[Sansar Editorial] ईरान द्वारा यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम पुनः प्रारम्भ करने की घोषणा

Sansar LochanSansar Editorial 2021Leave a Comment

यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम पुनः प्रारम्भ करके ईरान ने सभी देशों की नींद उड़ा दी, विशेषतः अमेरिका की. ईरान ने यह कदम तब उठाया है जब ट्रम्प का शासनकाल अब खत्म ही होने वाला है और अमेरिका में नए राष्ट्रपति का आगमन होने वाला है. ईरान ने परमाणु प्रतिबंधों को समाप्त करने के विषय में विश्व शक्तियों के साथ हुए 2015 के परमाणु समझौते का एक बड़ा उल्लंघन करते हुए यूरेनियम को 20% शुद्धता तक पहुँचाने का कार्य फिर से शुरू कर दिया है.

हाल ही में ईरानी बलों ने फारस की खाड़ी को पार करने वाले एक दक्षिण कोरियाई झंडे वाले जहाज को भी जब्त कर लिया था.

वैसे, ईरान ने पूरे जोर-शोर से यह कदम उठाया है. यह कहना कि ईरान ने यह कदम चोरी-छिपे उठाया है, गलत होगा क्योंकि ईरान ने विधिवत् इस कार्यक्रम के पुनः आरम्भ करने से सम्बंधित अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आइएईए) को सूचित किया था. पर सच्चाई यही है कि ईरान के इस निर्णय से पश्चिमी एशिया और अमेरिका तनाव में आ गये हैं.

संवर्धित यूरेनियम

  • यूरेनियम, प्लूटोनियम या थोरियम जैसे रेडियोधर्मी परमाणुओं के भारी नाभिक को कम ऊर्जा वाले न्यूट्रॉन के साथ बमबारी किया जाता है जो नाभिक को छोटे नाभिक में विभाजित करते हैं. इस प्रक्रिया को परमाणु विखंडन (Nuclear Fission) कहा जाता है. यानी इस प्रक्रिया में एक परमाणु का नाभिक दो संतति नाभिकों (Daughter Nuclei) में विभाजित होता है. जो विखंडन में खंड या अंश प्राप्त होते हैं उनका एक संयुक्त द्रव्यमान होता है जो कि मूल परमाणु से कम होता है. द्रव्यमान में हुई यह क्षति सामान्यतः परमाणु ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है उदाहरण के लिए जब यूरेनियम –235 (Uranium-235) परमाणु न्यूट्रॉन के साथ बमबारी करते हैं तो भारी यूरेनियम नाभिक तीन न्यूट्रॉन के उत्सर्जन के साथ बेरियम-139 (Barium-139) और क्रिप्टन -94 (Krypton-94) का उत्पादन करता है. इस प्रतिक्रिया में बहुत अधिक ऊर्जा भी उत्पन्न होती है क्योंकि द्रव्यमान (Mass) वर्तित हो जाता है.
  • प्राकृतिक रूप से प्राप्त यूरेनियम में यूरेनियम-235 की मात्रा केवल 0.07% होती है शेष 99.284% यूरेनियम-238 होता है.
  • जिस यूरेनियम में यूरेनियम-235 का की प्रतिशत मात्रा किसी विधि से बढ़ा दी गयी हो उसे संवर्धित यूरेनियम (Enriched uranium) कहते हैं।
  • U-235 ही प्राकृतिक रूप से प्राप्त एकमात्र आइसोटोप (समस्थानिक) है जो उष्मीय न्यूट्रानों (thermal neutrons) द्वारा विखंडित हो सकता है। संवर्धित यूरेनियम नाभिकीय रिएक्टर बनाने अथवा सैन्य हथियार (परमाणु बम) बनाने के लिये अति आवश्यक है।
  • अन्तरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेन्सी विश्व भर में संवर्धित यूरेनियम पर नजर रखती है। अल्प संवर्धित यूरेनियम इसमें यूरेनियम-235 की मात्रा 20% से कम होता है। सामान्यतः 3 से 5 % यूरेनियम-235 होती है। यह नाभिकीय रिएक्टर के लिए उपयुक्त होती है।
  • अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम में यूरेनियम-235 की मात्रा 20 % से लेकर 80% तक होती है। यह नाभिकीय अस्त्रों के विकास के लिए उपयुक्त होती है।

यदि इतिहास देखा जाए तो जब ईरान ने एक दशक पूर्व 20% यूरेनियम संवर्धन की दिशा में कदम उठाया था तो उसके और इजराइल के बीच तनाव काफी बढ़ गया था. इसलिए यह डर अब बन चुका है कि ईरान के इस कदम का अंत कहीं ईरान और पश्चिम एशिया के बीच युद्ध न हो जाए.

ईरान कहता आया है कि वह यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम का प्रयोग वह परमाणु हथियार बनाने के लिए नहीं करेगा, बल्कि वह इस कार्य्रकम के माध्यम से शांतिपूर्ण कार्यों को ही अंजाम देगा. लेकिन अमेरिका सहित पश्चिमी देश इसको मानने के लिए तैयार नहीं हैं.

आज पश्चिम एशिया में जिस प्रकार की परिस्थिति है, उसमें स्वयं को सुरक्षित रखने हेतु ईरान को परमाणु शक्ति संपन्न देश बनने की आवश्यकता का अनुभव हो रहा है और इसके लिए उसे दबे जबान से रूस और चीन का भी समर्थन प्राप्त है. परन्तु मध्य एशिया एवं पश्चिमी देश इसलिए डरे हुए हैं कि अगर एक बार ईरान ने परमाणु हथियार बना लिए तो वह क्षेत्रीय शांति के लिए सबसे बड़ा संकट बन जाएगा. सबसे अधिक खतरा तो उसके परम शत्रु इजराइल को सता रहा है. इसलिए ईरान पर लगाम कसने के लिए उस पर कड़ी पाबंदियां लगी हुई हैं. परिणामस्वरूप ईरान आर्थिक रूप से पिछड़ता जा रहा है. अमेरिका भी भारत सहित कई देशों को कह चुका है कि ईरान से कोई तेल नहीं खरीदे.

हालांकि ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने के लिए साल 2015 में ईरान परमाणु समझौता हुआ था. इस समझौते में ईरान तथा विश्व के छह देशों – अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी (अर्थात् P5+जर्मनी+यूरोपियन संघ) के बीच सम्पन्न हुआ था.  इस समझौते को संयुक्त व्यापक कार्य योजना (Joint Comprehensive Plan of Action : JCPOA) भी कहते हैं. इसके एवज में ईरान यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम रोक देने पर राजी हो गया  था. परन्तु वर्ष 2018 में संयुक्त राज्य अमेरिका इस समझौते से बाहर निकल आया और ईरान को सबक सिखाने की ठान ली.

ईरान को लेकर अमेरिका का रुख क्या रहेगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा. परन्तु ईरान का यह कदम अमेरिका पर एक तरह का दबाव अवश्य बनाएगा. ईरान की रणनीति यह है कि अमेरिका पुनः वाले समझौते शामिल हो जिससे कि ट्रंप हट गए थे.

बाइडेन इस समझौते से जुड़ने के तो संकेत पहले से दे चुके हैं.

वर्ष 2015 के समझौते में सम्मिलित सभी देशों को रचनात्मक दिशा में कार्य करने के लिए संलग्न होना चाहिये और सभी मुद्दों को शांति तथा वार्ता के जरिये हल करने की कोशिश करना चाहिये. अमेरिका एवं ईरान दोनों को रणनीतिक संयम के साथ कार्य करना चाहिये, क्योंकि पश्चिम एशिया में कोई भी संकट न केवल इस क्षेत्र को प्रभावित करेगा बल्कि वैश्विक मामलों पर भी प्रतिकूल असर डालेगा.

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