[Sansar Editorial] रुपये में गिरावट (Falling Rupee) के कारण, प्रभाव और उठाये जाने योग्य कदम

Sansar LochanEconomics Notes, Sansar Editorial 2018, Sector of EconomyLeave a Comment

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हाल ही में भारतीय रुपये के मूल्य में गिरावट आई और यह पहली बार 71 रु./डॉलर के स्तर से भी नीचे चला गया. इस पोस्ट के जरिये हम रुपये के मूल्य में इस गिरावट के कारण को जानने की कोशिश करेंगे और इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, यह भी जानेंगे. साथ-साथ यह भी चर्चा करेंगे कि सरकार द्वारा कौन-से दीर्घकालिक और अल्पकालिक कदम उठाये जाने चाहिएँ जिससे गिरते हुए रुपये के मूल्य से बचा जा सके.

falling rupee the hindu

The Hindu – Editorial

सम्बंधित तथ्य

  • वर्ष के आरम्भ से ही डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में 10% की गिरावट आई है जिसके फलस्वरूप रूपया एशिया में डॉलर के मुकाबले सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गयी है.
  • अन्य उभरते बाजारों की मुद्राएँ विशेष रूप से तुर्की की लीरा, अर्जेंटीना की पेसो और दक्षिण अफ्रीकी रैंड के ऊपर निवेशकों के कम होते विश्वास के कारण अत्यधिक घाटे का सामना कर रहे हैं.

रुपये में गिरावट के कारण

विश्व में डॉलर की बढ़ती माँग

US फेडेरल रिज़र्व द्वारा बढ़ाई गई ब्याज दरों के कारण इस वर्ष फरवरी से डॉलर की कीमत में उछाल आया है. हाल ही में उभरते बाजारों में अपना पैसा लगाने वाले निवेशकों ने अमेरिकी परिसम्पत्तियों को प्राथमिकता दी जो अब उन्हें अत्यधिक आर्थिक लाभ प्रदान कर रही हैं.

ट्रेड वार (Trade War)

अमेरिका और चीन एक दूसरे से प्रतिशोधात्मक कार्रवाई करते हुए आयात शुल्क बढ़ा रहे हैं जिस कारण रुपये और अन्य देशों की मुद्राओं की शक्ति घट रही है.

पिछले कुछ सत्रों से चीन की युआन मुद्रा की शक्ति में अतिशय गिरावट आई है. अमेरिका चीन पर हमेशा ऐसा आरोप लगाता आया है कि चीन पहले से ही अपनी मुद्रा के मूल्य को घटा कर दिखाता आया है जिससे वह अपने सामान को दूसरे देशों में सस्ते दर में बेच सके. अब अमेरिका के द्वारा आयात शुल्क बढ़ा दिए जाने से चीन अपने माल को और भी सस्ता कर देश के अन्य देशों में भी डंप करेगा. इससे भारत की निर्यात शक्ति को भी धक्का लगेगा और भारत को व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा का सामना करना पड़ेगा जिससे रुपये के मूल्य में ह्रास होता है.

तेल की कीमतें

OPEC देशों द्वारा उत्पादन में वृद्धि के बावजूद ईरान पर लगे प्रतिबंधों ने तेल की कीमतों को कम होने नहीं दिया. ब्रेंट क्रूड (brent crude) ने 75 डॉलर प्रति बैरेल के स्तर को भी पार कर लिया है. यह भारत के लिए प्रतिकूल स्थिति है क्योंकि भारत तेल का तीसरा बड़ा आयातक देश है और यही कारण है कि चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) लगातार दबाव की स्थिति में है.

निर्यात से अधिक आयात

भारत निर्यात से अधिक आयात करता है इसलिए इसका चालू खाता घाटा बढ़ रहा है. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) 2.5%-3% के निचले स्तर तक पहुँच सकता है. तनावपूर्ण वित्तीय परिस्थतियों में बढ़ता चालू व्यापार घाटा रुपये पर दबाव निरंतर बढ़ा रहा है.

रूपये में गिरावट के प्रभाव

आयात पर

देश का आयात और अधिक महँगा होता जा रहा है क्योंकि आयात की समान मात्रा की खरीद के लिए भी पहले की अपेक्षा अधिक रुपयों का भुगतान करना पड़ता है.

मुद्रास्फीति पर

अत्यधिक महँगे आयात के कारण मुद्रास्फीति में और भी वृद्धि होने की सम्भावना है. यह तेल आयात (oil import) को भी प्रभावित करता है जो मुद्रास्फीति को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. मुद्रास्फीति में वृद्धि निवेशकों को भी हतोत्साहित करेगी.

GDP के विकास दर पर

महँगे आयात के चलते निर्मित वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होगी जिसका सकल घरेलू उत्पाद में सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. दूसरी ओर अधिक कीमतों के कारण माँग में कमी इसे प्रभावहीन बना सकती है.

घाटे का विस्तार

विश्लेषकों के अनुसार तेल की कीमतों में प्रति बैरेल 10 डॉलर की वृद्धि चालू खाते तथा राजकोषीय संतुलन को 0.4% और सकल घरेलू उत्पाद को 0.1% तक विकृत कर सकती है.

पर्यटन पर

विदेश यात्राएँ और अधिक महंगी हो जायेंगी. वहीं इसके दूसरे पहलू के अंतर्गत घरेलू पर्यटन अधिक बढ़ सकता है. इसके परिणामस्वरूप पर्यटक भारत आना अधिक पसंद करेंगे क्योंकि उनकी मुद्रा की क्रय क्षमता और बढ़ जायेगी.

रोजगार पर

माध्यम अवधि में, निर्यातोन्मुख उद्योग जैसे – फार्मास्यूटिकल क्षेत्र, IT क्षेत्र, रत्न एवं आभूषण क्षेत्र इत्यादि अधिक रोजगार का सृजन कर सकते हैं.

सरकार द्वारा उठाये जाने योग्य कदम

दीर्घकालिक उपाय

  • अन्य आयात के साथ ही तेल आयात पर निर्भरता कम करना. कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमत लगातार बढ़ रही है, जिससे भारत सरकार का भी खर्च बढ़ जाता है. यदि केंद्र सरकार को इस खर्च को कम करना है तो इसके लिए पेट्रोलियम क्षेत्र में सुधार लाने और पेट्रोलियम का कोई विकल्प ढूँढने की अत्यंत जरूरत है.
  • निर्यात उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए कई उपायों को अपनाना जैसे कि यह सुनश्चित करना कि करदाताओं की टैक्स रिफंड तक आसानी से पहुँच हो, सीमा पर लाल फीताशाही को समाप्त करने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य करना, नए बाजार खोलने के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता जिससे व्यापार सौदों में वृद्धि हो सके.
  • प्रक्रियाओं, कानूनों और विवाद निवारण को और सरल बनाकार FII के बजाय FDI को आकर्षित करना. भारतीय संस्थाओं द्वारा अधिक अंतर्वाह सुनश्चित करने के लिए विदेशों से लिए जाने वाले उधार सम्बन्धी नियमों को और उदारीकृत किया जाना चाहिए.
  • यद्यपि विगत कुछ वर्षों में भारत की वित्तीय स्थिति में अन्य समकक्ष देशों की तुलना से सुधार हुआ है तथापि जुड़वां घाटा (twin deficit – राजकोषीय घाटा और चालू खाता घाटा दोनों विद्यमान) अभी भी उच्च स्तर पर ही बना हुआ है. सरकार को इस स्थिति में घाटे को और बढ़ने नहीं देना चाहिए क्योंकि इसके फलस्वरूप व्यापक स्तर पर आर्थिक अस्थिरता और जोखिम में वृद्धि होगी.

अल्पकालिक उपाय

  • धन के बहिर्वाह (बाहर जाने) को नियंत्रित करने के लिए केन्द्रीय बैंक द्वारा व्याज दरों में वृद्धि.
  • अस्थिरता को कम करने के लिए विदेशी मुद्रा भण्डार का उपयोग : 22 जून तक RBI के पास 407.81 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था जिसे वह खुले बाजार में बेच सकता है.

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