[Sansar Editorial] ISRO के चंद्रयान 2 मिशन का महत्त्व और उससे जुड़ी संभावनाएँ

Richa KishoreSansar Editorial 20192 Comments

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए चंद्रयान-2 के प्रक्षेपण को टाल दिया. विदित हो कि ISRO 15 जुलाई, 2019 को देर रात 2 बजकर 51 मिनट पर श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) से चंद्रयान-2 को लॉन्च करने करने जा रहा था. इसरो ने कहा है कि वह शीघ्र ही अनावरण की नई तिथि की घोषणा करेगा.

isro tweet about chandryan 2

पृष्ठभूमि

चंद्रयान-1 की सफलता के पश्चात् इसरो ने चंद्रयान-2 की योजना बनाई थी. ISRO का कहना था कि चंद्रयान-2 चंद्रमा की उस सतह पर जाएगा जहाँ आज तक किसी भी देश का यान नहीं पहुँचा है. चंद्रयान-2 चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा. चंद्रयान-II के माध्यम से चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर एक रोवर उतारने के लिए भेजा जाना है. विदित हो कि अब तक केवल संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन चंद्रमा की सतह से बिना टकराए हुए यान सफलतापूर्वक उतार सके हैं.  

चन्द्रयान II मिशन के विषय में मुख्य तथ्य

  • चंद्रयान 2 का भार 3.8 टन है. इसको जीएसएलवी मार्क-3 रॉकेट द्वारा अंतरिक्ष में ले जाया जाना है जिसका भार 640 टन है. यह लगभग 15 मंज़िला भवन जितना ऊँचा है.
  • इस रॉकेट को तीसरी बार किसी मिशन में प्रयोग किया जाना था. चंद्रयान-2 का सबसे बड़ा उद्देश्य चंद्रमा की सतह पर पानी की खोज करना है. अनावरण के लगभग दो मास बाद 3.84 लाख किलोमीटर की यात्रा पूरी करके चंद्रयान-2 चांद पर पहुँचेगा.
  • चंद्रयान-2 में ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर हैं. एक विशेष बात इस मिशन की यह भी है कि इसके ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर भारत में ही निर्मित हुए हैं.
  • भारत अगर इस मिशन में सफल हो जाता है तो वह चाँद की सतह पर सॉफ़्ट लैंडिंग करने वाले देशों की सूची में सम्मिलित हो जाएगा.
  • चंद्रमा पर पहुँचने के पश्चात् चंद्रयान-2 का रोवर जिसे ‘प्रज्ञान’ नाम दिया गया है वह पृथ्वी के 14 दिनों तक परीक्षण करेगा.
  • चंद्रयान-2 के अतिरिक्त भारत का अगला सबसे बड़ा मिशन गगनयान है जिसके अंतर्गत 2022 तक मानव को अंतरिक्ष में भेजना है.

हीलियम 3

ISRO का चंद्रयान 2 अन्तरिक्ष यान चंद्रमा की सतह पर हीलियम 3 के भंडार का पता लगाएगा. विदित हो कि हीलियम आणविक ऊर्जा का एक स्वच्छ स्रोत है जिसके माध्यम से संसार में बिजली की समस्या का समाधान हो सकता है. इस योजना में 800 करोड़ रु. की लागत आएगी. बताया जाता है कि चंद्रमा में हीलियम के आइसोटोपों (Isotope of Helium) की प्रचुर मात्रा है जिससे हमारी धरती को सदियों तक बिजली दी जा सकती है. हीलियम 3 एक बहुत महँगा पदार्थ है और एक विशेषज्ञ के अनुसार इसका दाम प्रति टन पाँच करोड़ डॉलर होता है. अनुमान है कि चाँद में 10 लाख टन हीलियम 3 विद्यमान है. परन्तु उसका एक चौथाई हिस्सा ही धरती तक लाया जा सकता है. ISRO को यह तय करना पड़ेगा कि वह चंद्रमा से हीलियम 3 कैसे लायेगा. धरती पर लाये गये हीलियम 3 से परमाणविक बिजली पैदा करने की प्रक्रिया पर भी काम करना अभी शेष है. साथ ही अभी तक अन्य ग्रहों, उपग्रहों से प्राप्त पदार्थों के उपयोग के सम्बन्ध में कोई अंतर्राष्ट्रीय संधि नहीं हो सकी है. ऐसी संधि के बिना कोई भी देश इन पदार्थों का दोहन नहीं कर पायेगा.

GSLV MARK III

  1. यह अन्तरिक्ष में GTO तक 4 टन के उपग्रह भेजने में सक्षम है. GTO का तात्पर्य है Geosynchronous Transfer Orbit.
  2. Low Earth Orbit (LEO) तक यह 8 टन का यान छोड़ सकता है. इतना भार मनुष्य से युक्त अन्तरिक्ष यान को प्रक्षेपित करने के लिए पर्याप्त है. ISRO के पूर्व अध्यक्ष, जोकि इस rocket की अवधारणा करने वाले मुख्य वैज्ञानिक थे, ने बतलाया है कि यह rocket भारतीयों को अंतरिक्ष में भेजने में सहायक होगा. सुना जा रहा है कि ऐसे अंतरिक्ष यान में जाने वाले भारतीय संभवतः “Gaganauts or Vyomanauts” कहे जायेंगे.
  3. इस रॉकेट के साथ GSAT 19 उपग्रह भी छोड़ा गया है जिससे दूरसंचार और ब्राडकास्टिंग में प्रगति आयेगी. इन उपग्रहों का कुल भार 3136 kg है.
  4. इस रॉकेट में एक ऐसा cryogenic engine लगाया गया है जिसमें तरल oxygen और तरल hydrogen का  प्रयोग हुआ है.
  5. GSLV Mark III भारत का अब तक का सबसे भारी रॉकेट है. इसका भार 640 टन है. यह भार 200 वयस्क एशियाई हाथियों के भार के बराबर है. दूसरे शब्दों में यह पूर्णतः भरे हुए 5 बोईंग जंबो जेटों (equivalent to the weight of five fully loaded Boeing Jumbo Jets) के बराबर भारी है. फिर भी यह ध्यान देने योग्य बात है कि यह सबसे छोटा रॉकेट भी है क्योंकि इसकी ऊँचाई मात्र 43 मीटर ही है.
  6. स्मरण रहे कि अब तक ISRO को 2300 kg. से अधिक भारी उपग्रह को छोड़ने में विदेशी प्रक्षेपकों (launchers), जैसे कि France का Ariane प्रक्षेपक, की सहायता लेनी पड़ती थी,
  7. इसमें GSAT 19 में पहली बार भारत में ही बने lithium-ion batteries का प्रयोग हुआ है.
  8. GSAT को ऐसा बनाया गया है कि यह कम-से-कम 10 वर्ष तक देश को अपनी सेवा देता रहेगा.

ऑर्बिटर के पेलोड 

  • टेरैन मैपिंग कैमरा – यह कैमरा पूरे चाँद का डिजिटल एलिवेशन मॉडल तैयार करेगा.
  • लार्ज एरिया सॉफ्ट एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर – चाँद की सतह के घटकों का परीक्षण करेगा.
  • सोलर एक्स-रे मॉनिटर – सोलर एक्स-रे स्पेक्ट्रम का इनपुट मुहैया कराएगा.
  • इमेजिंग आइआर स्पेक्ट्रोमीटर – खनिजों के आँकड़े जुटाएगा और बर्फ की मौजूदगी के प्रमाण तलाशेगा.
  • सिंथेटिक अपर्चर रडार L&S बैंड्स – ध्रुवीय क्षेत्र को खंगालेगा और सतह के नीचे बर्फ की उपस्थिति के प्रमाण जुटाएगा.
  • एटमॉस्फेरिक कम्पोजीशन एक्स्प्लोरर – 2 – चाँद के वातावरण का अध्ययन करेगा.
  • ऑर्बिटर हाई रेजोल्यूशन कैमरा – चाँद की सतह की तस्वीरें लेगा
  • डुअल फ्रीक्वेंसी रेडियो साइंस एक्सपेरिमेंट – चाँद के आयनोस्फेयर का अध्ययन करेगा.

लैंडर के पेलोड

  • इंस्ट्रूमेंट फॉर लुनार सिस्मिक इक्विटी – लैंडिंग साईट पर भूकम्पीय गतिविधियों का पता लगाएगा.
  • सर्फेस थर्मो फिजिकल एक्सपेरिमेंट  – चाँद के थर्मल कंडक्टिविटी का अध्ययन करेगा
  • लैंगम्यूर प्रोब – चाँद की सतह का अध्ययन करेगा. 

रोवर के पेलोड

  • अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर – चाँद की सतह पर घटकों का विश्लेषण करेगा.
  • लेजर इंड्यूस्ड ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोप – लैंडिंग साईट के आसपास विभिन्न घटकों की उपस्थिति जांचेगा.

आगे की राह

आज के युग में अन्तरिक्ष यात्राओं के महत्त्व को कम कर के आँका नहीं जा सकता. यही कारण है कि विश्व के सभी सक्षम देश अन्तरिक्ष तथा चंद्रमा और अन्य ग्रहों तक अपनी पहुँच बनाने में तत्परतापूर्वक लगे हुए हैं. एक ओर इससे जहाँ किसी देश को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलती है तो वहीं दूसरी ओर इससे उसकी वैज्ञानिक क्षमता भी प्रकट होती है. भविष्य में चन्द्रमा और ग्रहों की यात्रा का आर्थिक महत्त्व भी होगा. जैसे-जैसे धरती के प्राकृतिक संसाधन घटेंगे, वैसे-वैसे इस बात की तीव्र आवश्यकता होगी कि इन संसाधनों को अन्यत्र खोजा जाए. उदाहरण के लिए हीलियम 3 को ही लिया जाए जिसके उपयोग की असीम संभावनाएँ दिख रही हैं. भारत यदि चंद्रमा पर अपनी उपस्थिति दर्ज करता रहा तो उसका नाम उन देशों में होगा जिन्हें चंद्रमा के संसाधनों के दोहन का विशेषाधिकार होगा. भारत की यह बढ़त उसे बहुत आगे ले जायेगी इसमें कोई संशय नहीं है.

Tags : ISRO के चंद्रयान 2 मिशन का महत्व और उससे जुड़ी संभावनाएँ. Chandrayaan 2 Mission Launch Called Off Due to Technical Snag, Revised Dates. Specifications and scope.

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About the Author

Richa Kishore

ऋचा किशोर sansarlochan.IN की सह-संपादक हैं. ये आपके साथ भौतिक, रसायन और जीव विज्ञान से सम्बंधित जानकारियाँ साझा करेंगी.

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