गिग अर्थव्यवस्था | Gig Economy in Hindi

Sansar LochanSector of EconomyLeave a Comment

हाल ही में नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज (NASSCOM) ने गिग कर्मियों पर एक रिपोर्ट निर्गत की है। आज हम इस आर्टिकल के द्वारा जानेंगे कि गिग अर्थव्यवस्था (Gig Economy) क्या होती है और गिग वर्कर कौन कहलाते हैं? 

प्रीलिम्स के लिए: गिग इकोनॉमी, डिफरेंट कॉलर जॉब्स, कोड ऑन वेज, कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी

मुख्य परीक्षा के लिए: गिग इकॉनमी और इस क्षेत्र से जुड़े मुद्दे, महिलाओं के लिए गिग वर्क के पक्ष और विपक्ष, भारत के गिग सेक्टर की क्षमता और उठाए जाने वाले कदम.

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु

वर्ष 2022 सर्वेक्षण में शामिल संगठनों में से लगभग दो तिहाई संगठनों ने गिग कर्मियों को नियुक्त किया है।

गिग कर्मियों के नियोजन के शीर्ष तीन सेंगमेंट हैं- सॉफ्टवेयर डेवलपिंग, UI/UX डिजाईन एवं डेटा विश्लेषण। 2000 से पूर्णकालिक कर्मचारियों वाले संगठनों में गिग कर्मियों की संख्या कुल कर्मचारियों की संख्या के 5% से भी कम है।

गिग अर्थव्यवस्था के बारे में / Gig Economy

ज्ञातव्य है कि गिग इकॉनोमी वह श्रम बाजार व्यवस्था होती है, जिसमें अल्पकालिक नौकरियाँ, अनुबंधित या फ्रीलांस काम होते हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट में गिग कर्मचारियों को दो वर्गों में वर्गीकृत किया गया है-

  1. प्लेटफॉर्म वर्कर एवं
  2. नॉन-प्लेटफ़ॉर्म वर्कर.

प्लेटफॉर्म वर्कर वे होते हैं जो सॉफ्टवेयर एवं डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर आधारित कार्य करते हैं, जबकि नॉन प्लेटफॉर्म वर्कर्स परम्परागत क्षेत्रों में मजदूरी लेकर पार्ट टाइम या फुल टाइम कार्य करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार 47% गिग कार्य मध्यम कौशल वाले कार्यों में, 22% उच्च कौशल वाले जबकि 31% निम्न कौशल वाले कार्यों में होता है।

गिग इकॉनोमी के लाभ और खामियाँ

लाभ

  1. लचीलापन
  2. वर्क-लाइफ बैलेंस
  3. अच्छा पारिश्रमिक

खामियाँ

  1. अनियमितता
  2. माँग-आपूर्ति असंतुलन
  3. सामाजिक सुरक्षा लाभ की गारंटी नहीं

नीति आयोग ने देश की गिग कार्यबल के लिए सवैतनिक अवकाश, दुर्घटना बीमा, पेंशन योजनाओं जैसे सामाजिक सुरक्षा उपाय करने की संस्तुति की है। नीति आयोग के अनुसार वर्ष 2029-30 तक देश का गिग कार्यबल 2.35 करोड़ होने की संभावना है, जो 2020-21 में 77 लाख था। नीति आयोग ने सरकार से स्टार्ट अप इंडिया कार्यक्रम की तर्ज पर ‘प्लेटफ़ॉर्म इंडिया पहल’ लांच करने की सिफारिश भी है।

विभिन्न कॉलर जॉब्स क्या हैं?

  • ब्लू-कॉलर वर्कर: यह वर्किंग क्लास का एक सदस्य है, जो शारीरिक श्रम करता है और प्रति घंटे की मजदूरी कमाता है।
  • व्हाइट-कॉलर वर्कर: यह एक वेतनभोगी पेशेवर है, जो आम तौर पर सामान्य कार्यालय कर्मचारियों और प्रबंधन को संदर्भित करता है।
  • गोल्ड-कॉलर वर्कर: इसका उपयोग अत्यधिक कुशल लोगों को संदर्भित करने के लिए किया जाता है जो कंपनी के लिए अत्यधिक मूल्यवान हैं। उदाहरण: वकील, डॉक्टर, शोध वैज्ञानिक आदि।
  • ग्रे-कॉलर वर्कर: यह सफेद या नीले कॉलर के रूप में वर्गीकृत नहीं किए गए नियोजित लोगों के संतुलन को संदर्भित करता है. हालांकि ग्रे-कॉलर उन लोगों का वर्णन करने के लिए उपयोग किया जाता है जो सेवानिवृत्ति की आयु से परे काम करते हैं। उदाहरण: अग्निशामक, पुलिस अधिकारी, स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर, सुरक्षा गार्ड इत्यादि।
  • ग्रीन-कॉलर वर्कर: यह एक ऐसा कार्यकर्ता है जो अर्थव्यवस्था के पर्यावरणीय क्षेत्रों में कार्यरत है. उदाहरण: सौर पैनल, ग्रीनपीस, प्रकृति के लिए वर्ल्ड वाइड फंड आदि जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों में काम करने वाले लोग।
  • पिंक-कॉलर वर्कर: यह ऐसे काम में लगाया जाता है जिसे परंपरागत रूप से महिलाओं का काम माना जाता है और अक्सर कम वेतन मिलता है।
  • स्कार्लेट-कॉलर वर्कर: यह एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल अक्सर पोर्नोग्राफ़ी उद्योग में काम करने वाले लोगों, विशेष रूप से इंटरनेट पोर्नोग्राफ़ी के क्षेत्र में महिला उद्यमियों के लिए किया जाता है।
  • लाल कॉलर कार्यकर्ता: सभी प्रकार के सरकारी कर्मचारी।
  • ओपन-कॉलर वर्कर: यह एक ऐसा वर्कर है जो घर से काम करता है, खासकर इंटरनेट के जरिए।

गिग अर्थव्यवस्था के लिए लेबर कोड क्या है?

मौजूदा विधान:

कोड ऑन वेज, 2019 , गिग वर्कर सहित उन सभी रोजगारों में वेतन और बोनस भुगतान को विनियमित करता है जिनमें कोई व्यापार, उद्योग, कारोबार या मैन्यूफैक्चरिंग की जाती है। 

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 , गिग वर्कर को एक नई व्यावसायिक श्रेणी के रूप में मान्यता देती है। यह एक गिग वर्कर को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है जो काम करता है या काम की व्यवस्था में भाग लेता है और पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के बाहर ऐसी गतिविधियों से कमाता है।

Read here all – Economics Notes in Hindi for UPSC

 

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