संसद् में विधि-निर्माण की प्रक्रिया (Law-Making Procedure)

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आज हम जानेंगे कि संसद् में कानून कैसे बनता है? साधारण विधेयक मंत्रियों अथवा संसद् के निजी सदस्यों द्वारा संसद् के किसी भी सदन में रखे जा सकते हैं. इंग्लैंड की भांति भारत में भी विधेयक के तीन वाचन होते हैं, जो निम्न प्रकार हैं –

प्रथम वाचन – विधेयक को प्रस्तावित करना 

कुछ विषयों से सम्बन्धित विधेयकों को सदन में प्रस्तावित करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति आवश्यक होती है; जैसे – राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन करने वाले विधेयक. साधारणतया किसी विधेयक को प्रस्तुत करने की आज्ञा प्राप्त करने के लिए एक माह का नोटिस देना आवश्यक होता है. यदि कोई सदस्य किसी विधेयक को पेश करना चाहता है तो उसे सदन की आज्ञा  लेनी होती है. आज्ञा मिलने पर विधेयक प्रस्तुत करने वाला सदस्य, यदि विधेयक महत्त्वपूर्ण हुआ तो उसकी मुख्य बातों के सम्बन्ध में एक भाषण भी दे सकता है. इसी समय विधेयक के विरोधी सदस्यों द्वारा भी अपने विचार व्यक्त किये जा सकते हैं. यही विधेयक का प्रथम वाचन कहलाता है और इसके बाद विधेयक सरकारी गजट में प्रकाशित किया जाता है. परन्तु जब कभी लोकसभा का अध्यक्ष किसी विधेयक को सदन में पेश करने की आज्ञा करने के पूर्व ही उसे सरकारी गजट में प्रकाशित करने की आज्ञा दे दे तो प्रथम वाचन इससे पूरा हुआ समझ लिया जाता है.

द्वितीय वाचन

इसके बाद एक निश्चित दिन विधेयक का द्वितीय वाचन प्रारम्भ होता है. उस विधेयक का प्रस्तावक इन तीनों में से कोई एक प्रस्ताव रखता है –

  1. विधेयक प्रवर समिति को विचारार्थ सौंप दिया जाए.
  2. जनमत जानने हेतु प्रस्तावित किया जाए.
  3. उस पर तत्काल ही विचार किया जाए.

साधारणतः अति आवश्यक सरकारी अथवा विवाद-रहित विधेयकों को छोड़कर अन्य विधेयकों पर तत्काल विचार नहीं किया जाता है. समाज-सुधार सम्बन्धी विधेयक बहुधा जनमत जानने के लिए प्रसारित किए जाते हैं. किन्तु अधिकांश विधेयकों पर विचार हेतु “प्रवर समितियाँ” बना दी जाती हैं. उनमें से कोई-सा भी प्रस्ताव पास होने पर सदन में विधेयक के मूल सिद्धांतों पर वाद-विवाद होता है. इस समय विस्तार की बातों पर वाद-विवाद नहीं होता और न ही कोई संशोधन पेश किया जाता है.

इसके उपरान्त विधेयक तीसरी स्थिति में आता है, जिसे समिति स्थिति कहते हैं. प्रवर समिति में विधेयक का प्रस्तावक और कुछ अन्य सदस्य होते हैं. प्रवर समिति विधेयक की प्रत्येक धारा पर सूक्ष्म दृष्टि से विचार करती है और उसमें आवश्यकतानुसार संशोधन करती है. इसके बाद विधेयक का प्रस्तावक निश्चित दिन सदन के सम्मुख प्रवर समिति की रिपोर्ट पर विचार करने का प्रस्ताव रखता है. उसके स्वीकार हो जाने पर सदन में विधेयकों के संशोधित रूप की एक-एक धारा पर विस्तारपूर्वक विचार होता है. इस समय विचाराधीन अनुच्छेद या उसके खंड पर सदस्य अपनी ओर से संशोधन प्रस्तुत करते हैं. पहले संशोधन पर वाद-विवाद होता है और उस पर मत लिया जाता है, तब संशोधित अनुच्छेद पर मत लिया जाता है. इस पर विधेयक के एक-एक अनुच्छेद को स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जाता है. वस्तुतः विधेयक के पास होने में सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यही होता है.

तृतीय वाचन

अंत में विधेयक को किसी निश्चित दिन सदन के समक्ष विचारार्थ लाया जाया है. यह वाचन मुख्यतया औपचारिक ही होता है क्योंकि इस चरण में विधेयक में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किया जा सकता. तृतीय वाचन में साधारणतया विधेयक के अस्पष्ट शब्दों को अधिक स्पष्ट करने और उसमें भाषा सम्बन्धी सुधार किये जाते हैं. विधेयक पर मत लिए जाते हैं और यदि बहुमत विधेयक के पक्ष में हो तो सदन का अध्यक्ष विधेयक को पास हुआ प्रमाणित करके उसे दूसरे सदन में भेज देता है. दूसरे सदन द्वारा भी विधेयक के सम्बन्ध में यही प्रक्रिया अपनाई जाती है. दूसरे सदन द्वारा विधेयक को अस्वीकृत किये जाने या उसमें ऐसे संशोधन किये जाने पर, जो प्रथम सदन को स्वीकार्य न हो, अनुच्छेद 108 के अनुसार, राष्ट्रपति दोनों सदनों की एक संयुक्त बैठक बुला सकता है और संयुक्त बैठक में बहुमत के आधार पर विधेयक के भाग्य का निर्णय होता है. यदि दूसरा सदन 6 माह तक विधेयक पर कोई कार्यवाही न करे तो भी राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलवा सकता है.

विधेयक के दोनों सदनों द्वारा पारित होने पर वह राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है. राष्ट्रपति उसे स्वीकृत या अस्वीकृत कर सकता है या विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है. राष्ट्रपति द्वारा विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाने पर यदि दोनों सदन विधेयक को संशोधन के साथ या बिना संशोधन के अस्वीकार कर लेते हैं तो राष्ट्रपति उस पर स्वीकृति प्रदान करने के लिए बाध्य होता है.

संविधान संशोधन विधेयक पारित किए जाने की भी वही प्रक्रिया है जो प्रक्रिया साधारण विधेयकों के पास किए जाने की है. अंतर केवल यह है कि संविधान संशोधन विधेयक के सम्बन्ध में संसद् के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की कोई व्यवस्था नहीं है और इस प्रकार के विधेयक के लिए संसद् के दोनों सदनों से अलग-अलग स्वीकृति होना आवश्यक है.

वित्त विधेयक के सम्बन्ध में कुछ विशेष बातें

साधारणतया आय-व्यय से सम्बन्धित सभी विधयेक वित्त विधेयक कहे जा सकते हैं. संविधान के अनुच्छेद 110 में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार के विधेयक वित्त विधेयक कहे जायेंगे. कोई विधयेक वित्त विधेयक है अथवा नहीं, इसका अंतिम निर्णय लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा किया जाएगा.

वित्त विधेयक पारित करने की भी प्रक्रिया लगभग वही है जो साधारण विधेयक पारित करने की है, फिर भी इस सम्बन्ध में कुछ विशेष बातें हैं.

  1. वित्त विधेयक राष्ट्रपति की अनुमति से ही प्रस्तावित किये जा सकते हैं और ये विधेयक लोकसभा में ही प्रस्तावित हो सकते हैं, राज्यसभा में नहीं.
  2. लोकसभा द्वारा पारित होने पर वित्त विधेयक राज्यसभा में उपस्थित किये जाते हैं और राज्य सभा को 14 दिन के भीतर वित्त विधेयक पर अपना मत प्रकट करने का अधिकार है. यदि लोकसभा राज्यसभा को सिफारिश न करे तो विधेयक उस रूप में दोनों सदनों द्वारा पारित समझा जाता है, जिस रूप में वह लोकसभा द्वारा पारित हुआ था. यदि राज्यसभा 14 दिन न विधेयक पर अपना मत व्यक्त नहीं करती है तो 14 दिन की समाप्ति पर विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित समझा जाता है और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से क़ानून बन जाता है.

प्रश्न – GS Paper 2

  1. राज्यसभा का गठन कैसे होता है? इसके कार्यों पर प्रकाश डालिए.
  2. लोकसभा और राज्यसभा के पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन कीजिये.
  3. लोकसभा की रचना किस प्रकार होती है? राज्यसभा से उसके संबंधों पर प्रकाश डालें.
  4. भारतीय संसद् में विधि निर्माण प्रक्रिया का वर्णन करें.

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