Sansar डेली करंट अफेयर्स, 03 October 2020

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Sansar Daily Current Affairs, 03 October 2020


GS Paper 3 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Conservation, environmental pollution and degradation, environmental impact assessment.

Topic : Stockholm convention

संदर्भ

कैबिनेट ने स्टॉकहोम समझौते (Stockholm convention) के तहत सूचीबद्ध सात स्थायी कार्बनिक प्रदूषकों (Persistent Organic Pollutants- POPs) के सत्यापन को स्वीकृति दी और प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए भविष्य में सत्‍यापन के लिए अपनी शक्तियां केन्‍द्रीय विदेश मंत्री (एमईए) और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन (एमईएफसीसी) मंत्री को सौंप दी हैं. 

स्‍थायी कार्बनिक प्रदूषक (POPs): POPs चिह्नित रसायनिक पदार्थ हैं, जिनकी विशेषता इस प्रकार है-

  • पर्यावरण में दीर्घकाल तक उपस्थिति
  • सजीवों के फैटी एसिड में जैव-संचय
  • मानव स्वास्थ्य तथा पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव
    • POPs के संपर्क में आने से कैंसर हो सकता है, केंद्रीय और परिधीय तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुँचता है, प्रतिरक्षा प्रणाली संबंधी बीमारियाँ होती है, प्रजनन संबंधी विकार उत्पन्न होते हैं और सामान्य शिशुओं एवं बच्‍चों का विकास बाधित हो सकता है.
  • ये लॉन्ग रेंज एनवायरमेंटल ट्रांसपोर्ट (LERT) की प्रकृति रखते हैं.

स्टॉकहोम अभिसमय

यह एक वैश्विक संधि है जो जैविक प्रदूषण तत्त्वों से सम्बंधित है. इसमें मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण की रक्षा के लिए अत्यंत खतरनाक और बहुत समय तक चलने वाले रसायनों के उत्पादन, प्रयोग, व्यापार, विमुक्ति एवं भंडारण को सीमित करने तथा अंततोगत्वा समाप्त करने पर बल दिया गया है.

स्मरणीय जानकारी

  • प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने दीर्घस्‍थायी कार्बनिक प्रदूषकों (पीओपी) के बारे में स्टॉकहोम समझौते में सूचीबद्ध सात (7) रसायनों के सत्‍यापन की मंजूरी दे दी है.
  • मंत्रिमंडल ने घरेलू नियमों के तहत विनियमित की गई प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के उद्देश्‍य से पीओपी के संबंध में अपनी शक्तियां केन्‍द्रीय विदेश मंत्री (एमईए) और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन (एमईएफसीसी) मंत्री को सौंप दी हैं.
  • विदित हो कि भारत ने अनुच्छेद 25 (4) के अनुसार 13 जनवरी, 2006 को स्टॉकहोम समझौते की पुष्टि की थी.
  • सुरक्षित वातावरण प्रदान करने और मानव स्वास्थ्य जोखिमों को दूर करने की दिशा में अपनी प्रतिबद्धता को ध्‍यान में रखते हुए, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने पर्यावरण (संरक्षण) कानून, 1986 के प्रावधानों के अंतर्गत 5 मार्च 2018 को ‘दीर्घकालिक जैविक प्रदूषकों के विनियमन’ को अधिसूचित किया था.
  • विनियमन में निम्नलिखित सात रसायनों के उत्‍पादन, व्यापार, उपयोग, आयात और निर्यात को प्रतिबंधित कर दिया, जो स्टॉकहोम समझौते के अंतर्गत पीओपी के रूप में पहले से ही सूचीबद्ध हैं.
  1. क्लोरडिकोन
  2. हेक्साब्रोमोडीफिनाइल
  3. हेक्साब्रोमोडीफिनाइल इथर
  4. पेंटाब्रोमोडीफिनाइल इथर
  5. पेंटाक्लोरोबेंजीन
  6. हेक्साब्रोमोसाइक्लोडोडीकेन,
  7. हेक्साक्लोंरोबूटाडीन

महत्त्व

  • पीओपी के सत्‍यापन के लिए कैबिनेट की मंजूरी पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की रक्षा के संबंध में अपने अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करने की भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है.
  • यह नियंत्रण उपायों को लागू करने, अनजाने में उत्पादित रसायनों के लिए कार्य योजनाओं को विकसित और कार्यान्वित करने, रसायनों के भंडार के आविष्कारों को विकसित करने और समीक्षा करने के साथ-साथ अपनी राष्ट्रीय कार्यान्वयन योजना (एनआईपी) को अद्यतन करने के लिए पीओपी पर सरकार के संकल्प को भी दर्शाता है.
  • सत्‍यापन प्रक्रिया भारत को एनआईपी को आधुनिक बनाने में वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) वित्तीय संसाधनों तक पहुँचने में समर्थ बनाएगी.

वैश्विक पर्यावरण सुविधा’ (GLOBAL ENVIRONMENT FACILITY – GEF)

  • GEF पर्यावरण सम्बन्धी परियोजनाओं को अनुदान देने की एक प्रणाली है.
  • Global Environment Facility 1992 के Rio Earth Summit के अवसर पर स्थापित हुआ था.
  • इसका उद्देश्य पृथ्वी के सर्वाधिक विकट पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान में सहायता पहुँचाना है.
  • यह एक वित्तीय संगठन है जो स्वतंत्र रूप से निधि मुहैया कराता है जो इन परियोजनाओं से सम्बंधित हैं – जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन, अंतर्राष्ट्रीय जल, भूमि क्षरण, ओजोन परत, जैविक प्रदूषण, पारा, सतत वन प्रबन्धन, खाद्य सुरक्षा, आत्मनिर्भर नगर आदि.
  • GEF में 183 देशों की भागीदारी है. साथ ही इसके अन्य भागीदार हैं – अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ, सामाजिक संगठन, निजी क्षेत्र.
  • GEF विकासशील देशों को अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय संधियों तथा समझौतों के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए निधि मुहैया करता है.
  • Global Environment Facility के निधि का प्रबंधन विश्व बैंक करता है.

इस टॉपिक से UPSC में बिना सिर-पैर के टॉपिक क्या निकल सकते हैं?

 

बेसल संधि

  • इस संधि को 22 मार्च 1989 को हस्ताक्षर के लिए रखा गया था.
  • इस पर कुल मिलाकर 187 देशों ने हस्ताक्षर किये हैं.
  • हैती और अमेरिका ने संधि पर हस्ताक्षर कर दिए हैं परन्तु स्वीकृत नहीं किया है.
  • यह संधि 5 मई, 1992 से लागू है.
  • यह एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है जिसका उद्देश्य खतरनाक कचरे को एक देश से दूसरे देश ले जाने की गतिविधियों को घटाना है. इसमें इसपर विशेष बल दिया गया है कि विकसित देशों से अल्प-विकसित देशों तक ये खतरनाक कचरे नहीं पहुँचे.
  • जिन कचरों को यह संधि रोकती है उनमें रेडियोधर्मी कचरे को शामिल नहीं किया गया है.
  • संधि का उद्देश्य उत्पादित कचरे की मात्रा और विषाक्तता को कम से कम करना है जिससे कि उनका प्रबंधन पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित हो.
  • बेसल संधि खतरनाक कचरे के सुचारू प्रबंधन के लिए अल्पविकसित देशों को सहायता देने का प्रावधान भी करती है.

रॉटर्डम संधि

यह संधि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में कुछ हानिकारक रसायनों एवं कीटनाशकों की आवाजाही से संबधित है. यह संधि न केवल मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को सुरक्षित करने के अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को बढ़ावा देती है, अपितु देशों को यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता देती है कि वे संधि-पत्र में अनुसूचित खतरनाक रसायनों और कीटनाशकों के आयात के विषय में उचित निर्णय लें.

मेरी राय – मेंस के लिए

 

POPs के सत्‍यापन के लिये कैबिनेट की मंज़ूरी पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की रक्षा के संबंध में अपने अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करने की भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. यह नियंत्रण उपायों को लागू करने, अनजाने में उत्पादित रसायनों के लिये कार्य योजनाओं को विकसित और कार्यान्वित करने, रसायनों के भंडार के आविष्कारों को विकसित करने तथा समीक्षा करने के साथ-साथ अपनी राष्ट्रीय कार्यान्वयन योजना (NIP) को अद्यतन करने के लिये POPs पर सरकार के संकल्प को भी दर्शाता है. सत्‍यापन प्रक्रिया भारत को NIP को आधुनिक बनाने में वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) वित्तीय संसाधनों तक पहुँचने में सक्षम बनाएगी.


GS Paper 3 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Conservation of Wildlife In India.

Topic : Wildlife Protection Act (WPA), 1972

संदर्भ

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 [Wildlife Protection Act (WPA), 1972] में एक संशोधन प्रस्तावित किया है, जो बाघ आरक्षित क्षेत्रों (tiger reserves) की भांति हाथी आरक्षित क्षेत्रों और गलियारों (elephant reserves and corridors) को विधिक दर्जा प्रदान करेगा.

  • हाथी आरक्षित क्षेत्र या गलियारे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WPA) या पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत शामिल नहीं हैं तथा साथ ही ये किसी भी राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (National Board of Wildlife: NBWL) के दायरे से भी बाहर हैं.
  • इसलिए ऐसी भूमि को खानों, प्रदूषणकारी उद्योगों आदि को हस्तांतरित किए जाने का खतरा है.
  • WPA के अंतर्गत राज्य के वन विभाग को बाघों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त संख्या में वन कर्मचारियों और रणनीतियों के साथ एक बाघ आरक्षित प्रबंधन योजना तैयार करनी होती है.
  • इसके अनुसार रिजर्व के आसपास के क्षेत्र में किसी भी खनन या औद्योगिक गतिविधि की अनुमति प्रदान नहीं की जाएगी और उनकी सीमाओं को राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) से अनुमोदन के बिना परिवर्तित नहीं किया जा सकता है.
  • यह बाघ आरक्षित क्षेत्रों के लिए विनियामक संस्था, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (National Tiger Conservation Authority: NTCA) को विधिक दर्जा भी प्रदान करता है.
  • भारत में एशियाई हाथियों [IUCN दर्जा: संकटग्रस्त (endangered)] की आबादी 60% से अधिक है, जिनमें कर्नाटक में वन्य हाथियों की संख्या सर्वाधिक है.

वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972

इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य वन्य जीवों के अवैध शिकार, उनकी खाल/माँस के व्यापार को रोकना है. यह अधिनियम जंगली जानवरों, पक्षियों और पौधों को संरक्षण देता है. इस अधिनियम में कुल 6 अनुसूचियाँ हैं जो अलग-अलग तरह से वन्यजीव को सुरक्षा प्रदान करती हैं.

अनुसूची

  • अधिनियम की अनुसूची 1 और अनुसूची 2 के दूसरे भाग वन्य जीवन को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हैं. इसलिए इसमें कठोरतम सजा का प्रावधान है.
  • अनुसूची 3 और अनुसूची 4 भी वन्य जीवों को संरक्षण प्रदान करती हैं किन्तु इनके लिए निर्धारित सजा बहुत कम है.
  • वहीं अनुसूची 5 में वे जानवर शामिल हैं जिनका शिकार हो सकता है.
  • जबकि अनुसूची 6 में संरक्षित पौधों की खेती और रोपण पर रोक है.

इस अधिनियम के तहत वन्यजीव को पकड़ने की कोशिश करना, उन्हें नुकसान पहुँचाना पूरी तरह गैर-कानूनी है. इसके अलावा वन्य जीवों के लिए बने अभयारण्य में आग लगाने, हथियारों के साथ प्रवेश करने पर रोक है. वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत जंगल के पेड़-पौधों को तोड़ना या काटना मना है. इसके साथ ही वन्यजीवों के शरीर, अंग और चमड़ों का व्यापार करना, सजावट के तौर पर इस्तेमाल करना पूरी तरह प्रतिबंधित है.

Schedule 1, 2, 3 और 4

Schedule 1 में आने वाले जानवरों को highly endangered माना जाता है. बाघ, चिंकारा, ब्लैक बक आदि इसी श्रेणी में आते हैं. इसलिए schedule 1 में आने वाले जीवों को नुकसान पहुँचाने की सजा भी सबसे अधिक होती है.

सजा का प्रावधान (SECTION 51)

वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 में वन्यजीवों के शिकार पर कड़ी सजा का प्रावधान है. इस अधिनियम की अनुसूची 1 और अनु. 2 के तहत अवैध शिकार, अभयारण्य या राष्ट्रीय उद्यान को क्षति पहुँचाने पर कम से कम 3 साल की सजा है जो 7 साल तक बढ़ाई जा सकती है. इसके साथ ही दस रुपये जुर्माना है. दूसरी बार इस प्रकार का अपराध करने पर 3 से 7 की जेल की सजा निश्चित है और जुर्माना 25 हजार तक लग सकता है.

वन्यजीवों के प्रति अपराध करने के लिए इस्तेमाल किये गए किसी भी उपकरण, वाहन या हथियार को जब्त करने का भी इस कानून में प्रावधान है.

इस टॉपिक से UPSC में बिना सिर-पैर के टॉपिक क्या निकल सकते हैं?

 

विश्व हाथी दिवस

  • हर साल 12 अगस्त को विश्व हाथी दिवस मनाया जाता है.
  • वार्षिक रूप से मनाया जाने वाला यह अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम दुनिया भर के हाथियों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए समर्पित है.
  • विश्व हाथी दिवस का लक्ष्य हाथी संरक्षण पर लोगों में जागरूकता पैदा करना और जंगली तथा पालतू हाथियों के बेहतर संरक्षण और प्रबंधन के लिए जानकारी और सकारात्मक समाधानों को साझा करना है.

सुरक्ष्य’ (SURAKHSYA) राष्ट्रीय पोर्टल

  • विश्व हाथी दिवस के कार्यक्रम के अवसर पर मानव-हाथी टकराव पर एक ‘सुरक्ष्य’ नामक राष्ट्रीय पोर्टल का बीटा संस्करण भी लॉन्च किया.
  • यह पोर्टल वास्तविक समय पर जानकारी के संग्रह और सही समय पर मानव-हाथी टकरावों को निपटाने के लिए आंकड़ा संग्रह प्रोटोकॉल, डेटा ट्रांसमिशन पाइपलाइन, और डेटा विज़ुअलाइज़ेशन टूल सेट करने में मदद करेगा.
  • इससे नीति निर्माताओं को इन मानव-हाथी टकराव के आंकड़ों का लाभ उठाते हुए नीति निर्माण और टकराव को कम करने की कार्य योजना बनाने में मदद मिल सकेगी.

हाथी परियोजना

  • हाथी भारत के प्राकृतिक धरोहर पशु हैं और इसके संरक्षण के लिए भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रलय ने 1991-92 में हाथी परियोजना शुरू की गई थी.
  • इस परियोजना को आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मेघालय, नागालैंड, ओडिशा, तमिलनाडु, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश ओर पश्चिम बंगाल राज्यों में क्रियान्वित किया जा रहा है.
  • विदित हो कि एशियाई हाथियों को संकटग्रस्त प्रजातियों कीआईयूसीएन की रेड लिस्ट में भारत को छोड़कर अधिकांश हाथी वाले देशों के संदर्भ में ‘विलुप्तप्राय’ प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है.
  • 2020 में गुजरात में संपन्न प्रवासी प्रजातियों के सम्मेलन के परिशिष्ट 1 में भारतीय हाथियों को भी सूचीबद्ध किया गया है.

कुछ महत्त्वपूर्ण आँकड़े

  1. देश में 2017 में आखिरी बार हाथियों की गिनती की गई थी. 2017 में हुई हाथियों की गिनती के अनुसार भारत में 30 हजार हाथी हैं, लेकिन धीरे-धीरे इनकी संख्या कम होती जा रही है.
  2. 2 हजार से ज्यादा हाथियों को बंधक बनाया गया है.
  3. एक दशक पहले देश में 10 लाख हाथी थे.
  4. 100 हाथियों को हर साल मार दिया जाता है.
  5. हाथी से संघर्ष में हर वर्ष 500 लोगों की मौत हो जाती है.

गज यात्रा

  1. पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और भारतीय वन्यजीवन न्यास (WTI) ने मेघालय में स्थित गारो हिल्स के प्रमुख शहर तुरा से गज यात्रा’ शुरू करने का निर्णय लिया है.
  2. इस आयोजन में लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए हाथी का mascot साथ-साथ उन जिलों से ले जाया जायेगा जहाँ हाथियों के झुण्ड अक्सर देखे जाते हैं.
  3. हाथी और मनुष्य के संबंधों को आदर्श स्थिति में लाने के प्रयास में पारम्परिक जमींदारों –नोकमास (Nokmas) की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है.
  4. हाथी की रक्षा के लिए 2017 में विश्व हाथी दिवस के अवसर पर इस राष्ट्रव्यापी अभियान ‘गज यात्रा’ की शुरुआत की गई थी.
  5. भारत में कुल 12 राज्यों में हाथी की बहुलता है. इन सभी राज्यों में गजयात्रा का आयोजन है.

मेरी राय – मेंस के लिए

 

बदलते वैश्विक परिवेश में किसी भी देश के विकास के लिये देश की आधारिक संरचना का मजबूत होना अति आवश्यक है, जिससे देश के दूरस्थ क्षेत्रों में रह रहे नागरिकों को भी मूलभूत सुविधाओं के साथ-साथ विकास के नए अवसर प्रदान किये जा सकें. परंतु विकास की इस प्रतिस्पर्द्धा में वन्यजीवों और पर्यावरण के हितों को भी ध्यान में रखना महत्त्वपूर्ण है। अतः सरकारों को विकास कार्यों के दौरान संविधान में सुझाए गए (पर्यावरण के प्रति) अपने कर्त्तव्यों (जैसे-अनुच्छेद-48a) को ध्यान में रखते हुए विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने हेतु आवश्यक कदम उठाने चाहिये.


GS Paper 3 Source : The Hindu

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UPSC Syllabus : Security challenges and their management in border areas; linkages of organized crime with terrorism.

Topic : DETENTION CENTRES

संदर्भ

गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने असम सरकार को निर्देश दिया कि वह विदेशी बंदी केंद्र (foreigners Detention Centre) को जेल के बाहर स्थानांतरित करने के लिए कदम उठाए.

बंदी केन्द्र क्या होते हैं?

बंदी केन्द्र उन स्थानों को कहते हैं जहाँ बिना आवश्यक प्रलेख के देश में घुस आये अवैध आव्रजकों को तब तक रखा जाता है जब तक कि उनकी राष्ट्रीयता की सम्पुष्टि नहीं होती अथवा उनको उनके मूल देश को भेज नहीं दिया जाता.

क्या भारत में बंदी केंद्र हैं?

हाँ, असम में छह बंदी केंद्र हैं. इनमें 1,000 बंदियों को रखने की व्यवस्था है, परन्तु इससे अधिक लोग यहाँ रखे गये हैं.

असम बंदी केंद्र कैसे स्थापित हुए थे?

भारत सरकार ने असम में बंदी केन्द्रों की स्थापना के लिए वहाँ की सरकार को विदेशी अधिनियम 1946 के अनुभाग 3(2)(e) एवं विदेशी आदेश, 1948 के अनुच्छेद 11(2) के अंतर्गत अनुमति दी थी.

आदर्श बंदी केंद्र हस्तक (MODEL DETENTION CENTRES MANUAL)

ऐसे बंदी केंद्र किस प्रकार चलाये जाएँ इसके लिए भारत सरकार ने एक हस्तक (manual) भी तैयार किया है जिसे सभी राज्यों को परिचालित किया जा चुका है.

इस हस्तक के मुख्य निर्देश निम्नलिखित हैं :-

  1. ऐसे केन्द्रों की स्थापना के लिए राज्यों को केंद्र से कोई विशेष अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
  2. ये केंद्र जेल परिसर से बाहर स्थापित होने चाहिएँ.
  3. कितने केंद्र बनें और उनका आकार क्या हो, इस विषय में राज्य स्वयं निर्णय लें. इसके लिए उन्हें उन विदेशियों की संख्या तथा उनको उनके मूल देश में भेजने की कार्यवाही में होने वाली प्रगति को ध्यान में रखना होगा.

आजकल बंदी केन्द्रों (DETENTION CAMPS) की चर्चा क्यों हो रही है?

आजकल राष्ट्रीय नागरिक पंजी चर्चा में है. इस कारण बंदी केन्द्रों की चर्चा भी हो रही है. ऐसा विशेषकर इसलिए हो रहा है कि पिछले दिनों असम राज्य में 19 लाख ऐसे जन पाए गये थे जिनके पास नागरिकता के उपयुक्त प्रलेख नहीं हैं.


GS Paper 3 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Science and Technology. 

Topic : STS Forum

संदर्भ

विज्ञान प्रौद्योगिकी और समाज (Science and Technology in Society : STS) फोरम में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के सचिव ने कहा कि सरकार द्वारा डेटा साझाकरण (शेयरिंग) पर सर्वाधिक ध्यान दिया जा रहा है.

  • उन्होंने भारत द्वारा वैज्ञानिक आंकड़ों को साझा करने पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता को रेखांकित किया जैसा कि भारत की राष्ट्रीय डेटा साझाकरण और सुगम्यता नीति (India’s National Data Sharing and Accessibility Policy – INDSAP) से स्पष्ट है.
  • उन्होंने स्वास्थ्य, जल, ऊर्जा, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, संचार और प्राकृतिक आपदाओं की चुनौतियों का समाधान करने तथा विकास के लिए 40 से अधिक देशों के साथ सूचना प्रौद्योगिकी पर भारत के सक्रिय सहयोग का भी उल्लेख किया.

भारत प्रमुख बहुपक्षीय और क्षेत्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंचों और समूहों का सदस्य है, जैसे- यूरोपीय संघ, ब्रिक्स, आसियान, जी-20, संयुक्त राष्ट्र आदि तथा साथ ही साथ अंतर्राष्ट्रीय मेगा साइंस परियोजनाओं जैसे कि अंतर्राष्ट्रीय थर्मोन्यूक्लियर प्रायोगिक रिएक्टर (International Thermonuclear Experimental Reactor : ITER), लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल वेव ऑब्जर्वेट्री (Laser Interferometer Gravitational-Wave Observatory : LIGO) आदि का भी भागीदार है.

कोअलिशंस फॉर डिज़ास्टर रेजीलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (15%) और मिशन इनोवेशन, आपदाओं तथा स्वच्छ ऊर्जा के प्रबंधन में भारत की वैश्विक पहल हैं.

विज्ञान प्रौद्योगिकी और समाज (STS) फोरम के बारे में

  • इसका उद्देश्य अनौपचारिक आधार पर खुली चर्चा के लिए एक तंत्र प्रदान करना तथा एक मानव नेटवर्क का निर्माण करना है, जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग सी उत्पन्न नई प्रकार की समस्याओं का समाधान करेगा.
  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री का गोलमेज सम्मेलन प्रतिवर्ष STS के साथ आयोजित होता है.

INDSAP का उद्देश्य

  • INDSAP का उद्देश्य पंजीकृत उपयोगकर्ताओं के मध्य गैर-संवेदनशील डेटा की पहुंच आसान बनाना और उनकी साझेदारी को बढ़ाना तथा इस डेटा की वैज्ञानिक, आर्थिक एवं सामाजिक विकास के उद्देश्यों के लिए उपलब्धता में वृद्धि करना है.
  • यह सरकारी स्वामित्व वाले डेटा का अधिकतम उपयोग करने, डेटा संग्रह के दोहराव से बचने, डेटा समुच्चय का बेहतर समेकन करने, स्वामित्व की पहचान करने, बेहतर निर्णय लेने आदि में सहायता करती है.

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