिकी के गुणधर्मों का उपयोग करके ही कणिका कंप्यूटर काम करते हैं.
  • कणिका कंप्यूटरों में कणिका अंशों अर्थात् क्यूबिट्स (qubits) नामक लॉजिकल इकाइयों का प्रयोग होता है.
  • इन क्यूबिटों को कणिका दशा में डाला जा सकता है जिससे वे एक ही समय 0 और 1 दोनों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं.

शास्त्रीय एवं कणिका कंप्यूटरों में अंतर (Difference between classical and quantum computers)

  • शास्त्रीय कंप्यूटर सूचना को बिट नामक एक बाइनरी फॉर्मेट में प्रसंस्कृत करते हैं जो या तो 0 अथवा 1 के रूप में होते हैं.
  • शास्त्रीय कंप्यूटर में ये सारे बिट एक-दूसरे से स्वतंत्र होकर काम करते हैं. दूसरी ओर, क्वांटम अथवा कणिका कंप्यूटर में एक क्यूबिट की दशा प्रणाली के अंतर्गत काम कर रहे अन्य क्यूबिटों की दशा को प्रभावित करती है जिस कारण वे सभी मिलकर किसी समाधान को सिद्ध कर सकते हैं.

कणिका कंप्यूटर में परिणाम कैसे आते हैं?

पारम्परिक कंप्यूटर किसी समस्या का उत्तर सदैव एक ही देते हैं चाहे कितनी बार ही गणना क्यूँ न की जाए. परन्तु कणिका कंप्यूटर के परिणाम संभावनात्मक अर्थात् प्रोबेबिलिस्टिक (probabilistic) होते हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि ये सदैव एक ही उत्तर नहीं देते. इसलिए कणिका कंप्यूटर का उपयोग करते समय किसी गणना को हजारों या यहाँ तक कि लाखों बार करना पड़ता है और ऐसे में उस उत्तर को सही माना जाता है जिसकी ओर ये सारी संगणनायें आकर मिल जाती हैं.


GS Paper 3 Source: The Hindu

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UPSC Syllabus : Conservation, environmental pollution and degradation, environmental impact assessment.

Topic : Green India Mission

संदर्भ

हरित भारत मिशन (Green India Mission) के अंतर्गत 343.08 करोड़ रु. की अशी निर्गत की है. आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार, इस राशि से 13 राज्यों में 126,915.32 हेक्टेयर भूमि पर वनरोपण का काम होगा.

पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय ग्रीन इंडिया मिशन जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए भारत के आठ मिशनों में से एक है. इसे फरवरी 2014 में सुरक्षा के लिए अनावृत किया गया था; अनुकूलन और शमन उपायों के संयोजन से भारत के कम होते वन आवरण को बहाल करना और जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के लिए तैयार करना.

इस मिशन के माध्यम भारत अपने घटते वन क्षेत्र का संरक्षण, पुनर्वनीकरण और वन क्षेत्र में वृद्धि करना चाहता है. साथ ही अनुकूलन एवं शमन उपायों के द्वारा जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए तैयार होना चाहता है.

राष्ट्रीय ग्रीन इंडिया मिशन के उद्देश्य

  • भारत के घटते वन आवरण की रक्षा, पुनर्स्थापन और संवर्द्धन करना.
  • अनुकूलन के संयोजन के साथ-साथ शमन उपायों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन का जवाब देना.
  • वन आधारित आजीविका आय में वृद्धि करना.
  • वर्ष 2020 में वार्षिक कार्बन अनुक्रम में 50 से 60 मिलियन टन की वृद्धि करना.

राष्ट्रीय ग्रीन इंडिया मिशन के लक्ष्य

  • वन तथा वृक्ष क्षेत्र को 5 मिलियन हेक्टेयर तक बढ़ाते हुए इतने ही क्षेत्र के वृक्षों तथा वनों की गुणवत्ता में सुधार लाकर 3 मिलियन परिवारों की वन आधारित आजीविका आय में वृद्धि करना है.
  • सभी प्रकार की भूमि जैसे-ग्राम की जमीन, सामुदायिक भूमि, झूम कृषि क्षेत्र, आर्द्रभूमि और निजी खेती वाली जमीन इसके अंतर्गत वनारोपण हेतु अनुमन्य है.
  • इस मिशन के अंतर्गत विभिन्न पारिस्थितिकी सेवाओं जैसे- जैव विविधिता, जल, बायोमास (जैव ईंधन), मैंग्रोव संरक्षण, आर्द्र,भूमि, संकटग्रस्त प्राकृतिक आवास आदि को प्रमुखता दी जाएगी.
  • यह मिशन विकेंद्रीकृत भागीदारी प्रक्रिया के माध्यम पूरा किया जायेगा जिसमें जमीनी स्तर के संगठनों तथा स्थानीय समुदायों के द्वारा योजना निर्माण, निर्णय प्रक्रिया, कार्यक्रम के क्रियान्वयन तथा इसकी निगरानी का कार्य किया जाएगा.
  • इस मिशन की निगरानी 4 स्तरों पर की जाएगी जिसमें मुख्यतः स्थानीय समुदायों तथा कर्मचारियों द्वारा स्वत: निगरानी, रिमोट (दूरवर्ती) सेंसिंग (समझ) तथा भौगोलिक सूचता तंत्र (जीआईएस) और किसी अन्य तीसरी संस्था से निगरानी करवाना शामिल है.

राष्ट्रीय ग्रीन इंडिया मिशन के घटक

  • हरियाली” (वृक्षारोपण की तुलना में व्यापक) के लिए समग्र दृष्टिकोण: मिशन की परिकल्पना है कि हरियाली पेड़ों और वृक्षारोपण से परे जाएगी ताकि हरियाली संरक्षण और बहाली दोनों को समाहित कर ले.
  • भेद्यताऔर ‘संभावित’ हस्तक्षेप के मानदंड: मिशन की परिकल्पना है कि सबसे पहले परियोजना क्षेत्रों / उप परिदृश्यों / उप-जलक्षेत्रों का पता लगाएं ताकि वे क्षेत्र मिशन की सेवाओं द्वारा अपने कार्बन सिंक को बढ़ा सके.
  • कार्यान्वयन के लिए एकीकृत क्रॉस-सेक्टोरल दृष्टिकोण: मिशन एक एकीकृत दृष्टिकोण को बढ़ावा देगा जो जंगलों व गैर-वन सार्वजनिक भूमि के साथ-साथ निजी भूमि के साथ-साथ परियोजना इकाइयों / उप परिदृश्य / उप-जलक्षेत्रों में व्यवहार करता है. आजीविका निर्भरता, उदाहरण के लिए जलाऊ लकड़ी की जरूरत और पशुधन चराई, अंतर-क्षेत्रीय अभिसरण (जैसे, पशुपालन, वन, कृषि, ग्रामीण विकास और ऊर्जा) का उपयोग करके संबोधित किया जा सके.

राष्ट्रीय ग्रीन इंडिया मिशन भारत सरकार की एक अद्भुत पहल है क्योंकि इस मिशन के तहत भारत अपने घटते वन क्षेत्र का संरक्षण, पुनर्वनीकरण और वन क्षेत्र में वृद्धि कर सकेगा जो जलवायु परिवर्तन के वैश्विक खतरे से निपटने में मददगार साबित होगा.


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