कार्बन डेटिंग और इसकी सीमाएँ

Richa KishoreScience TechLeave a Comment

हाल ही में वाराणसी की एक जिला अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर की संरचना की कार्बन डेटिंग (Carbon dating) की मांग वाली एक याचिका को अनुमति दे दी है, जिसे हिंदू पक्ष ने ‘शिवलिंग’ होने का दावा किया है।

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कार्बन डेटिंग क्या है? (What is Carbon Dating – Explained in Hindi)

कार्बन डेटिंग एक ऐसी विधि है जिसका उपयोग ऐसी कार्बनिक पदार्थों की आयु को जानने के लिए किया जाता है जो कभी जीवित थीं। ज्ञातव्य है कि जीवित चीजों में विभिन्न रूपों में कार्बन होता है।

C-14 और C-12

कार्बन डेटिंग पद्धति इस तथ्य का उपयोग करती है कि कार्बन का एक विशेष समस्थानिक (isotope) जिसे C-14 कहा जाता है वह एक विशेष दर से क्षय होता है जो सर्वविदित है। C-14 का परमाणु द्रव्यमान 14 है और यह रेडियोधर्मी है.

वातावरण में कार्बन का सबसे प्रचुर समस्थानिक कार्बन-12 है या एक कार्बन परमाणु है जिसका परमाणु द्रव्यमान 12 है। 

वातावरण में कार्बन-14 की बहुत कम मात्रा मौजूद होती है। वातावरण में कार्बन-12 और कार्बन-14 का अनुपात लगभग स्थिर है।

मुख्य तथ्य

  • पौधे अपना कार्बन प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त करते हैं, जबकि जानवर इसे मुख्य रूप से भोजन के माध्यम से प्राप्त करते हैं। 
  • चूँकि पौधे और जानवर अपना कार्बन वातावरण से प्राप्त करते हैं, वे भी कार्बन -12 और कार्बन -14 समस्थानिकों को लगभग उसी अनुपात में प्राप्त करते हैं जिस अनुपात में वे वातावरण में विद्यमान हैं।
  • लेकिन जब वे मर जाते हैं, तो वातावरण के प्रभाव से उनका संपर्क टूट जाता है। इसलिए चयापचय (metabolism) बंद  होने के चलते कार्बन का लेन-देन ख़त्म हो जाता है। 
  • कार्बन-12 स्थिर है और सड़ता नहीं है, जबकि कार्बन-14 रेडियोधर्मी है। कार्बन-14 लगभग 5,730 वर्षों में स्वयं का आधा रह जाता है। इसे ही इसका “अर्द्ध जीवन (half-life)” कहा जाता है।
  • किसी पौधे या जानवर के मरने के बाद, शरीर में कार्बन -12 और कार्बन -14 का अनुपात बदलना शुरू हो जाते हैं। 
  • इस परिवर्तन को मापा जा सकता है और इसका उपयोग जीव की मृत्यु के अनुमानित समय को निकालने के लिए किया जा सकता है।

कार्बन डेटिंग की सीमाएँ (limitations of Carbon Dating)

  • हालांकि अत्यंत प्रभावी कार्बन डेटिंग को सभी परिस्थितियों में लागू नहीं किया जा सकता है। विशेष रूप से, इसका उपयोग निर्जीव चीजों की उम्र निर्धारित करने के लिए नहीं किया जा सकता है, जैसे कि चट्टानें आदि.
  • साथ ही, कार्बन डेटिंग के माध्यम से 40,000-50,000 वर्ष से अधिक की आयु का पता नहीं लगाया जा सकता है।ऐसा इसलिए है क्योंकि आधे जीवन के आठ से दस चक्र पार करने के बाद, कार्बन -14 की मात्रा लगभग नगण्य हो जाती है।
  • निर्जीव वस्तुओं की आयु की गणना करने के अन्य तरीके हैं, लेकिन कार्बन डेटिंग का उपयोग कुछ निश्चित परिस्थितियों में अप्रत्यक्ष तरीके से भी किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, हिमनदों और ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ के कोर की उम्र जानने के लिए भी कार्बन डेटिंग का उपयोग किया जाता है. यह बर्फ की चादरों के अंदर फँसे कार्बन डाइऑक्साइड अणुओं का अध्ययन करके निर्धारित की जाती है ।
  • फँसे हुए अणुओं का बाहरी वातावरण से कोई संपर्क नहीं होता है और वे उसी स्थिति में पाए जाते हैं जब वे फँस गए थे।
  • किसी विशेष स्थान पर एक चट्टान कितने समय से है, यह भी इसी तरह की अप्रत्यक्ष विधियों का उपयोग करके निर्धारित किया जा सकता है। 
  • यदि चट्टान के नीचे कार्बनिक पदार्थ, मृत पौधे या कीड़े फँसे हुए हैं, तो वे इस बात का संकेत दे सकते हैं कि वह चट्टान, या कोई अन्य चीज उस स्थान पर कब पहुँची थी।
  • किसी वस्तु के चारों ओर अवसादन की तिथि निर्धारित करने के लिए कई अन्य विधियाँ हैं जिनका उपयोग विशिष्ट स्थिति के आधार पर किया जाता है।  
  • हालांकि किसी वस्तु की उम्र जानने के लिए कई तरह की विधियाँ जरूर मौजूद हैं, लेकिन कभी भी एक निश्चित तिथि निर्धारित नहीं किया जा सकती है।
  • विभिन्न विधियों की सटीकता भी भिन्न होती है।

ज्ञातव्य है कि कुछ साल पहले सेंटिनल द्वीप में पाए गये रसोई के अवशिष्टों की कार्बन डेटिंग से भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण से पता चला था कि इस द्वीप में 2,000 वर्ष पहले से ही सेंटिनल जनजाति निवास करते रहे हैं. 

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