Sansar डेली करंट अफेयर्स, 03 February 2021

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Contents

Sansar Daily Current Affairs, 03 February 2021


GS Paper 1 Source : The Hindu

UPSC Syllabus : Population and associated issues.

Topic : Government likely to postpone census to 2022

संदर्भ

देश में कोविड-19 महामारी से निपटने में व्यस्त होने के कारण केंद्र सरकार वर्ष 2021 में होने वाली जनगणना को वर्ष 2022 में कराए जाने पर विचार कर रही है.

मुख्य तथ्य

  1. भारत के महापंजीयक (Registrar-General of India – RGI) के द्वारा अधिसूचित एक संशोधित नियम के अनुसार 2021 की जनगणना के आँकड़ों को इलेक्ट्रॉनिक रूप में संगृहीत किया जायेगा.
  2. ऐसा भारतीय जनगणना के इतिहास में पहली बार हो रहा है.
  3. ज्ञातव्य है कि शुरू से लेकर 2011 तक हर 10वें वर्ष होने वाली जनगणना 15 बार हो चुकी है.
  4. यद्यपि जनगणना की शुरुआत भारत में 1872 में ही हो गयी थी पर पहली सम्पूर्ण जनगणना 1881 में संपन्न हुई थी.
  5. 1949 के बाद से जनगणना का काम गृह मंत्रालय के अधीनस्थ भारत महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के द्वारा किया जाता है.
  6. 1951 के बाद से हो रही जनगणना (भारतीय जनगणना अधिनियम 1948 / Census of India Act 1948) के तहत की जाती है.

जनसंख्या घनत्व कैसे मापा जाता है?

जिस क्षेत्र (शहर, राज्य, देश, महादेश) की जनसंख्या का घनत्व जानना हो तो उस क्षेत्र के क्षेत्रफल को उसकी जनसंख्या से भाग दे देने से प्रति किलोमीटर जनसंख्या घनत्व का पता चलता है. उदाहरण के लिए किसी शहर का क्षेत्रफल 100 वर्ग किलोमीटर है और जनसंख्या 10 लाख है तो उस क्षेत्र के जनसंख्या का घनत्व = 1000000/100 अर्थात् होगा 10,000 population density होगा.

Population Density = Number of People / Land Area

2011 के कुछ जरुरी आँकड़े

राज्य

2011 की जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनघनत्व वाले पाँच राज्य हैं –

  1. बिहार (1102)
  2. पश्चिम बंगाल (1029)
  3. केरल (859)
  4. उत्तर प्रदेश (828)
  5. हरियाणा (573)

केंद्रशासित राज्य

2011 की जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनघनत्व वाले तीन केन्द्रशासित राज्य हैं –

  1. दिल्ली (11297)
  2. चंडीगढ़ (9252)
  3. पुडुचेरी (2598)

पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, गोवा व असम भी उच्च घनत्व वाले राज्य हैं जबकि कई राज्यों में जनसंख्या का घनत्व राष्ट्रीय औसत से कम हैं. जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत को तीन भागों में बाँटा जा सकता है –

जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत के तीन भाग

  1. उच्च घनत्व के क्षेत्र– इसके अन्दर पूरे देश के लगभग 1/4 जिलें आते हैं. इसका विस्तार पश्चिमी बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में है. यहाँ जनसंख्या का घनत्व (population density) 500 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी से अधिक मिलता है. ये क्षेत्र भारतीय कृषि के प्रमुख क्षेत्र हैं.
  2. मध्यम घनत्व के क्षेत्र– भारत में लगभग 130 जिलों में 300-500 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी घनत्व पाया जाता है. भारत में मध्यम घनत्व के क्षेत्र उत्तरी भारत के उच्च घनत्व के निकटवर्ती क्षेत्र जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र के तटवर्ती भाग, छोटा नागपुर के पठार आदि हैं. इन क्षेत्रों में धरातल की विषमता और जल की कमी पाई जाती है. इसलिए ये क्षेत्र कृषि में महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाते. इसलिए इन क्षेत्रों में कम जनसंख्या पाई जाती हैं. पर यहाँ खनिजों का भण्डार है जिससे ये क्षेत्र औद्योगिक और आर्थिक रूप से विकसित हैं. पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में कृषि तथा लघु उद्योगों के विकास के कारण मध्यम घनत्व के कुछ क्षेत्र विकसित हुए हैं.
  3. निम्न घनत्व के क्षेत्र– भारत के लगभग 150 जिलों में 300 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी से भी कम जनसंख्या का घनत्व मिलता है. उत्तर-पूर्व हिमालयी क्षेत्र में और पश्चिमी भारत में कमी और जनसंख्या का अल्प घनत्व मिलता है. मध्य प्रदेश और उड़ीसा के पठारी और जनजातीय क्षेत्रों, कर्नाटक के पूर्वी भाग और आंध्र प्रदेश के मध्यवर्ती भाग में भौतिक बाधाओं और कृषि के अविकसित होने के चलते कम जनसंख्या पाई जाती है. कच्छ के दलदल वाले क्षेत्र भी निम्न घनत्व वाले क्षेत्र हैं.

GS Paper 1 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Issues related to women.

Topic : The Medical Termination of Pregnancy (Amendment) Bill-2020

संदर्भ

लोकसभा ने पिछले वर्ष गर्भ का चिकित्सकीय समापन संशोधन विधेयक 2020′ (The Medical Termination of Pregnancy (Amendment) Bill-2020) पारित कर दिया था. इस विधेयक में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट-1971 में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया था. इस विधेयक को वर्तमान में जारी बजट सत्र के दौरान राज्यसभा में पेश किए जाने की संभावना है. विदित हो कि इस विधेयक में, प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में एक मेडिकल बोर्ड का गठन करने सहित कई संशोधनों का प्रस्ताव किया गया है.

प्रस्तावित परिवर्तन

  • वर्तमान में 20 सप्ताह तक के भ्रूण के समापन की अनुमति है. अब इस अवधि को 24 सप्ताह किया जा रहा है.
  • वर्तमान प्रावधान के अनुसार, गर्भ निरोध की विफलता से सम्बंधित उपवाक्य में मात्र “विवाहित स्त्री अथवा उसके पति” का उल्लेख है. अब यह किसी भी स्त्री अथवा उसके साथी” पर भी लागू होगा.
  • प्रारूप विधेयक में यह प्रावधान किया जा रहा है कि 20 सप्ताह के गर्भ की समाप्ति के लिए एक पंजीकृत चिकित्सा डॉक्टर (registered medical practitioner – RMP) का मन्तव्य अपेक्षित होगा.
  • परन्तु 20 से लेकर 24 सप्ताह के गर्भ की समाप्ति के लिए दो पंजीकृत डॉक्टरों का मंतव्य अनिवार्य होगा.
  • विधेयक में गर्भ के समापन के लिए बढ़ाई गई समय-सीमा (20 सप्ताह से 24 सप्ताह) उन स्त्रियों पर भी लागू होगी जो बलात्कार के बाद जीवित हों, जो कौटुम्बिक व्यभिचार की शिकार हों आदि.

माहात्म्य

  • MTP अधिनियम, 1971 के लिए प्रस्तावित इन संशोधनों को स्त्री सशक्तीकरण की दिशा में एक आगे ले जाना वाला एक कदम माना जा रहा है.
  • गर्भपात को स्त्रियों के प्रजनन स्वास्थ्य का एक महत्त्वपूर्ण पहलू माना जाता है, अतः प्रस्तावित संशोधनों से उन्हें प्रजनन से सम्बंधित अधिक अधिकार मिलेंगे.
  • असुरक्षित गर्भपात से होने वाली मृत्यु एवं शारीरिक क्षति से बचने का उपाय यह है कि गर्भ समापन के लिए किसी प्रशिक्षित डॉक्टर की सेवाएँ विधिसम्मत रीति से ली जाएँ.

दुनिया-भर में गर्भपात से सम्बंधित कानून

  1. गर्भपात से सम्बंधित कानून विश्व में अलग-अलग ढंग के हैं. लगभग 60 देशों में गर्भ समापन के लिए गर्भ की अवधि के बारे में सीमाएं तय की हुई हैं.
  2. 52% देशों में इसके लिए यह प्रावधान है कि यदि भ्रूण में असामान्यता का पता चले तो 20 सप्ताह के पश्चात् भी उसे समाप्त किया जा सकता है. इनमें से कुछ देश हैं – फ्रांस, यूके, ऑस्ट्रिया, इथियोपिया, इटली, स्पेन, आइसलैंड, फिनलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, स्विट्जरलैंड और नेपाल.
  3. 23 देश ऐसे हैं जहाँ माँ के कहने पर किसी भी समय गर्भ समाप्त किया जा सकता है. इनमें से कुछ देश हैं – कनाडा, जर्मनी, वियतनाम, डेनमार्क, घाना और जाम्बिया.
  4. यूनाइटेड किंगडम में 24 सप्ताह तक के गर्भपात की अनुमति है. वहाँ रॉयल कॉलेज ऑफ़ ऑब्सटेट्रीसियंस एंड गायनीकॉलोजिस्ट ने गर्भपात के विषय में मार्गनिर्देश निर्धारित कर रहे हैं जिनमें 20 सप्ताह से अधिक के गर्भ की समाप्ति की प्रक्रिया दी हुई है. इसमें यह भी उल्लेख है कि यदि गर्भ 21 सप्ताह और 6 दिन से अधिक पुराना है तो भूर्ण की मृत्यु के लिए एक सुई दी जाए और तब भ्रूण को बाहर निकाला जाए.

GS Paper 2 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Development processes and the development industry the role of NGOs, SHGs, various groups and associations, donors, charities, institutional and other stakeholders.

Topic : CSIR celebrates 20 years of India’s Traditional Knowledge Digital Library, the first of its kind globally

संदर्भ

हाल ही में वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) द्वारा विश्व में अपनी तरह की प्रथम पहल भारत की परंपरागत ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी (TKDL) की 20वीं वर्षगाँठ मनाई गई.

परंपरागत ज्ञान

परंपरागत ज्ञान वस्तुत: वह ज्ञान, अनुमव, कौशल और प्रथाएं हैं, जिन्हें किसी समुदाय के अंदर पीढ़ी दर पीढ़ी विकसित, निरंतर रूप से अवधारित और स्थानांतरित किया जाता है. यह ज्ञान उस समुदाय की अधिकांशतः सांस्कृतिक या आध्यात्मिक पहचान का हिस्सा बनता है.

परंपरागत ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी

  • पारम्परिक ज्ञान का आंकिक संग्रहालय या ‘ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी’ भारत के परम्परागत ज्ञान का आंकिक संग्रहालय है. इसमें मुख्यत: औषधीय पौधों एवं औषधियों के निर्माण की विधि का संग्रह है.
  • यह जैव-चोरी और हमारे परम्‍परागत ज्ञान के दुरुपयोग को रोकने के लिए भारतीय चिकित्सा प्रणालियों के बारे में विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त ट्रेडमार्क युक्‍त डेटाबेस है.
  • 2001 में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) और आयुष मंत्रालय के बीच सहयोग से यह स्थापित किया गया गया.
  • इस पुस्तकालय का उद्देश्य देश के प्राचीन और पारंपरिक ज्ञान को जैवप्रौद्योगिकी और अनैतिक पेटेंट के माध्यम से शोषण से बचाना है और इसे इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रलेखित करके और अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट वर्गीकरण प्रणालियों के अनुसार वर्गीकृत करना है.
  • यह आधुनिक अनुसंधानों की उपचार और प्रथाओं के विशाल ज्ञान तक पहुँच को सरल बनाता है.
  • TKDL में सार्वजनिक रूप से पारंपरिक ज्ञान के विभिन्न प्रलेखन सम्मिलित हैं, जैसे – आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और योग जो अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, जापानी और स्पेनिश में उपलब्ध हैं.
  • परंपरागत ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी (TKDL) परंपरागत ज्ञान का भारतीय डिजिटल ज्ञान भंडार है. इसमें विशेष रूप से औषधीय पादपों और भारतीय चिकित्सा पद्धति में उपयोग किए जाने वाले सूत्रीकरण से संबद्ध दस्तावेज शामिल हैं.
  • TKDL को वर्ष 2001 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) और स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत, आयुष विभाग के मध्य सहयोग के रूप में आरंभ किया गया था.
  • TKDL डेटाबेस में 5 अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं यथा-अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, जापानी और स्पेनिश में भारतीय चिकित्सा पद्धतियों (आयुर्वेद, योग, सिद्ध, यूनानी और सोवा रिग्पा) के 9 लाख से अधिक सूत्रीकरण / चिकित्सा-उपाय डिजिटाइज्ड प्रारूप में शामिल हैं.
  • यह भारतीय परंपरागत ज्ञान का उपयोग करने वाले उत्पादों को पेटेंट प्रदान करने से रोककर अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों में देश के पारंपरिक औषधीय ज्ञान के दुरुपयोग को रोकने का प्रयास करता है.
  • इसके अतिरिक्त, गैर-पेटेंट डेटाबेस प्रथाओं के विशाल ज्ञान-भंडार तक पहुंच को सरल बनाकर पारंपरिक ज्ञान पर आधारित आधुनिक अनुसंधान को बढ़ावा देने का कार्य करता है. यह डेटाबेस, TKDL एक्सेस (गैर-प्रकटीकरण) समझौते के माध्यम से केवल पेटेंट परीक्षकों के लिए उपलब्ध है.

पृष्ठभूमि

टीकेडीएल पहल की शुरूआत हल्दी के घाव भरने के गुणों का यूएसपीटीओ में तथा नीम के फफूंदी रोधी गुणों का ईपीओ में पेटेंट रद्द कराने के भारतीय प्रयासों जितनी पुरानी है. इसके अलावा, 2005 में, टीकेडीएल विशेषज्ञ समूह ने अनुमान व्यक्त किया कि हर साल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दवाओं की भारतीय चिकित्सा प्रणालियों से सम्बद्ध करीब 2000 गलत पेटेंट प्रदान किए जाते हैं. इसकी मुख्य कारण यह है भारत का परम्परागत चिकित्सकीय ज्ञान संस्कृत, हिंदी, अरबी, फारसी, उर्दू, तमिल आदि भाषाओं में था, जो अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों के पेटेंट जांचकर्ताओं के लिए न तो सुलभ था और न ही बोधगम्य.

अमेरिका और यूरोप में ये पेटेंट्स प्रदान किया जाना राष्ट्रीय स्तर पर बहुत दुख का कारण बना. तभी से हर भारतीय को अनुभव होने लगा कि भारत का ज्ञान गलत तरीके से उससे छीन लिया गया है. इसके अलावा पेटेंट प्रदान करने वाले देश में, पेटेंट के आवेदक को प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल के अलग से अधिकार प्राप्त हो जाते थे.


GS Paper 3 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Conservation, Government policies and interventions for development in various sectors and issues arising out of their design and implementation.

Topic : Jal Jeevan Mission – Urban

संदर्भ

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2021 के केंद्रीय बजट में शहरी क्षेत्रों के लिए एक सार्वभौमिक जल आपूर्ति योजना- जल जीवन मिशन (शहरी) की घोषणा की है.

जल जीवन अभियान क्या है?

  • यह अभियान 2024 तक सभी ग्रामीण और शहरी घरों (हर घर जल) में नलके से पानी पहुँचाने के लिए तैयार किया गया है.
  • जल जीवन अभियान की घोषणा अगस्त, 2019 में हुई थी.
  • इसके अतिरिक्त इस अभियान का उद्देश्य है वर्षा जल संग्रह, भूजल वापसी और घर से निकलने वाले अपशिष्ट जल को खेती में प्रयोग करने से सम्बंधित स्थानीय अवसंरचनाओं का निर्माण करना.
  • जल जीवन अभियान के अंतर्गत जल संरक्षण के अनेक कार्य किये जाएँगे, जैसे – पॉइंट रिचार्ज, छोटे सिंचाई जलाशयों से गाद निकालना, अपशिष्ट जल को खेती में डालना और जल स्रोतों को टिकाऊ बनाना.
  • सतत जल आपूर्ति के लक्ष्य को पाने के लिए जल जीवन अभियान में अन्य केन्द्रीय और राज्य योजनाएँ समाहित की जाएँगी.

अभियान के लाभ

  1. घर-घर में नलके द्वारा पानी की आपूर्ति
  2. स्वच्छ एवं पीने योग्य जल
  3. भूजल का स्तर ऊपर लाना
  4. स्थानीय अवसंरचना को बेहतर बनाना
  5. जल से होने वाले रोगों में कमी
  6. जल की बर्बादी में कमी

अन्य उठाए गये कदम इस प्रकार हैं – 

  1. जल जीवन मिशन ने ग्रामीण क्षेत्रों में जल सेवा वितरण प्रणाली के मापन और निगरानी के लिए रूपरेखा तैयार करने हेतु एक तकनीकी विशेषज्ञ समिति (technical expert committee) का गठन किया है.
  2. इस मिशन द्वारा एक स्मार्ट वाटर सप्लाई मेजरमेंट एंड मॉनिटरिंग सिस्टम को विकसित करने हेतु सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) ग्रैंड चैलेंज का आयोजन किया जा रहा है.
  3. जलापूर्ति अवसंरचना का डिजिटलीकरण करने हेतु तकनीकी प्रगतियों (जैसे इंटरनेट ऑफ्‌ थिंग्स : IoT, बिग डेटा एनालिटिक्स) का उपयोग किया जा रहा है.
  4. JJM को राज्यों के साथ साझेदारी में कार्यान्वित किया जा रहा है. इसका उद्देश्य वर्ष 2024 तक प्रत्येक ग्रामीण परिवार को कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन प्रदान करना है.

मेरी राय – मेंस के लिए

ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर तक नल से पेयजल आपूर्ति की योजना में पानी की गुणवत्ता एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है. इसीलिए शुद्ध जल की आपूर्ति के लिए अनुसंधान पर विशेष बल दिया जा रहा है. इसके लिए शुरू किए गए राष्ट्रीय जल जीवन मिशन में शोध, स्टार्टअप, शिक्षाविदों और उद्यमियों के साथ इनोवेशन को प्रोत्साहन देने की योजना है. केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने जलापूर्ति की गुणवत्ता के लिए अलग-अलग क्षेत्रों की योजना तैयार की है. देश के विभिन्न हिस्सों में पानी गुणवत्ता की समस्या भी अलग तरह की है.

ग्रामीण पेयजल आपूर्ति में सामाजिक, पर्यावरण संबंधी और तकनीकी चुनौतियाँ हैं. अधिकांश हिस्सों में जल की आपूर्ति भूजल के माध्यम से की जाती है. प्रत्येक हिस्से में भूजल का स्तर, उसकी गुणवत्ता वहां की जलवायु के हिसाब से परिवर्तित हो जाती है. पेयजल आपूर्ति को लेकर देश के कई हिस्सों में अजीब तरह की सोच है, जिसके लिए जनजागरुकता की भी आवश्यकता है. ग्रामीण जल सुरक्षा को लेकर सरकार बहुत सतर्क है.

गुणवत्तायुक्त पानी की आपूर्ति के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएंगे. जल जीवन मिशन को निर्धारित समय में पूरा करने की चुनौती से निपटने के लिए आधुनिक टेक्नोलॉजी के अपनाए जाने पर भी बल दिया गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लालकिले से फिर दुहराया कि हर परिस्थिति में 2024 तक ग्रामीण जल जीवन मिशन के अंतर्गत हर घर तक नल से जल पहुंचाने के लक्ष्य पूरा कर लिया जाएगा. इसके बाद से मंत्रालय में युद्ध स्तर पर कार्य होने लगा है. सभी राज्यों के साथ साप्ताहिक समीक्षाएं होती हैं. मिशन की प्रगति की लगातार समीक्षा भी हो रही है. जल जीवन मिशन को लागू करने में राज्यों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है. मिशन के अंतर्गत प्रत्येक ग्रामीण को रोजाना 55 लीटर गुणवत्तायुक्त पेयजल की आपूर्ति की जानी है. वर्ष-भर के अन्दर दो करोड़ परिवारों को नल से जल की आपूर्ति सुनिश्चित कर दी गई है.


GS Paper 3 Source : PIB

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UPSC Syllabus : Issues related to direct and indirect farm subsidies and minimum support prices; Public Distribution System- objectives, functioning, limitations, revamping; issues of buffer stocks and food security; Technology missions; economics of animal-rearing.

Topic : Operation Greens

संदर्भ

भारत सरकार ने इस वर्ष के बजट में 22 और उत्पादों को ऑपरेशन ग्रीन योजना– ‘TOPS’ के अंतर्गत शामिल करने का निर्णय लिया है.

कृषि और संबद्ध उत्पादों में मूल्य वृद्धि और उनके निर्यात को बढ़ावा देने के लिए, भारत के वित्त मंत्री ने बजट 2021 में ऑपरेशन ग्रीन योजना का दायरा बढ़ते हुये इसमें 22 नए उत्पादों को शामिल करने की घोषणा की है. वर्तमान में ऑपरेशन ग्रीन योजना के तहत केवल टमाटर, प्याज, आलू (TOPs) ही शामिल हैं.

पृष्ठभूमि

  • पिछले वर्ष खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय ने आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत पायलट परियोजना के तौर पर ऑपरेशन ग्रीन योजना को छः माह के लिए टमाटर, प्याज और आलू (TOP) से आगे बढ़ाकर सभी फलों और सब्जियों (TOTAL) तक विस्तारित किया था.
  • जुलाई 2020 में भी सरकार ने किसानों और प्रसंस्करण-कर्ताओं को मौजूदा ‘ऑपरेशन ग्रीन्स’ के तहत 18 अन्य फलों और सब्जियों का अधिशेष उत्पादन क्षेत्रों से प्रमुख उपभोग केंद्रों तक परिवहन और भंडारण पर 50 प्रतिशत सब्सिडी का लाभ देने की घोषणा की थी.
  • सरकार के इस हस्तक्षेप का उद्देश्य फल और सब्जियों के उत्पादकों को लॉकडाउन के कारण बिना भाव की बिक्री से बचाना और हार्वेस्टिंग के बाद के नुकसान को कम करना है.

ऑपरेशन ग्रीन्स क्या है?

ऑपरेशन ग्रीन्स एक योजना है जिसकी घोषणा 2018-19 बजट भाषण में की गई थी और इसके लिए बजट में 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था. इस योजना का उद्देश्य टमाटर, प्याज और आलू (top crops) की आपूर्ति को बनाए रखना और दामों में उछाल के बिना पूरे देश में पूरे वर्ष इनकी उपलब्धता को सुनिश्चित करना है.

Operation Greens के प्रधान लक्ष्य

  • टमाटर-प्याज-आलू के उत्पादन संकुलों और उनके कृषक उत्पादक संगठनों को सुदृढ़ करना और उन्हें बाजार से जोड़ना.
  • टॉप संकुलों में उत्पादन की उपयुक्त योजना बनाकर मूल्य को स्थिर रखना
  • फसल टूटने के बाद होने वाली क्षति को घटाने के लिए फार्म गेट भवन बनाना, समुचित ढुलाई का प्रबंधन करना और भंडारों को खपत केन्द्रों (consumption centres) से जोड़ना.
  • खाद्य प्रसंस्करण की क्षमता में वृद्धि करना.
  • बाजार की जानकारी के विषय में एक ऐसा नेटवर्क तैयार करना जिससे टॉप फसलों की माँग और आपूर्ति के विषय में तत्क्षण आँकड़ें संगृहित किये जा सकें.

संचालन रणनीति कैसी होगी?

ऑपरेशन ग्रीन्स के लिए संचालन नीति के अंतर्गत जो उपाय किये जाएँगे, वे हैं –

मूल्य को स्थिर करने के अल्पकालिक उपाय :

  • खाद्य संस्करण उद्योग मंत्रालय (MoFPI) टमाटर, प्याज और आलू के उत्पादन से लेकर भंडारण तक के परिवहन तथा इन फसलों के उचित भंडारण के किराए के लिए 50% सब्सिडी देगा.
  • मूल्य को स्थिर करने के लिए उपाय लागू करने हेतु NAFED को नोडल एजेंसी बनाया गया है.

दीर्घकालिक समेकित मूल्य शृंखला विकास परियोजनाएँ

  • कृषक उत्पादक संगठनों (Farmer Producer Organizations – FPOs) तथा उनके संघ की क्षमता का विकास
  • उच्च कोटि का उत्पादन
  • फसल टूटने के बाद उसके प्रसंस्करण की सुविधा
  • फसल उत्पादन को यत्र-तत्र ढुलाई की सुविधा
  • बाजार और खपत केंद्र
  • टमाटर, प्याज और आलू (TOP Crops) की माँग और आपूर्ति की व्यवस्था के लिए ई-प्लेटफार्म बनाना और उसको चलाना.

Prelims Vishesh

First public private partership research reactor for production of nuclear medicine :-

  • प्रस्तावित भागीदारी के अंतर्गत, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) विभिन्‍न प्रकार की नाभिकीय औषधियों के उत्पादन की तकनीक को साझा करने के लिए तैयार है.
  • निजी संस्थाओं को रिएक्टर और प्रसंस्करण प्रतिष्ठानों में निवेश करने के प्रतिफल में अनुसंघान रिएक्टर में उत्पादित आइसोटोप (समस्थानिक) को संसाधित करने तथा विपणन करने के लिए विशेष अधिकार प्राप्त होंगे.
  • यह परियोजना चिकित्सा और औद्योगिक अनुप्रयोगों में उपयोग किए जाने वाले प्रमुख रेडियो आइसोटोप में भारत को आत्मनिर्भर बनाने में सहायता प्रदान करेगी.

Indigenous Reference Material (RM) for chemical testing :-

  • हाल ही में, रासायनिक परीक्षण के लिए स्थानीय संदर्भ सामग्री (RM) को विकसित किया गया था.
  • संदर्भ सामग्री (RM) का उपयोग डोप परीक्षण के दौरान गुणवत्ता नियंत्रण उद्देश्यों के लिए किया जाता है. इसलिए, वैश्विक स्तर पर खेलों में डोप परीक्षण में उनकी उपलब्धता महत्त्वपूर्ण बनी हुई है.
  • संदर्भ सामग्री (RM) की पहचान विश्व स्तर पर एक दुर्लभ सामग्री के रूप में की गई है. इसका उपयोग विश्व एंटी डोपिंग एजेंसी (वाडा/ WADA) से मान्यता प्राप्त सभी प्रयोगशालाओं में एंटी-डोपिंग उपायों को मजबूत करने के लिए किया जाएगा.

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