[Sansar Editorial 2022] भारत में मृत्युदंड की सजा पाने वाले कैदियों का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन

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उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में मृत्युदंड का सामना कर रहे दोषियों का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन करने की आवश्यकता पर बल दिया है। इसके साथ ही न्यायालय ने रेखांकित किया है कि मृत्युदंड को केवल रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर मामलों में ही उचित सज़ा के रूप में देखा जाना चाहिए.

ज्ञातव्य है कि एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 में भारत में मृत्युदंड की सजा पाने वाले कैदियों की संख्या में वर्ष 2016 के बाद से सर्वाधिक वृद्धि हुई। वर्ष 2021 में 488 कैदियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। ऐसे दोषियों के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन सहित उनकी समग्र जानकारी प्रस्तुत करने में शमन अन्वेषकों (सज़ा कम करवाने वाले जाँच अधिकारी) द्वारा किये जाने विश्लेषणों का उपयोग किया जा सकता है।

वे अपनी रिपोर्ट के माध्यम से मुकदमे के दौरान मृत्युदंड प्राप्त दोषियों के जीवन के अनुभवों पर एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर सकते हैं। शमन अन्वेषक समाज कार्य, समाजशास्त्र, मानव विज्ञान, अपराध विज्ञान, मनोविज्ञान और अन्य सामाजिक विज्ञान में योग्य पेशेवर होते हैं। वे शमन की जा सकने वाली परिस्थितियों का पता लगाकर न्यायालयों को दंड निर्धारित करने में मदद कर सकते हैं।

मृत्युदंड के पक्ष में तर्क

  • प्रतिकार: वास्तविक न्याय सुनिश्चित होता है.
  • गम्भीर श्रेणी के अपराधों के लिए मृत्युदंड उचित है, इससे अपराधियों में भय व्याप्त होता है.
  • मृत्युदंड पीड़ितों के परिवार को संतुष्टि प्रदान करता है

मृत्युदंड के विपक्ष में तर्क

  • मृत्युदंड, प्रतिकार की बजाय प्रतिशोध है.
  • नैतिक रूप से संदिग्ध अवधारणा है.
  • अपराधियों को जीवन के अधिकार से वंचित नही किया जा सकता है.
  • समाज में क्रूरता की प्रवृति विकसित होती है.

मृत्युदंड से संबंधित प्रमुख निर्णय/प्रावधान

  • बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य, 1980: सर्वोच्च न्यायालय ने दुर्लभ से दुर्लभतम का सिद्धांत दिया.
  • केहर सिंह बनाम भारत संघ, 1989: कार्यपालिका की क्षमादान की शक्ति न्यायिक समीक्षा के अधीन है.
  • भगवान दास बनाम दिल्ली, 2011: ऑनर किलिंग मामलों में मृत्युदंड पर विचार किया जा सकता है.
  • विधि आयोग की 262वीं रिपोर्ट के अनुसार आतंकवाद और युद्ध छेड़ने के मामलों के अलावा मृत्युदंड समाप्त कर दिया जाना चाहिए.

मेरी राय – मेंस के लिए

हमें यह समझना होगा कि व्यावहारिक तौर पर ऐसी कोई व्यवस्था निर्मित नहीं की जा सकती जो कि मृत्युदंड से जुड़े सभी नैतिक प्रश्नों का समाधान कर दे. खासकर तौर पर ऐसे देशों में जो गंभीर किस्म के आतंकवाद और हिंसा जैसी समस्याओं से जूझ रहे हों. मौजूदा दौर में यह सहमति बनने लगी है कि यदि मृत्युदंड देना ही हो तो कम-से-कम पीड़ा के साथ दिया जाना चाहिये. इस संदर्भ में कार्बन मोनोऑक्साइड या नाइट्रोजन जैसी गैसों या लेथल इंजेक्शंस के प्रयोग पर विचार किया जा सकता है. अंततः महात्मा गांधी ने कहा है कि ‘नफरत अपराधी से नहीं, अपराध से होनी चाहिये.

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