भारत का पड़ोसी देशों के साथ नदी जल सम्बन्ध – India’s Water Relations with Neighbors

Sansar LochanIndia and its neighbours, International Affairs3 Comments

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आज हम जानने की कोशिश करेंगे कि भारत का अपने पड़ोसी राज्यों के साथ नदी जल सम्बन्ध कैसा है? ऐसे कौन से नदी से सम्बंधित (river related disputes) मामले हैं जो समाचारों में तो सुर्खियाँ बटोरते ही हैं, साथ ही साथ परीक्षा में भी कभी-कभी पूछ लिए जाते हैं. (Source: Vision IAS Notes, Pictures from The Hindu)

भूमिका

भारत पाकिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे देशों के साथ कई सीमापारीय नदियों को साझा करता है. भारत ने अपने पड़ोसी देशों के साथ कई द्विपक्षीय नदी जल-साझाकरण संधियाँ प्रतिपादित की हैं पर अभी भी कई नदी जल विवाद आये दिन भारत को मुश्किल में डालते रहते हैं.

इन संधियों में मुख्यतः गंगा (बांग्लादेश-भारत), सिंधु (भारत-पाकिस्तान) और गंडक (भारत-नेपाल) नदियों की संधियाँ विवाद के घेरे में हमेशा रहती हैं. गंडक और महाकाली बेसिन के प्रबन्धन में साझा नदी के जल को विभाजित करने के हेतु कोई फार्मूला तय नहीं किया गया है.

साउथ-नार्थ वाटर ट्रान्सफर प्रोजेक्ट तिब्बती जल को स्थानांतरित करने की चीन की एक परियोजना है. चीन का यह प्रोजेक्ट विवादों के घेरे में इसलिए रहा है क्योंकि चीन ब्रह्मपुत्र नदी के जल की दिशा को उत्तर की ओर परिवर्तित करने की सोच रहा है. यदि चीन ऐसा करता है तो भारत और बांग्लादेश के लिए यह एक जल युद्ध की घोषणा के समान होगा. चीन ने इस प्रोजेक्ट में उस स्थान को चिन्हित किया है जहाँ ब्रह्मपुत्र भारत में प्रवेश करने से पूर्व विश्व के सबसे बड़े और गहरे कैनियन का निर्माण करती है जो जल और ऊर्जा की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए सबसे बड़ा भण्डार है.

ब्रह्मपुत्र नदी और भारत-चीन-बांग्लादेश सम्बन्ध

brahmputra river dispute between india and china

Picture source : The Hindu

ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम तिब्बत से होता है और उसके बाद भारत और बांग्लादेश से प्रवाहित होते हुए हिन्द महासागर में गिरती है. इसका अधिकांश भाग चीन द्वारा नियंत्रित होता है. तीनों देशों की जल सुरक्षा के लिए यह नदी बहुत महत्त्वपूर्ण है. मगर प्रत्येक देश के लिए इस नदी के निहितार्थ भिन्न हैं.

चीन के लिए

  • ब्रह्मपुत्र, चीन के लिए जलबिजली परियोजनाओं के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है और उसके घरलू जल की कमी को पूरा करता है. शायद इसलिए चीन ने दक्षिण-उत्तर-जल परिवहन परियोजना के माध्यम से ब्रह्मपुत्र पर बाँध बनाने और नदी जल की दिशा परिवर्तित करने की योजना बनाई गई है.
  • भारत-चीन के मध्य संचार और सामरिक विश्वास को सुदृढ़ बनाने के लिए कई MoUs पर हस्ताक्षर किये गये हैं पर इसके बावजूद दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर काफी तनाव रहता है.
  • इसके अतिरिक्त चीन भारत और बांग्लादेश के साथ विस्तृत-बेसिन सहयोग में शामिल होने के लिए अनिच्छुक है.

भारत के लिए

  • ब्रह्मपुत्र, भारत में केवल 3% क्षेत्र से होकर ही प्रवाहित होती है लेकिन इसका जल पूर्वोत्तर राज्यों में निवास करने वाली आबादी के लिए बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है.
  • हमारे देश की नीति चीन और बांग्लादेश की तुलना में काफी अलग है. भारत को चीन की बाँध बनाने और उसके द्वारा नदी के मार्ग को परिवर्तित करने की योजना से घोर आपत्ति है. भारत की नीतियाँ उसके नदी सम्बन्धी अधिकारों की प्राप्ति की इच्छा, बिजली उत्पादन और बाँध बनाकर पूर्वोत्तर राज्यों में बाढ़ एवं मृदा के कटाव को नियंत्रित करने की इच्छा के इर्द-गिर्द घूमती हैं.
  • भारत द्वारा अपने क्षेत्र में शुष्क ऋतु के दौरान ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी तीस्ता के प्रवाह का उपयोग करने के उद्देश्य से इस पर बाँध बनाए गये हैं. भारत का यह कृत्य बांग्लादेश की सिंचाई सम्बन्धी आवश्यकताओं के लिए आवश्यक जल आपूर्ति को बाधित कर सकता है. विदित हो कि बांग्लादेश, बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले ब्रह्मपुत्र नदी का अंतिम पड़ाव है.
  • भारत की बांग्लादेश के साथ ब्रह्मपुत्र से सम्बंधित चिंताएँ उसके अन्य देशों के साथ व्यापक सम्बन्धों के ही भाग हैं जिनका संयुक्त नदी आयोग (JRC) तथा तीस्ता एवं गंगा नदी पर विशिष्ट समझौतों के माध्यम से समाधान करने का प्रयास किया जा रहा है.

बांग्लादेश के लिए

  • ब्रह्मपुत्र और इसकी सहायक नदियों के ऊपरी प्रवाह पर स्थित पड़ोसी देशों द्वारा की जाने वाली कार्यवाहियों से अधिकतम खतरे का सामना बांग्लादेश को ही उठाना पड़ता है क्योंकि इसकी आबादी का अधिकांश हिस्सा देश की सीमा के बाहर से उद्गमित नदियों पर ही निर्भर है.
  • बांग्लादेश चीन की बाँध-निर्माण योजनाओं और पारदर्शिता की कमी की तुलना में भारत द्वारा की जाने वाली नदियों से सम्बंधित कार्यवाहियों को अधिक सतर्कतापूर्वक देखता है.
  • हाल ही में, भारत और बांग्लादेश के बीच संबंधों में थोड़ा-बहुत सुधार होता दिखाई दे रहा है और इस मैत्रीपूर्ण स्थिति में तीस्ता नदी समझौते पर हस्ताक्षर किये जाने के कयास लगाये जा रहे हैं.
  • हाल ही में, संयुक्त नदी आयोग (JRC) द्वारा दोनों देशों को मिलकर कार्य करने और जल का प्रबंधन करने हेतु योजना बनाई जा रही है और इस क्रम में भारत और बांग्लादेश के बीच 10 अन्य सीमापारीय नदियों की औपचारिक पहचान की गई है.

भारत-बांग्लादेश जल सहयोग

  1. भारत और बांग्लादेश के मध्य 54 नदियाँ साझा होती हैं लेकिन दोनों देशों द्वारा केवल एक द्विपक्षीय नदी जल साझाकरण संधि (गंगा के लिए) सम्पन्न की गई है.
  2. गंगा नदी के जल साझाकरण के लिए 1966 में संधि पर हस्ताक्षर किये गये थे. इसके तहत पारस्परिक सहमति से तीस वर्ष की अवधि के बाद संधि का फिर से नवीकरण करने का प्रावधान किया गया. संधि के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए एक संयुक्त समिति की स्थापना की गई थी.
  3. किन्तु बांग्लादेश का आरोप है कि फरक्का बैराज (भारत) के बनने के बाद हार्डिंग ब्रिज (बांग्लादेश) में शुष्क मौसम के समय जल प्रवाह में अच्छी-खासी गिरावट देखी गई है. इससे बांग्लादेश की कृषि और सम्बद्ध क्षेत्रों पर बुरा प्रभाव पड़ा है.

JRC क्या है?

  • दोनों देशों के बीच नदी जल विभाजन सम्बन्धी चुनौतियों के समाधान के लिए 1972 से ही एक भारत-बांग्लादेश संयुक्त नदी आयोग (JRC) कार्यरत है.
  • इसकी स्थापना साझी नदी प्रणालियों से अधिकतम लाभ पाने के लिए की गई थी.

भारत और नेपाल जल सम्बन्ध

  • भारत और नेपाल के बीच कोसी समझौते पर 1954 में हस्ताक्षर किये गये थे, लेकिन इसके बाद में दोनों सरकारों के बीच वार्ता रोक दी गई और जल अधिकार सम्बन्धी मुद्दों का उचित रूप से समाधान नहीं किया गया. 2008 और 2014 में बिहार में आई भीषण बाढ़ का प्रमुख कारण कोसी नदी ही थी.
  • भारत और नेपाल ने 1996 में महाकाली संधि पर भी हस्ताक्षर किये. पंचेश्वर बहुद्देशीय परियोजना का कार्यान्वयन महाकाली संधि का प्रमुख बिंदु है. वर्तमान में इसके लिए पर्यावरणीय मंजूरी प्रगति पर है.
  • इसकी संरचना की निगरानी से सम्बंधित संधि के संदिग्ध प्रावधानों के कारण पंचेश्वर बाँध परियोजना को अभी तक कार्यान्वित नहीं किया गया है. नेपाल की आम जनता इस बाँध के निर्माण को लेकर अंसतुष्ट है.
  • सप्त कोसी उच्च बाँध परियोजना और Sun Koshi Storage-cum-Diversion Scheme, कमला और बागमती बहुद्देशीय परियोजनाएँ, करनाली बहुद्देशीय परियोजना आदि दोनों देशों के बीच विचार-विमर्श के विभिन्न चरणों में हैं.

नेपाल-भारत मैत्री परियोजना

  • भारत ने नेपाल को हाल ही में 9.9 करोड़ रु. की वित्तीय सहायता प्रदान की है.
  • यह अनुदान 2017 में प्रारम्भ नेपाल-भारत मैत्री सिंचाई परियोजना का एक भाग है.
  • मैत्री परियोजना का लक्ष्य देश के दक्षिणी तराई क्षेत्र के 12 जिलों में 2,700 कम गहराई वाली ट्यूबवेल सिंचाई प्रणालियों का निर्माण करना है.
  • यह परियोजना लगभग 8,155 हेक्टेयर कृषि भूमि में सिंचाई की सुविधा सुनिश्चित करेगी.

भारत और भूटान जल सम्बन्ध

  • दोनों देशों द्वारा Comprehensive Scheme for Establishment of Hydro-meteorological and Flood Forecasting Network on rivers common to India and Bhutan योजना को संचालित किया जा रहा है.
  • इस नेटवर्क के अंतर्गत भूटान में अवस्थित 32 Hydro-meteorological stations शामिल हैं तथा भारत से प्राप्त वित्तीय सहायता के माध्यम से भूटान की शाही सरकार द्वारा इनका रख-रखाव किया जा रहा है. इन स्टेशनों से प्राप्त आँकड़ों का भारत में बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने में किया जा सकता है.
  • भारत और भूटान के बीच बाढ़ प्रबंधन पर विशेषज्ञों का एक संयुक्त समूह (Joint Group of Experts : JGE) गठित किया गया है. इसका उद्देश्य भूटान के दक्षिणी तलहटी वाले क्षेत्रों और इससे सटे हुए भारत के मैदानी इलाकों में बाढ़ के बार-बार आने और उससे होने वाले अपरदन पर विचार-विमर्श एवं आकलन करना है.

भारत और पाकिस्तान जल सम्बन्ध

  • भारत और पाकिस्तान के मध्य पश्चिमी नदियों (सिन्धु, झेलम और चेनाब) पर जलबिजली परियोजनाओं के निर्माण से सम्बंधित कई विवाद आज की तिथि में विद्यमान हैं. इन नदियों के जल उपयोग सम्बन्धी अधिकार 1960 में सिन्धु जल संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद पकिस्तान को सौंप दिए गये थे. यह आर्टिकल जरुर पढ़ें >> सिन्धु जल संधि विवाद
  • यह संधि भारत को सीमापारीय प्रवाह को परिवर्तित करने से रोकती है. यह संधि पाकिस्तान को मध्यम आकार की रन-ऑफ-रिवर परियोजनाओं के सञ्चालन की अनुमति भी प्रदान करती है. इस प्रकार यह संधि पकिस्तान के लिए लाभप्रद रही है. परन्तु हाल ही में रणनीतिक कारणों से भारत इन नदियों पर जलबिजली परियोजनाएँ बनाने पर विचार कर रहा  है. इसके फलस्वरूप पाकिस्तान में जलीय राष्ट्रवाद की भावना उत्पन्न हुई है.
  • दोनों देशों के बीच बगलिहार बाँध विवाद को इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन तक ले जाया गया. इसके अतिरिक्त किशनगंगा, रातले परियोजना आदि दोनों देशों के बीच विवाद के अन्य प्रमुख मुद्दे हैं.

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