भारत और म्यांमार संबंध | India–Myanmar relations

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अंतर्राष्ट्रीय संबंध | मेन्स पेपर 2 : द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से जुड़े समझौते – भारत और म्यांमार

Mains-Pre View

UPSC के दृष्टिकोण से, निम्नलिखित बातें महत्वपूर्ण हैं:

प्रारंभिक स्तर: ज्यादा नहीं

मेन्स स्तर: पेपर 2- म्यांमार में संकट और इस पर भारत की प्रतिक्रिया के साथ मुद्दे

ब्लॉग : भारत म्यांमार संबंध : अवसर , चुनौतियां एवं समाधान by विवेक ओझा |  ध्येय IAS® - Best UPSC IAS CSE Online Coaching | Best UPSC Coaching | Top  IAS Coaching in Delhi | Top CSE Coaching

संदर्भ

म्यांमार में हुए तख़्तापलट ने म्यांमार के सैन्य शासन (जुंटा) की तानाशाही के विरुद्ध विरोध प्रदर्शनों को भड़काया और देशव्यापी बहिष्कार, विरोध एवं अवज्ञा आंदोलन शुरू हुए. 

म्यांमार में संकट

  • तख़्तापलट के बाद से लगभग 40,000 लोग म्यांमार की सीमा से पलायन करके पड़ोसी देशों- थाइलैंड और भारत में शरण ले चुके हैं.
  • संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के अनुसार, 2,000 से ज्यादा लोग मारे गए हैं, लगभग 14,000 लोग जेल में हैं, जिनमें 90 सांसद शामिल हैं, 7,00,000 से अधिक शरणार्थी हैं और 5 लाख लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हैं।
  • अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट है. राजनीतिक और आर्थिक अव्यवस्था के चलते 2022 की शुरुआत तक म्यांमार की लगभग-लगभग आधी आबादी (तक़रीबन ढाई करोड़ लोग) ग़रीबी की दलदल में फंस चुकी है.
  • कोविड-19 से जुड़ी दिक्कतों (से आवाजाही पर लगी रोक और आर्थिक सुस्ती) के साथ-साथ तख़्तापलट से जुड़ी चुनौतियों (मौजूदा विरोध-प्रदर्शनों और बढ़ती असुरक्षा), बैंकिंग से जुड़ी पाबंदियों, नक़दी के प्रवाह को लेकर रोकटोक और म्यांमार के सैन्य शासन (जुंटा) द्वारा जानबूझकर सहायता पर रोक लगाए जाने से मानवतावादी क़वायदों के रास्ते में रुकावटें खड़ी हो गई हैं.

आसियान की भूमिका 

  • आसियान जैसे क्षेत्रीय संगठन ने पांच-सूत्री सहमति के दायरे में मानवीय सहायता से जुड़े बिंदु पर अमल करने की कोशिश की है. हालांकि इस क़वायद को लेकर उसे आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है.
  • दरअसल आसियान के अध्यक्ष कंबोडिया ने सहायता बांटने के लिए म्यांमार के फ़ौजी जनरल की स्वीकृति और सहायता मांग ली थी. 6 मई को आसियान अध्यक्ष के साथ-साथ आसियान कोआर्डिनेटिंग सेंटर फ़ॉर ह्यूमेनिटेरियन असिस्टेंस ऑन डिज़ास्टर मैनेजमेंट सेंटर (AHA) ने म्यांमार टास्क फ़ोर्स से भेंट की थी. इस टास्क फ़ोर्स में म्यांमार रेड क्रॉस सोसाइटी जैसे मानवतावादी सहायता संगठन सम्मिलित हैं. ये संगठन फ़ौजी दिशा-निर्देशों के अनुसार कार्य करते हैं.

भारत और म्यांमार

  • भारत और म्यांमार के संबंधों की आधिकारिक शुरुआत वर्ष 1951 की मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किये जाने के पश्चात् हुई, जिसके बाद वर्ष 1987 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की म्यांमार यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच अधिक सार्थक संबंधों की नींव रखी गई।  
  • बहु-आयामी संबंध: भारत और म्याँमार बंगाल की खाड़ी में एक लंबी भौगोलिक और समुद्री सीमा साझा करने के अतिरिक्त सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, जातीय तथा धार्मिक संबंधों के साथ पारंपरिक रूप से बहुत-सी समानताएँ रखते हैं।
  • म्यांमार की भू-सामरिक अवस्थिति: भारत के लिये म्यांमार भौगोलिक रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के भूगोल के केंद्र में अवस्थित है। म्यांमार एकमात्र दक्षिण-पूर्व एशियाई देश है जो पूर्वोत्तर भारत के साथ थल सीमा साझा करता है, यह सीमा लगभग 1,624 किलोमीटर तक फैली है.दोनों देश बंगाल की खाड़ी में 725 किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा भी साझा करते हैं।

आसियान (ASEAN): म्यांमार एकमात्र एक ऐसा आसियान देश है जो भारत के साथ स्थल सीमा साझा करता है।

बिम्सटेक (BIMSTEC): म्यांमार दिसम्बर 1997 में बिम्सटेक का सदस्य बना तथा वह बिम्सटेक फ्री ट्रेड अग्रीमेंट का हस्ताक्षरकर्ता है।

मेकांग गंगा सहयोग: म्यांमार नवम्बर 2000 में इसकी स्थापना से ही मेकांग गंगा सहयोग (एमजीसी) का सदस्य है।

सार्क (SAARC): म्यांमार को अगस्त 2008 में सार्क पर्यवेक्षक का दर्जा दिया गया था।

भारत की प्रतिक्रिया

आज जब म्यांमार का संकट बढ़ता ही जा रहा है, तो भारत इस मुद्दे पर बड़ी दुविधा में फंसा हुआ है. म्यांमार के साथ भारत का जटिल इतिहास और उसका रुख़, भारत को इस बात की अनुमति नहीं देते हैं कि वो पश्चिमी देशों की तरह तख़्तापलट को लेकर अपने सख़्त रवैये का खुला इज़हार करे. इस बात को हम इस तरह से समझने का प्रयास कर सकते हैं कि अपने पूर्वोत्तर क्षेत्रों में अराकान सेना जैसे संगठनों के विद्रोह और उपद्रव को दबाने के लिए, बर्मा के सैन्य बलों के साथ भारत के निकट सुरक्षा संबंध रहे हैं. पूर्वोत्तर की जटिल जातीय बनावट और सीमा के आर-पार के आतंकवाद से निपटने के लिए भारत और म्यांमार के बीच अनिवार्य मित्रता कायम कर दी है. इस साझेदारी के विकास के दौरान भारत ने अपने पड़ोसियों को सैन्य हथियार भी बेचे हैं; जो हथियार बेचे गए हैं, उनमें डीज़ल से चलने वाली पनडुब्बियों से लेकर सोनार उपकरण तक सम्मिलित हैं. आज म्यांमार के साथ अपने इन्हीं सुरक्षा हितों के कारण भारत, म्यांमार पर प्रतिबंध लगाने और पश्चिमी देशों से  तख़्तापलट के विरुद्ध आए तल्ख़ बयानों में सुर मिलाने से परहेज़ करता है. 

म्यांमार को लेकर भारत  का कूटनीति इतिहास रहा है. वर्ष 1988 में म्यांमार की सेना द्वारा अपने नागरिकों पर  की गई हिंसक कार्रवाई की भारत ने गंभीर आलोचना की थी. हालांकि, इस दौरान भारत को इसका गंभीर खामियाज़ा भी भुगतना पड़ा था क्योंकि म्यांमार के सुरक्षा बलों ने भारत के साथ संबंधों को दीर्घकाल तक ठंडे बस्ते में डाल दिया था. निश्चित रूप से वर्ष 2021 में म्यांमार, जनता के मध्य बहुत ही लोकप्रिय एक लोकतांत्रिक आंदोलन की ओर बढ़ रहा था. म्यांमार की सेना अपने नागरिकों के बीच बिल्कुल भी  पसंद नहीं की जाती है और विदेश में भी ये बहुत ही अलोकप्रिय है. इसका बड़ा कारण यही है कि तातमाडॉ, म्यांमार की सत्ता पर अपने तानाशाही शिकंजे को छोड़ने को तैयार नहीं है.

भारत की नीति ख़ामोशी से अपने हितों का बचाव करने की होनी चाहिए, न कि खुलेआम कूटनीतिक क़दम उठाने की. पश्चिमी देश, म्यांमार पर लगातर प्रतिबंध और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच आम राय बनाकर वहां के सैन्य बलों पर दबाव बना सकते हैं.

वहीं इस बात से भारत के विदेश मंत्रालय के नीति-निर्माता भी इस बात से परेशान हैं कि म्यांमार में भारत की आर्थिक गतिविधियां तो बढ़ रही हैं, पर वहां चीन भी एक बड़ी ताक़त के रूप में विद्यमान है. वैसे देखा जाए तो म्यांमार के साथ भारत का द्विपक्षीय कारोबार मात्र 1.5 अरब डॉलर का है. परन्तु, पिछले गत दशक के दौरान इसमें तीव्रता से बढ़ोतरी होती दिख रही है. भारत, म्यांमार में कनेक्टिविटी की कई परियोजनाओं में भी सहायता कर रहा है. जैसे कि भारत-म्यांमार-थाईलैंड हाइवे और कलादन मल्टी- मॉडल परिवहन परियोजना. भारत, एशिया में चीन के व्यापक प्रभाव क्षेत्र में घुसपैठ और चीन के प्रभाव का मुक़ाबला करने के लिए पूरे दम से प्रयास कर रहा है. वैसे, चीन और म्यांमार के आर्थिक गलियारे की तुलना में भारत द्वारा किए गए आर्थिक निवेश मामूली ही हैं. म्यांमार में चीन के निवेश और चीन के साथ व्यापार पर उसकी निर्भरता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं.

कलादन मल्टी- मॉडल परिवहन परियोजना

  • वर्तमान में उत्तर पूर्वी भारत से चिकन नेक के रास्ते कोलकाता बंदरगाह जाने वाले मार्ग को भारी यातायात का सामना करना पड़ता है। इस मार्ग से जाने वाले माल को बंदरगाह पहुचने में कई दिन लग जाते हैं।
  • यह परियोजना मिज़ोरम से कोलकाता के बीच की दूरी को लगभग 1000 कि.मी. कम कर देगी और माल के परिवहन के समय को कम कर के 3-4 दिन कर देगी।
  • उत्तर पूर्वी क्षेत्र के विकास के अलावा, यह मार्ग चीन से किसी संघर्ष की स्थिति में भी आवश्यक है क्‍योंकि वर्तमान मार्ग (चिकन नेक) संघर्ष की स्थिति में चीन द्वारा अवरुद्ध किया जा सकता है।
  • इस परियोजना से उत्तर पूर्वी राज्यों को समुद्र तक मिलने वाली पहुँच उनकी अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ावा देने में सहायक हो गी।
  • इस परियोजना से भारत के दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार और परिवहन संपर्क और मज़बूत होंगे।
  • यह परियोजना न केवल भारत के आर्थिक, वाणिज्यिक और सामरिक हित में कार्य करेगी,बल्कि म्यांमार के विकास और भारत के साथ आर्थिक एकीकरण में भी सहयोग प्रदान करेगी।
  • यह “एक्ट-ईस्ट पॉलिसी” के लिए भी सहायक होगी।

भारत के समक्ष बड़ी दुविधा

ऐसे परिस्थिति में भारत के समक्ष म्यामांर को लेकर विकल्पों का चुनाव करना सरल नहीं है. म्यांमार से भारत की निकटता और वहां से जुड़े उसके हित, भारत को इस बात की अनुमति नहीं देते हैं कि वो क़ुदरती तौर पर वहां के लोकतंत्र समर्थकों के साथ सहानुभूति रखे. म्यांमार के वर्तमान संघर्ष का जो भी नतीजा निकले, ये बात तो साफ़ है कि आने वाले लंबे समय तक तातमाडॉ, वहां की राजनीति में एक ताक़तवर पक्ष बनी रहेगी. इसमें बात में कोई दो राय नहीं है कि यह भारत के लिए नैतिकता से भरी दुविधा है. परन्तु, भारत के लिए अपने पुराने सुरक्षा साझीदारों के साथ रिश्तों को सहेज कर रखना बहुत आवश्यक है. संयुक्त राष्ट्र महासभा में म्यांमार के तख़्तापलट की आलोचना वाले प्रस्ताव पर मतदान से भारत की अनुपस्थिति, उसके इसी कूटनीतिक गुणा-भाग को बख़ूबी दर्शाती है. हालांकि, म्यांमार की सेना के साथ खुलकर खड़े होने से भारत के लिए इस बात का ख़तरा भी है कि वहां की जनता उससे दु:खी हो जाए. परन्तु, भारत की नीति ख़ामोशी से अपने हितों का बचाव करने की होनी चाहिए, न कि खुलेआम कूटनीतिक क़दम उठाने की. पश्चिमी देश, म्यांमार पर निरंतर प्रतिबंध और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच आम राय बनाकर वहां के सैन्य बलों पर दबाव बना सकते हैं. वहीं, भारत को आसियान और जापान की तरह राजनीतिक समाधान की मांग पर बल देना चाहिए. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता  द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दुबारा प्रारम्भ करने के समर्थन में दिए गए हालिया बयान, निश्चित रूप से सही दिशा में उठाए गए क़दम कहे जा सकते हैं.

इस संघर्ष में भारत की मेल-मिलाप कराने वाली भूमिका, चीन पर म्यांमार की भारी निर्भरता को लेकर चिंता को भी दूर करने वाली हो सकती है. सच तो ये है कि म्यांमार में राजनीतिक उदारीकरण के पीछे एक बड़ा कारण चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर शक और अन्य अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों को म्यांमार लाना भी था. इस प्रकार भारत का निरपेक्ष रहना, उसके आर्थिक निवेश और सुरक्षा संबंधी सहयोग ऐसे फ़ायदे हैं, जिनकी अनदेखी करने का जोखिम म्यांमार की सेना भी नहीं ले सकती है.

लंबे समय में भारत के हित इसी बात में निहित हैं कि वो समान विचारधारा वाले अन्य देशों के साथ सहयोग करके तातमाडॉ के संस्थागत बर्ताव को बदलने का प्रयास करे.

लंबी अवधि में भारत के हित इसी बात में निहित हैं कि वो समान विचारधारा वाले अन्य देशों के साथ सहयोग करके तातमाडॉ के संस्थागत बर्ताव को बदलने की कोशिश करे. इस समय म्यांमार की सेना में ज़्यादातर वो अधिकारी हैं, जिन्होंने रूस जैसे अन्य तानाशाही देशों में पढ़ाई की है. म्यांमार के सैन्य अधिकारियों को अंग्रेज़ी में प्रशिक्षित करने और पश्चिमी देशों के साथ अधिकारियों के तबादले की शुरुआत तो हुई थी. परन्तु, रोहिंग्या संकट के पश्चात् पश्चिमी देशों के साथ म्यांमार का ये सैन्य तालमेल एक झटके से बंद हो गया. अंत में सेना के कुलीन वर्ग को प्रशिक्षित करके और उसे उन अन्य राजनीतिक मॉडलों के फ़ायदे बताकर ही म्यांमार की सेना के रवैये में बदलाव लाया जा सकता है. तातमाडॉ  के सैन्य अधिकारियों को ऐसे देशों की मिसालें देनी होंगी, जहां पर सेना की सम्मानजनक लेकिन ग़ैर राजनीतिक भूमिका है. इसी से तातमाडॉ के अधिकारियों के बर्ताव में दूरगामी परिवर्तन लाया जा सकता है.

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