दुर्लभ रोग (Rare diseases) क्या हैं? दुर्लभ रोग उपचार नीति के मुख्य अवयव

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भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 450 दुर्लभ रोगों के उपचार के लिए राष्ट्रीय नीति (a national policy for the treatment  ‘rare diseases’) प्रकाशित कर दी है.

ज्ञातव्य है कि यह नीति 2017 में तैयार हुई थी और 2018 में एक समिति को इसकी समीक्षा करने को कहा गया था.

दुर्लभ रोग उपचार नीति के मुख्य अवयव

  1. दुर्लभ रोगों की एक पंजी बनाई जायेगी जिसका संधारण भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (Indian Council of Medical Research ICMR) करेगी.
  2. इस नीति के अनुसार, ये रोग दुर्लभ कहे जाएँगे – आनुवांशिक रोग, विरले कैंसर (rare cancers), संक्रामक ऊष्ण कटिबंधीय रोग, क्षयकारी रोग आदि.
  3. इस राष्ट्रीय नीति के अनुसार, जो दुर्लभ रोग एक ही बार उपचार से ठीक हो सकता है उसके लिए उससे ग्रस्त रोगी को राष्ट्रीय आरोग्य निधि योजना से 15 लाख रु. दिए जाएँगे. यह लाभ केवल उस व्यक्ति को मिलेगा जो प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का लाभार्थी होगा.
  4. दुर्लभ रोगों की तीन श्रेणियाँ बताई गई हैं –
  1. वह रोग जिसमें एक बार उपचार से लाभ हो जाता है, जैसे – अस्थि क्षय एवं प्रतिरोध में कमी वाले रोग आदि.
  2. वह रोग जिसमें लम्बे उपचार की आवश्यकता होती है, परन्तु इस पर खर्च कम होता है.
  3. वह रोग जिसका उपचार लम्बा चलता है पर साथ ही व्यय भी बहुत होता है.

रेयर डिजीज क्या होता है?

  • दुर्लभ रोग अर्थात् अनाथ रोग (orphan disease) एक ऐसा रोग है जिससे बहुत कम लोग ग्रस्त होते हैं.
  • अधिकांश दुर्लभ रोग आनुवंशिक होते हैं और ये किसी व्यक्ति के पूरे जीवन तक चलते हैं, चाहे इसके लक्षण तुरंत न दिखें. जहाँ तक यूरोप की बात है तो वहाँ दुर्लभ रोग अथवा विकृति उस रोग अथवा विकृति को कहते हैं जिसकी चपेट में 2,000 नागरिकों में से एक से भी कम नागरिक आता है.
  • दुर्लभ रोगों में भाँति-भाँति के अनेक लक्षण होते हैं जो रोगानुसार बदलते रहते हैं.
  • यदि एक से अधिक रोगी किसी एक दुर्लभ रोग से ग्रस्त हैं तो भी उनमें अलग-अलग लक्षण हो सकते हैं. बहुत से लक्षण ऐसे होते हैं जो सामान्य लक्षण हैं अतः किसी दुर्लभ रोग के निदान में बहुधा भूल हो जाती है.
  • भारत में सबसे अधिक पाए जाने वाले दुर्लभ रोग हैं – हीमोफिलिया, थैलसीमिया, सिकल-सेल एनीमिया, बच्चों में प्राथमिक इम्युनो की कमी, ऑटो-इम्यून रोग, लाइसो सोमल स्टोरेज विकृतियाँ, जैसे – पोम्पे डिजीज, हिर्स्चप्रंग रोग, गौचर की बीमारी, सिस्टिक फाइब्रोसिस, हेमांगीओमास और कुछ प्रकार के मस्कुलर डिस्ट्रोफी.

समस्या और निदान

  • सरकार का यह कर्तव्य बनता है कि वह प्रत्येक नागरिक को स्वास्थ्य की देखभाल सम्बन्धी सुविधा दे. संविधान की धारा 21, 38 और 47 में भी इस बात का उल्लेख है.
  • जो रोग दुर्लभ हैं उनसे ग्रस्त रोगी भी दुर्लभ होते हैं. कहने का अभिप्राय यह है कि यदि कोई कम्पनी इनके लिए दवा बनाए तो उसे बहुत कम मात्रा में दवा बनानी होगी. इस कारण यह मुनाफे का सौदा नहीं है. अतः आवश्यकता है कि ऐसी दवा कंपनियों को आगे आने के लिए उत्प्रेरणा देकर प्रोत्साहित किया जाए.
  • दवा बनाने वाली कंपनियाँ कम मात्रा में बनी दवाइयों से अधिक से अधिक पैसा कमाना चाहेंगी और इसलिए इनका दाम बहुत ऊँचा रखना चाहेंगी. इसलिए यह आवश्यक होगा कि सरकार अनाप-शनाप मूल्य रखने से इन्हें रोकने के लिए एक विनियमन प्रणाली स्थापित करे.
  • यह सच है कि दुर्लभ रोग हजारों में एक को ही होता है परन्तु उस एक आदमी के जीवन का भी मोल होता है. अतः सरकार को चाहिए कि इस विषय में एक राष्ट्रीय नीति लेकर आये जिससे दुर्लभ रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों को देखभाल उपलब्ध हो सके.

चिंताएँ और चुनौतियाँ

स्वास्थ्य की देखभाल से सम्बंधित तंत्र के लिए दुर्लभ रोग बहुत बड़ी चुनौती होते हैं क्योंकि इनके लिए रोग प्रसार विषयक डाटा जमा करना कठिन होता है और फलस्वरूप यह पता लगाना कठिन हो जाता है कि इनसे ग्रस्त लोगों की संख्या क्या है, इनके उपचार में कितना खर्च आएगा और इनका समय पर और सही निदान कैसे किया जाए आदि.

दुर्लभ रोग के कुछ मामले गंभीर, दीर्घकालिक और जानलेवा हो सकते हैं. कुछ ऐसे भी मामले होते हैं कि किसी दुर्लभ रोग से ग्रस्त व्यक्ति, विशेषकर बच्चे अपाहिज भी हों.

2017 के एक प्रतिवेदन में बताया गया है कि आधे से अधिक दुर्लभ रोगग्रस्त व्यक्ति बच्चे होते हैं और ऐसे रोगों से मरने वाले 35% व्यक्ति एक वर्ष से कम की उम्र के होते हैं. इन रोगों से 10% मृत्यु उन लोगों की होती है जिनकी आयु 1 से 5 के बीच होती है. इसी प्रकार 12% मृत्यु 5-15 के आयु वर्ग के बच्चों की होती है.

Tags : What are rare diseases? Explained in Hindi. Overview of Government’s policy on rare diseases. Need for awareness, international cooperation in this regard, need for a policy on this.

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