भारतीय वन अधिनियम, 1927 में प्रस्तावित संशोधन

Sansar LochanBills and Laws: Salient Features, Down To EarthLeave a Comment

Indian Forest Act amendment

हाल ही में भारतीय वन अधिनियम, 1927 में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर विवाद चल रहा है. सरकार का कहना है कि ये संशोधन वन संपदा के हित में किये जा रहे हैं, जबकि कुछ लोगों का मन्तव्य है कि इन संशोधनों के चलते वन समुदायों के अधिकारों का उल्लंघन होगा.

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70-year-old Adil Sai Armo looks at the forest land in Ghabarwa village in Chhattisgarh’s Sarguja district that once belonged to people like him, but was taken away for mining (Photo: Vikash Choudhary) Source : Down to Earth

प्रारूप के मुख्य तत्त्व

  • संशोधन प्रारूप में वन अधिकारियों को बड़ी शक्तियाँ दी जा रही हैं. वे तलाशी का वारंट निकाल सकते हैं और अपने कार्यक्षेत्र के अन्दर पड़ने वाली भूमि में प्रवेश कर जाँच कर सकते हैं और वन से सम्बंधित अपराधों को रोकने के लिए हथियार का प्रयोग कर सकते हैं. संशोधन वन अधिकारियों को हथियार के प्रयोग करने पर उन्हें क्षमा देने का वादा करता है. ये अधिकारी रेंजर स्तर के नीचे के अधिकारी नहीं होंगे.
  • प्रस्तावित संशोधन में वन विकास के लिए सेस (cess) का प्रस्ताव है जो जंगल से बाहर ले जाए जाने वाले खनन उत्पादों और पानी के आकलित मूल्य का 10% तक होगा. यह राशि एक विशेष कोष में जमा की जायेगी और इसका उपयोग मात्र फिर से जंगल लगाने, जंगल की सुरक्षा करने और अन्य प्रासंगिक उद्देश्यों जैसे वृक्ष रोपण, वन विकास एवं संरक्षण पर खर्च की जायेगी.
  • प्रारूप में “समुदाय” को इस प्रकार परिभाषित किया गया है – सरकारी प्रलेखों के आधार पर लक्षित व्यक्तियों का वह समूह जो किसी विशेष स्थान में रहता है और जिसका सामान्य सम्पदा संसाधनों पर संयुक्त रूप से अधिकार होता है. इस परिभाषा में नस्ल, धर्म, जाति, भाषा और संस्कृति का कोई स्थान नहीं है.
  • प्रस्तावित संशोधन में वन की परिभाषा इस प्रकार है – किसी भी सरकारी प्रलेख में वन अथवा वनभूमि के रूप में अभिलिखित अथवा अधिसूचित कोई भी सरकारी अथवा निजी अथवा संस्थानगत भूमि तथा समुदाय द्वारा वन एवं मैन्ग्रोव के रूप में प्रबंधित भूमि तथा साथ ही ऐसी कोई भी भूमि जिसे केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार अधिसूचित कर अधिनियम के लिए वन के रूप में घोषित करे.
  • भारतीय वन अधिनियम, 1927 की प्रस्तावना में वर्णित था कि अधिनियम मुख्य रूप से उन कानूनों पर केन्द्रित है जो वन उत्पादों के परिवहन और उन पर लगने वाले कर से सम्बंधित हैं. परन्तु प्रस्तावित संशोधन में अधिनियम के लिए मुख्य विचारणीय विषय अब ये हो गये हैं – वन संसाधनों का संरक्षण, संवर्द्धन और सतत प्रबंधन तथा पारिस्थितिकी तन्त्र की सेवाओं की शाश्वत उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पर्यावरणगत स्थिरता को सुरक्षा तथा जलवायु परिवर्तन एवं अंतर्राष्ट्रीय वचनबद्धताओं से सम्बंधित चिंता.
  • संशोधन में राज्यों की भूमिका पहले से बड़ी कर दी गई है. अब यदि कोई राज्य यह अनुभव करता है कि वन अधिकार अधिनियम (FRA) के अंतर्गत प्रदत्त किसी अधिकार से संरक्षण के प्रयासों में अड़चन आती है तो वह राज्य ऐसे अधिकार में परिवर्तन कर सकता है और इसके लिए सम्बन्धित व्यक्ति को बदले में धनराशि दे सकता है अथवा भूमि दे सकता है अथवा ऐसा कोई भी कदम उठा सकता है जिससे वन में रहने वाले समुदायों का सामाजिक सन्गठन ज्यों का त्यों बना रहे अथवा ऐसे वन समुदायों को कोई ऐसा नया वन खंड दे सकता है जिसका आकार पर्याप्त हो और जहाँ वनवासी ठीक-ठाक सुविधाओं के साथ रह सकें.
  • संशोधन के प्रारूप में वनों की एक नई श्रेणी बनाई गई है – उत्पादन वन. ये वे वन होंगे जहाँ इन वस्तुओं का विशेष रूप से उत्पादन होता है – इमारती लकड़ी, पल्प, पल्प वुड, जलावन, गैर-इमारती वन उत्पाद, औषधीय पौधे अथवा अन्य वन प्रजातियाँ.

भारतीय वन अधिनियम, 1927

  • भारतीय वन अधिनियम, 1927 (Indian Forest Act, 1927) मुख्य रूप से ब्रिटिश काल में लागू पहले के कई भारतीय वन अधिनियमों पर आधारित है. इन पुराने अधिनियमों में सबसे प्रसिद्ध था – भारतीय वन अधिनियम, 1878.
  • 1878 और 1927 दोनों अधिनियमों में वनाच्छादित क्षेत्र अथवा वह क्षेत्र जहाँ बहुत से वन्य जीव रहते हैं., वहाँ आवाजाही एवं वन-उत्पादों के स्थानान्तरण को नियंत्रित किया गया था. साथ ही इमारती लकड़ी और अन्य वन उत्पादों पर चुंगी लगाए जाने का प्रावधान किया गया था.
  • 1927 के अधिनियम में किसी क्षेत्र को आरक्षित वन अथवा सुरक्षित वन अथवा ग्राम वन घोषित करने की प्रक्रिया बताई गई है. 1927 के अधिनियम में यह भी बताया गया है कि वन अपराध क्या है और किसी आरक्षित वन के भीतर कौन-कौन से कार्य वर्जित हैं और अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन के लिए कौन-कौन से दंड निर्धारित हैं.

मुख्य परीक्षा के लिए सवाल
भारतीय वन अधिनियम, 1927 में किये जा रहे संशोधनों के फलस्वरूप गरीब समुदायों के लिए नए बाजार खुलने और रोजगार मिलने का मार्ग खुलेगा, इसका तार्किक विश्लेषण करें.

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