केंद्र-राज्य सम्बन्ध – Centre and State Relations in Hindi

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परिसंघ (Federation) आधारित क्लासीकीय संघवाद के विपरीत भारतीय संविधान सहयोगी संघवाद को स्वीकार करता है जिसमें संघ शक्तिशाली होता है पर राज्य कमजोर नहीं होते हैं एवं दोनों सरकारें एक-दूसरे की पूरक होती हैं. इस दृष्टि से भारतीय संघवाद, अमेरिकी संघवाद के बजाय कनाडीय संघवाद के ज्यादा निकट है. अतः भारतीय संघवाद को ए.एच. बिर्च तथा ग्रेनविल ऑस्टिन जैसे विचारक सहयोगी संघवाद की उपाधि देते हैं.

भारतीय संघीय मॉडल के अंतर्गत केंद्र राज्य संबंधों के स्वरूप का निर्धारण शक्तियों के विभाजन एवं राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित है. शक्तियों के विभाजन की दृष्टि से केंद्र-राज्य संबंधों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है –

  • केंद्र तथा राज्यों के विधायी सम्बन्ध
  • केंद्र तथा राज्यों के प्रसाशनिक सम्बन्ध
  • केंद्र तथा राज्यों के वित्तीय सम्बन्ध

केंद्र राज्य विधायी सम्बन्ध

केंद्र राज्य विधायी सम्बन्ध की सातवीं अनुसूची में वर्णित संघ सूची (union list), राज्य सूची (state list) तथा समवर्ती सूची (concurrent list) पर आधारित है.

संघ सूची (Union List) : इस सूची में राष्ट्रीय महत्त्व के विषय शामिल हैं. सूची में कुल 97 विषय हैं. मुख्य है रक्षा, वैदेशिक मामले, युद्ध-संधि, नागरिकता, रेल, बंदरगाह, वायु मार्ग, डाक, तार, संचार, मुद्रा, बैंक, बीमा इत्यादि. इन विषयों पर विधायन अनन्य रूप से केंद्र संघ का अधिकार है.

राज्य सूची (State List) : इस सूची में स्थानीय महत्त्व के विषय हैं. इस सूची में मूलतः 66 विषय थे किन्तु 42वें संविधान संशोधन द्वारा इस सूची में पाँच विषय समवर्ती सूची में शामिल कर दिए जाने से इसमें वर्तमान में 61 विषय शेष हैं. इनमें प्रमुख विषय हैं – सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस, जेल, जन-स्वास्थ्य, सफाई, स्थानीय शासन, बाजार, कृषि, मत्स्यन आदि.

इन विषयों पर विधि निर्माण का अधिकार सामान्य परिस्थितियों में राज्य विधानमंडलों को है.

Important Info
42वें संविधान संशोधन द्वारा समवर्ती सूची में स्थानांतरित विषय हैं – 1) शिक्षा 2) वन 3) नाप-तौल 4) वन्य जीवों एवं पक्षियों का संरक्षण 5) न्याय का प्रशासन (उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के अतिरिक्त सभा न्यायालयों का गठन).

समवर्ती सूची (Concurrent List) : इस सूची में स्थानीय व राष्ट्रीय दोनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण विषय सम्मिलित हैं. इस सूची में मूलतः 47 विषय थे किन्तु 42वें संविधान संशोधन द्वारा राज्य सूची के पाँच विषय इस सूची में शामिल किये जाने से विषयों की संख्या 52 हो गई है. इनमें प्रमुख है – आपराधिक कानून प्रक्रिया, सिविल प्रक्रिया, विवाह एवं तलाक, जनसंख्या नियंत्रण तथा परिवार नियोजन, विद्युत, श्रम कल्याण, आर्थिक एवं सामाजिक योजना, दावा, अखबार, पुस्तक, प्रेस इत्यादि.

इन विषयों पर राज्यों एवं संघ दोनों को विधायन का अधिकार है किन्तु यदि राज्य विधि व संघीय विधि में टकराव होता है तो संघीय विधि प्रभावी होगी, यदि राज्य विधि को राष्ट्रपति की अनुमति मिली हो तो राज्य में राज्य विधि ही प्रवर्तित रहेगी.

केंद्र-राज्य प्रशासनिक सम्बन्ध

संविधान के भाग XI में अनुच्छेद 256 से 263 तक केंद्र राज्य प्रशासनिक संबंधों का उल्लेख है. केंद्र राज्य समबन्धों में प्रशासनिक संबंधों का संयोजन सबसे कठिन कार्य है. संविधान के अनुच्छेद 73 के अनुसार संघ की प्रशासनिक शक्ति उन विषयों पर सीमित है जिन पर संघीय संसद के विधि निर्माण के अधिकार हैं. इसी प्रकार अनुच्छेद 162 के अनुसार राज्यों की प्रशासनिक शक्तियाँ उन विषयों पर सीमित हैं जिन पर राज्य विधान्मंदलों को विधायन का अधिकार है. संवारती सूची के विषयों पर साधारणतः प्रशासनिक अधिकार राज्यों में निहित हैं किन्तु इन विषयों पर राज्यों की प्रशासनिक शक्ति कुछ विशेष परिस्थितियों में संघ को प्रशासनिक शक्ति के अधीन है जहाँ संविधान या संसद द्वारा ऐसा प्रावधान किया गया है.

राज्यों की प्रशासनिक स्वायतत्ता पर संविधान द्वारा राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से संघ का नियंत्रण स्थापित किया गया है. ये उपबंध हैं –

  • संविधान के अनुच्छेद 257 के अनुसार राज्य का यह दायित्व है कि अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार करें जिससे संसद के कानूनों का अनुपालन सुनिश्चित हो तथा केन्द्रीय प्रशासन में कोई बाधा उत्पन्न न हो.
  • संविधान के अंतर्गत केंद्र राज्यों को निम्नलिखित मामलों में निर्देश दे सकता है कि राज्य अपनी कार्यकारी शक्ति का प्रयोग इस प्रकार करें कि –
  1. संचार के साधनों को बनाए रखें एवं उनका रखरखाव करें.
  2. राज्य रेलवे सम्पत्ति की रक्षा करें.
  3. प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर राज्य से सम्बंधित भाषाई अल्पसंख्यक समूह के बच्चों के लिए मातृभाषा सीखने की व्यवस्था करें.
  4. राज्य में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए विशेष योजनाएँ बनाए और उनका किर्यान्व्यन करें.
  • राष्ट्रपति राज्यों की सरकारों या उनके पदाधिकारियों को संघ सूची में वर्णित विषयों से सम्बंधित कोई कार्य सौंप सकता है.
  • संविधान में यह प्रावधान है कि केंद्र तथा राज्य सरकारों का कर्त्तव्य है कि वे सभी सरकारी कृत्यों का आदर करें व देश के सभी न्यायालयों द्वारा दिए गये अंतिम निर्णयों को लागू करें.
  • संविधान संघ तथा राज्यों की पृथक लोक सेवाओं के अतिरिक्त अखिल भारतीय सेवाओं (IAS, IPS, IFS) की व्यवस्था करते हैं. इन सेवाओं को स्थापना का अधिकार संघ को है. इन सेवाओं के सदस्य राज्यों के उच्च पदों पर आसीन होते हैं. अतः यह भी राज्यों पर नियंत्रण का एक अभिकरण है.
  • राज्यपाल का पद भी राज्यों पर केन्द्रीय नियंत्रण का अधिकरण है. राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है तथा राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होने के साथ-साथ राज्य में केंद्र का एजेंट भी होता है.
  • संविधान संघीय संसद को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह किसी अंतर्राजीय नदी और नदी घाटी के पानी के प्रयोग वितरण और नियंत्रण के सम्बन्ध में किसी विवाद या शिकायत पर न्याय निर्णयन दे सकती है.
  • संविधान राष्ट्रपति को शक्ति प्रदान करता है (अनुच्छेद 263) कि वह केंद्र व राज्यों के मध्य सामूहिक महत्त्व के विषयों की जाँच वह बहस के लिए अंतर्राज्यीय परिषद् का गठन कर सकता है. इस तरह की परिषद् का गठन 1990 में किया गया था.
  • संविधान संसद को संवैधानिक उद्देश्य से अंतर्राज्यीय व्यापार वाणिज्य एवं अंतर्संबंध की स्वतंत्रता हेतु किसी प्राधिकरण का गठन करने के लिए प्राधिकृत करता है.
  • राज्यों पर केंद्र के प्रशासनिक नियंत्रण का सबसे उपकरण अनुच्छेद 365 है. अनुच्छेद 365 के अनुसार यदि राज्य सरकार केंद्र के निर्देशों का पालन करने में विफल रहती है तो राष्ट्रपति यह उद्घोषणा कर सकता है कि राज्य में संवैधानिक ढाँचा विफल हो गया है. इस घोषणा के परिणामस्वरूप राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो जाएगा.

केंद्र राज्य वित्तीय सम्बन्ध

संविधान के भाग XII में अनुच्छेद 265 से 293 तक केंद्र राज्य वित्तीय संबंधों का विवरण है. संघीय व्यवस्था में विधायी तथा प्रशासनिक शक्तियों के साथ-साथ वित्तीय प्रान्तों का संघ एवं इकाइयों में स्पष्ट एवं संतोषजनक विभाजन भी संघवाद का एक अनिवार्य तत्त्व है. संविधान द्वारा केंद्र व राज्यों के मध्य वित्तीय संबंधों का निरूपण निम्न प्रकार से किया गया है –

  • करारोपण शक्ति तथा कर आगमों का विभाजन
  • सहायक अनुदान तथा अन्य सावर्जनिक उद्देश्यों हेतु अनुदान
  • ऋण लेने सम्बन्धी उपबंध
  • पारस्परिक कर विमुक्ति
  • वित्तीय आपात में वित्तीय सम्बन्ध
  • संघ एवं राज्यों के आय का लेखा परीक्षण
इस आर्टिकल को फिर से कल अन्य जानकारियों के साथ अपडेट करुँगी इसलिए कल एक बार फिर से इस पोस्ट को पढ़ना न भूलें. कल हम केंद्र राज्य वित्तीय सम्बन्ध के हर पॉइंट को विस्तार से चर्चा करेंगे और केंद्र-राज्य संबंधों में टकराव के क्षेत्र की भी चर्चा करेंगे. रुचिरा
About the Author

Ruchira

रुचिरा जी हिंदी साहित्यविद् हैं और sansarlochan.IN की सह-सम्पादक हैं. कुछ वर्षों तक ये दिल्ली यूनिवर्सिटी से भी जुड़ी रही हैं. फिलहाल ये SINEWS नामक चैरिटी संगठन में कार्यरत हैं. ये आपको केंद्र और राज्य सरकारी योजनाओं के विषय में जानकारी देंगी.

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