[Sansar Editorial] भारत और चीन के बीच कूटनीतिक सम्बन्ध

Sansar LochanIndia and non-SAARC countries, International Affairs, Sansar Editorial 2019Leave a Comment

भारत और चीन ने आपसी हित के मुद्दों पर बातचीत की प्रक्रिया चालू रखी है. निरंतर बातचीत के बाद भी बड़ी समस्याओं का समाधान भले ही न हो पाया हो, परन्तु आर्थिक सम्बन्ध अब भी सुदृढ़ है और क्षेत्रीय मंचो पर सहयोग यथावत् है. इस समय सबसे विवादास्पद भारत-प्रशांत क्षेत्र में भारत के समुद्री हित हैं, जहाँ भारत और चीन दोनों के अतिव्यापी हित हैं. भारत द्वारा क्वाड, मालाबार अभ्यास में सम्मिलित होने, वियतनाम तट में समुद्री संसाधनों की खोज आदि को लेकर चीन समझता है कि सामरिक रूप से अमेरिका भारत सहित अन्य बड़ी शक्तियों के साथ मिलकर उसे न केवल चीन सागर में रोक रहा है, बल्कि उसकी आर्थिक और सैन्य वृद्धि पर भी लगाम लगाने का प्रयास कर रहा है. इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि यदि भारत दक्षिण पूर्व और प्रशांत की ओर बढ़ रहा है तो चीन दक्षिण एशिया में पैठ बना रहा है. भारत का कहना है कि चीन इसके दक्षिण एशियाई देशों को सहयोग कर उसकी घेराबंदी कर रहा है. पाकिस्तान के साथ इसका कई दशकों से एक चिरस्थायी सम्बन्ध है और अन्य देशों तक यह सॉफ्ट और स्मार्ट संसाधनों द्वारा पहुँच बना रहा है.

उदार वैश्वीकृत विश्व व्यवस्था से लाभान्वित होने के पश्चात् चीन मुक्त व्यापार में मुखिया बनने की कोशिश रहा है. इसने भारत के पड़ोस में लगभग सभी देशों में अपने आर्थिक और सैन्य हितों को सफलतापूर्वक वृद्धि की है. इसने पाकिस्तान और भारत के मध्य शत्रुता को पाकिस्तान के भरोसेमंद मित्र के रूप में उभरने के लिए प्रयोग किया है. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और बेल्ट रोड इनिशिएटिव (BRI) चीन का पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को दृढ़ बनाने का न केवल एक अन्य प्रयास है, बल्कि मध्य एशिया और खाड़ी में प्रवेश करने का भी अवसर उसे मिल जाएगा. भारत को तनाव में रखने हेतु यह तिब्बत और दलाई लामा मुद्दों को उठाता है. दरअसल, डोकलाम समस्या भूटान को भारत की सुरक्षा छ्तरी से बाहर निकालने के लिए खड़ी की गई थी. अतीत में इसने बांग्लादेश की स्वतंत्रता और संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता पर कड़ी आपत्ति जताई थी. दूसरी ओर इसने बांग्लादेश के साथ आर्थिक संबंधों में वृद्धि करने के लिए और बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए सहायता प्रदान करने में कोई कोताही और कंजूसी नहीं की. म्यांमार भी इसके प्रभाव क्षेत्र में आने के लिए व्याकुल हो गया है.

ऋण भुगतान के मसले के कारण श्रीलंका के साथ इसके संबंधों में खटास तो जरुर आई है, परन्तु यह गोला-बारूद की बिक्री और इसके सैन्यकर्मियों के प्रशिक्षण में सक्रिय रूप से संलग्न होकर श्रीलंकाई सेना के आधुनिकीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है. इसने दक्षिण चीन सागर विवाद में बाहरी शक्तियों को सम्मिलित करने का विरोध किया है और हिन्द महासागर में अपनी उपस्थिति का विस्तार करते हुए भारत को चुनौती भी दे डाली है. चीन ने नेपाल को अपने 7 बंदरगाहों का उपयोग करने की अनुमति दी है. एक लैंडलॉक देश होने के कारण नेपाल वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए भारतीय बंदरगाहों का उपयोग करने के लिए विवश था. परन्तु कई वर्षों से नेपाल भारत पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए प्रयासरत था. चीन के प्रस्ताव ने नेपाल को व्यापार के लिए वैकल्पिक रास्ता तैयार करने में सहयोग किया है. चीन ने लगभग सभी दक्षिण एशियाई देशों को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने के लिए पुरजोर कोशिश किया है.

 व्यापार युद्ध में चीन स्वयं को अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानता है, जो इसके विश्व शक्ति के रूप में उभरने का संकेत देता है. दक्षिण एशियाई क्षेत्र में भारत के प्रभुत्व को करने के लिए यह एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में कूटनीति का सहारा लेता रहा है. डोकलाम गतिरोध काफी लम्बा चला, जिसका भारत ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सामना किया.

इसका प्रारम्भ तब हुआ जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के एक निर्माण दल 16 जून, 2017 को भूटान के डोकलाम क्षेत्र में घुसा और चीन, भारत और भूटान के बीच वर्तमान समझौते का उल्लंघन करते हुए यथास्थिति बदलने के लिए एक सड़क के निर्माण का प्रयास किया. जब निर्माण नहीं रुका तो भारत चीन के मध्य तू-तू मैं-मैं की स्थिति उत्पन्न हो गई. इसके पश्चात् जी- 20 शिखर सम्मेलन के अवसर पर हैम्बर्ग में भारतीय प्रधानमन्त्री और चीनी राष्ट्रपति के बीच वार्ता सम्पन्न हुई. राजनयिक स्तर पर भी कई वार्ताएं सम्पन्न हुईं. विचार-विमर्श के 13 दौर के बाद जा कर गतिरोध समाप्त हो गया.

दोनों देशों में व्यापक मतभेदों की पृष्ठभूमि के बीच वुहान शिखर सम्मेलन ने दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार की नई उम्मीद पैदा की. एक अनौपचारिक शिखर सम्मेलन होने के नाते इसमें कुछ निर्णायक परिणाम नहीं निकला, परन्तु भविष्य में सहयोग के प्रयासों का संकेत अवश्य दिया गया है. दोनों देश घरेलू के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में भी कठिन दौर से गुजर रहे हैं. भारत में आम चुनाव ऐसे समय में हो रहा है जब अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू आर्थिक स्थिति सबसे चुनौतीपूर्ण है. इसी प्रकार चीन का आर्थिक प्रदर्शन अमेरिकी संरक्षणवादी नीति से प्रभावित है. इसलिए, यह अपने पड़ोसियों विशेषतः जापान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम के साथ मित्रवत व्यवहार करने का प्रयास कर रहा है. वुहान में बातचीत को इस प्रक्रिया को जारी रखने के रूप में माना जा सकता है.

चीन का वर्तमान नेतृत्व घरेलू स्तर पर वादा किये गये बाजार सुधारों को पूरा नहीं करने के लिए समस्याओं का सामना कर रहा है. इसकी आर्थिक वृद्धि में कमी आती जा रही है, क्योंकि यह अपने व्यापार प्रवाह, विनिमय दरों और पूंजी प्रवाह को एक साथ नियंत्रित करने में अपेक्षित रूप से असक्षम साबित हो रहा है. अपनी अर्थव्यवस्था को चुस्त नियंत्रण के माध्यम से बनाये रखने की यह क्षमता, बिना बाहरी प्रयासों के धीरे-धीरे सामने आती है. यूरोपीय देश इसकी बेल्ट रोड पहल से आशंकित हैं. इसलिए, पड़ोस से मेल मिलाप करने में इसकी विशेष रूचि है. परन्तु इतना सब होने के बावजूद विश्व शक्ति के रूप में उभरने की उसकी महत्त्वाकांक्षा में कोई कमी नहीं आई है. जापानी प्रधानमन्त्री शिंजो आबे और प्रधानमन्त्री मोदी तक जिनपिंग की आउटरीच पुराने अमेरिकी नेतृत्व वाले क्रम की जगह चीन केन्द्रित क्रम निर्माण के एक प्रयास के रूप में देखा जा सकता है.

हाल ही में दोनों देशों के बीच वार्ता के बाद डोकलाम समस्या तो ख़त्म हो गई, परन्तु चीन काफी लम्बे तिब्बत-भारत सीमा पर भारत के लिए तनाव पैदा करने के प्रयासों को बंद नहीं करेगा. तिब्बत में नागरी को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है. चीन को हाईवे 209 जो अक्साई चिन रोड है, पूरा होने के बाद पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. हिमालयन रेंज, यारलुंग त्सांगपो, सिन्धु और गंगा का स्रोत.

माउंट कैलाश और मानसरोवर झील को “दस हजार पहाड़ों के पूर्वज और सौ नदियों के स्रोत” के रूप में प्रचारित कर रहा है. यह अरुणाचल प्रदेश के उत्तर में स्थित न्यिंगची और लाहोका का भी विकास कर रहा है. गत कुछ वर्षों में बीजिंग ने अरुणाचल प्रदेश के उत्तर में न्यिंगची और लोहाका के दक्षिणपूर्वी इलाकों के विकास पर ध्यान केन्द्रित किया है.

भारतीय सीमा के तिब्बती हिस्से में नए मॉडल गाँवों को बनाया जा रहा है. निर्माण में एक रक्षा उद्देश्य भी है, क्योंकि चीन ने स्थानीय लोगों की भागीदारी के साथ एक रक्षा परिप्रेक्ष्य जोड़ा है. उत्खनन के आधार पर चीनी विद्वानों का मानना है कि बौद्ध धर्म के तिब्बत में प्रवेश से पहले तिब्बत में शंगशंग संस्कृति थी. हिमालय के भारतीय भाग में भी एक समान संस्कृति थी, परन्तु अब सीमा सील है. सीमा और सम्बद्ध मुद्दों पर अंतहीन वार्तालाप के मद्देनजर संवादों को दोनों देशों के मध्य की समस्याओं के अंतिम समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए.

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