चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन क्यों और कैसे होता है?

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आज हम इस पोस्ट के जरिये यह जानेंगे कि चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन (Delimitation of Constituencies) क्यों और कैसे होता है?

जम्मू और कश्मीर राज्य के विभाजन और जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख को संघीय क्षेत्र बनाए जाने के लगभग छह महीने पूरे होने पर जम्मू-कश्मीर के विधान सभा क्षेत्रों के परिसीमन की कार्रवाई चालू कर दी है.

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को संघीय क्षेत्र बनाने तथा लद्दाख एक संघीय क्षेत्र का स्वरूप देने के कारण चुनाव क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन करना अनिवार्य हो गया है. 

पृष्ठभूमि

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को संघीय क्षेत्र बनाने तथा लद्दाख को एक संघीय क्षेत्र का स्वरूप देने के कारण चुनाव क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन करना अनिवार्य हो गया है.

स्मरण रहे कि 2014 में जब आंध्र प्रदेश से काटकर तेलंगाना बनाया गया था तो उस समय भी विधान सभा क्षेत्रों के परिसीमन की आवश्यकता उत्पन्न हुई थी.

परिसीमन क्या है?

परिसीमन का शाब्दिक अर्थ विधान सभा से युक्त किसी राज्य के अन्दर चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निधारण होता है.

जम्मू-कश्मीर में परिसीमन किस प्रकार होगा?

  • जम्मू-कश्मीर संघीय क्षेत्र की विधान सभा में वर्तमान 107 के स्थान पर 114 सीटें होंगी जिनमें मात्र 90 सीटों के लिए चुनाव होंगे क्योंकि शेष 24 वे छाया सीटें (shadow seats) हैं जिनको पाकिस्तान द्वारा कब्ज़ा किये गये कश्मीर के लिए आरक्षित रखा गया है.
  • परिसीमन के लिए 2011 की जनगणना के आँकड़ों को आधार बनाया जाएगा.
  • सम्प्रति जम्मू-कश्मीर जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1957 को अमान्य कर दिया गया है और इसलिए अब परिसीमन का कार्य जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (यथा समय-समय पर संशोधित) तथा 2019 के अधिनियम 34 के अनुभाग 59 और 60 में विहित प्रावधानों के अनुसार किया जाएगा.

जम्मू-कश्मीर संविधान में परिसीमन विषयक प्रावधान

  1. जम्मू-कश्मीर में लोक सभा की सीटों से सम्बंधित परिसीमन भारतीय संविधान के अंतर्गत हुआ करता था. परन्तु वहाँ के विधान सभा सीटों के बारे में निर्णय जम्मू-कश्मीर संविधान तथा जम्मू-कश्मीर जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1957 के अनुसार किया जाता था.
  2. जहाँ तक लोक सभा सीटों की बात है, 2002 में नियुक्त अंतिम परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) को जम्मू-कश्मीर का काम नहीं सौंपा गया था. इसका अर्थ यह हुआ कि उस राज्य में लोकसभा की सीटों का परिसीमन 1971 की जनगणना पर आधारित था.
  3. जहाँ तक विधान सभा सीटों का प्रश्न है, जम्मू-कश्मीर के संविधान में एक अलग परिसीमन आयोग की अभिकल्पना है. परन्तु व्यवहार में इस राज्य की विधान सभाओं के लिए चुनाव क्षेत्रों के लिए केन्द्रीय परिसीमन आयोग की अनुशंसाओं को 1963 और 1973 में अपनाया गया था.
  4. 1991 में जम्मू-कश्मीर में जनगणना नहीं हुई थी और वहाँ नए परिसीमन आयोग के गठन पर विधान सभा ने 2026 तक रोक लगा दी थी और इस रोक को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सही घोषित किया गया था.

परिसीमन आवश्यक क्यों?

जनसंख्या में परिवर्तन को देखते हुए समय-समय पर लोक सभा और विधान सभा की सीटों के लिए चुनाव क्षेत्र का परिसीमन नए सिरे से करने का प्रावधान है. इस प्रक्रिया के फलस्वरूप इन सदनों की सदस्य संख्या में भी बदलाव होता है.

परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के अलग-अलग भागों को समान प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराना होता है. इसका एक उद्देश्य यह भी होता है कि चुनाव क्षेत्रों के लिए भौगोलिक क्षेत्रों को इस प्रकार न्यायपूर्ण ढंग से बाँटा जाए जिससे किसी एक राजनीतिक दल को अन्य दलों पर बढ़त न प्राप्त हो.

परिसीमन का कार्य कौन करता है?

  • परिसीमन का काम एक अति सशक्त आयोग करता है जिसका औपचारिक नाम परिसीमन आयोग है.
  • यह आयोग इतना सशक्त होता है कि इसके आदेशों को कानून माना जाता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है.
  • आयोग के आदेश राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित तिथि से लागू हो जाते हैं. इन आदेशों की प्रतियाँ लोक सभा में अथवा सम्बंधित विधान सभा में उपस्थापित होती हैं. इनमें किसी संशोधन की अनुमति नहीं होती.

परिसीमन आयोग और उसके कार्य

  • संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार संसद प्रत्येक जनगणना के पश्चात् एक सीमाकंन अधिनियम पारित करता है और उसके आधार पर केंद्र सरकार एक परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन करती है.
  • इस आयोग में सर्वोच्च न्यायालय का एक सेवा-निवृत्त न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और राज्यों के राज्य निर्वाचन आयुक्त सदस्य होते हैं.
  • इस आयोग का काम चुनाव क्षेत्रों की संख्या और सीमाओं का इस प्रकार निर्धारण करना है कि यथासम्भव सभी चुनाव क्षेत्रों की जनसंख्या एक जैसी हो.
  • आयोग का यह भी काम है कि वह उन सीटों की पहचान करे जो अजा/अजजा के लिए आरक्षित होंगे. विदित हो कि अजा/अजजा के लिए आरक्षण तब होता है जब सम्बंधित चुनाव-क्षेत्र में उनकी संख्या अपेक्षाकृत अधिक होती है.
  • सीटों की संख्या और आकार के बारे में निर्णय नवीनतम जनगणना के आधार पर किया जाता है.
  • यदि आयोग के सदस्यों में किसी बात को लेकर मतभेद हो तो बहुत के मत को स्वीकार किया जाता है.
  • संविधान के अनुसार, परिसीमन आयोग का कोई भी आदेश अंतिम होता है और इसको किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है.
  • प्रारम्भ में आयोग भारतीय राज्य पत्र में अपने प्रस्तावों का प्रारूप प्रकाशित करता है और पुनः उसके विषय में जनता के बीच जाकर सुनवाई करते हुए आपत्ति, सुझाव आदि लेता है. तत्पश्चात् अंतिम आदेश भारतीय राजपत्र और राज्यों के राजपत्र में प्रकाशित कर दिया जाता है.

चुनाव क्षेत्र परिसीमन का काम कब-कब हुआ है?

  • चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन का काम सबसे पहले 1950-51 में हुआ था. संविधान में उस समय यह निर्दिष्ट नहीं हुआ था कि यह काम कौन करेगा. इसलिए उस समय यह काम राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग के सहयोग से किया था.
  • संविधान के निर्देशानुसार चुनाव क्षेत्रों का मानचित्र प्रत्येक जनगणना के उपरान्त फिर से बनाना आवश्यक है. अतः 1951 की जनगणना के पश्चात् 1952 में परिसीमन आयोग अधिनियम पारित हुआ. तब से लेकर 1952, 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन का काम हुआ. उल्लेखनीय है कि 1976 में आपातकाल के समय इंदिरा गाँधी ने संविधान में संशोधन करते हुए परिसीमन का कार्य 2001 तक रोक दिया था. इसके पीछे यह तर्क दिया था गया कि दक्षिण के राज्यों को शिकायत थी कि वे परिवार नियोजन के मोर्चे पर अच्छा काम कर रहे हैं और जनसंख्या को नियंत्रण करने में सहयोग कर रहे हैं जिसका फल उन्हें यह मिल रहा है कि उनके चुनाव क्षेत्रों की संख्या उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में कम होती है. अतः1981 और 1991 की जनगणनाओं के बाद परिसीमन का काम नहीं हुआ.
  • 2001 की जनगणना के पश्चात् परिसीमन पर लगी हुई इस रोक को हट जाना चाहिए था. परन्तु फिर से एक संशोधन लाया गया और इस रोक को इस आधार पर 2026 तक बढ़ा दिया कि तब तक पूरे भारत में जनसंख्या वृद्धि की दर एक जैसी हो जायेगी. इसी कारण 2001 की जनगणना के आधार पर किये गये परिसीमन कार्य (जुलाई 2002 – मई 31, 2018) में कोई ख़ास काम नहीं हुआ था. केवल लोकसभा और विधान सभाओं की वर्तमान चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं को थोड़ा-बहुत इधर-उधर किया गया था और आरक्षित सीटों की संख्या में बदलाव लाया गया था.

Tags : Delimitation of Constituencies in Hindi. What is delimitation and why is it needed. How is it carried out and what are special provisions w.r.t to J&K.

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