[Sansar Editorial] अनाज प्रबंधन प्रणाली में अपेक्षित सुधार – शांता कुमार समिति के सुझाव

Sansar LochanSansar Editorial 20202 Comments

चालू वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में भारत की GDP वृद्धि दर लुढ़क कर 4.5% तक हो गई है और कृषि GDP की वृद्धि की दर भी 2.1% पर आ चुकी है. अगली तिमाही में आशंका है कि कृषि GDP की वृद्धि दर 2% के आस-पास रह सकती है. इससे भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर चिंतित हो रहे हैं और पूछ रहे हैं कि क्या यह संभव हो सकेगा कि GDP को 7-8% तथा कृषि GDP को 4%  तक फिर से लाया जा सकता है?

कृषि प्रक्षेत्र पर मुद्रा स्फीति का प्रभाव

अभी भी भारत में कार्यबल का 44% कृषि कार्य से जुड़ा हुआ है. इसलिए यदि उनकी आय कम रहेगी तो निर्मित वस्तुओं, आवास एवं सामग्रियों के लिए उनकी माँग भी घटी रहेगी. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index – CPI) में अनाज, दालों और सब्जियों के दामों में मुद्रा स्फीति दर्शाई जाती है.

पिछले पाँच वर्ष मुद्रा स्फीति का स्तर नीचे रहा, परन्तु इस बार इसमें तेजी देखी जा रही है. एक और समस्या यह है कि राजकोषीय घाटे (fiscal deficit) का लक्ष्य भी 3.3% से नीचे नहीं आने देना है. CAG का कहना है कि यदि कई लोक सेवा उपक्रमों के द्वारा लिए गये ऋणों का भी हिसाब रखा जाए तो वास्तविक राजकोषीय घाटा और भी अधिक होगा.

अनाज प्रबंधन प्रणाली में सुधार की आवश्यकता

आज आवश्यकता है कि सरकारी क्षेत्र में अकुशलता पर लगाम लगाते हुए उसमें सुधार किया जाए जिससे अन्य कार्यों के लिए संसाधन जुटाए जा सकें. जिन क्षेत्रों में अकुशलता दूर करनी है उनमें से एक प्रमुख क्षेत्र है अनाज प्रबंधन की प्रणाली.

  • केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (National Food Security Act – NFSA) के तहत निर्मित अनाज प्रबंधन प्रणाली में व्याप्त घोर अकुशलता पर ध्यान दें.
  • ज्ञातव्य है कि देश की 67% जनसंख्या को NFSA गेहूँ और चावल क्रमशः 2 रु. और 3 रु. प्रति किलो के भाव से मुहैया कराती है जबकि भारतीय खाद्य निगम को इन दोनों अनाजों पर प्रति किलो 25 रु. और 35 रु. का खर्च बैठता है.
  • पिछले संघीय बजट में सस्ते अनाज के लिए 1.84 लाख करोड़ रु. की खाद्य सब्सिडी का प्रावधान करना पड़ा था.
  • बहुत कम लोगों को पता है कि भारतीय खाद्य निगम के पास 1.86 लाख करोड़ रु. के विपत्र बिना भुगतान के पड़े हुए हैं और सरकार ने उस निगम को कहा है कि अपने काम-काज को चलाने के लिए वह अधिक से अधिक उधारी करें.
  • भारतीय खाद्य निगम के पास प्रत्येक वर्ष पहली जनवरी को जो बफर भंडार होता है वह इसके लिए निर्धारित मानदंड से दुगुने से अधिक है.
  • इतना बड़ा अनाज भंडार सष्ट रूप से दर्शाता है कि खाद्य प्रबंधन में विकट अकुशलता है. एक ओर जहाँ गेहूँ और चावल की सरकारी खरीद में कोई सीमा नहीं है, वहीं दूसरी ओर अनाज केवल सार्वजनिक वितरण प्रणालियों अर्थात् राशन दुकानों को ही दिया जाता है.
  • विपुल अनाज भंडार को हटाने के लिए खुले बाजार (open market operations) में काम होता है, परन्तु यह किसी भी दृष्टि से पर्याप्त नहीं है. हम लोगों को एक स्पष्ट रणनीति बनानी होगी. स्मरणीय रहे है कि यदि आगामी रबी में अच्छी-खासी खरीद हो जाती है तो भारतीय खाद्य निगम के पास उसको रखने का भी स्थान नहीं मिलेगा.
  • इस बड़े भंडार के चलते सरकार की एक लाख करोड़ रु. से भी अधिक की धनराशि फंसी पड़ी है.
  • यदि सरकार अपने अनाज भंडार का आधा भी निकाल दे तो उसके पास 50,000 करोड़ रु. आ जाएँगे जिससे कम से कम आधी अवसंरचनात्मक परियोजनाओं के लिए पैसा हाथ में आ जाएगा.

शांता कुमार समिति के सुझाव

शांता कुमार समिति की अध्यक्षता में वर्ष 2014 में छह सदस्यीय समिति का गठन किया गया था. इस समिति को यह सुझाव देना था कि किस प्रकार भारतीय खाद्य निगम के वित्तीय प्रबंधन तथा अनाज के क्रय, भण्डारण  और वितरण में संचालनात्मक कौशल कैसे लाया जाए.

  • सरकार को चाहिए कि अनाज जमा करने का काम केन्द्रीय गोदाम निगम (CWC), राज्य गोदाम निगम (SWC) तथा निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठानों को दे दे.
  • गोदाम, शीत भंडार और अन्य अवसंरचनाओं के निर्माण के लिए सरकार PPP के आधार पर एक नई प्रणाली लाये जिसका नाम होगा – निजी उद्यमी प्रतिभूति योजना / Private Entrepreneur Guarantee (PEG) scheme.
  • अनाज रखने के लिए बोरों की जगह साइलो (silos) का प्रयोग होना चाहिए क्योंकि भंडारण के लिए ये अधिक कारगर सिद्ध होते हैं.
  • अनाज के क्रय से लेकर उसके खुदरा वितरण तक के कारोबार के लिए रेल सम्पर्क की सुविधा के साथ-साथ कंप्यूटर के प्रयोग का प्रावधान किया जाए और ऑनलाइन ट्रैकिंग की व्यवस्था भी रखी जाए.
  • खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अधीन लाभार्थियों की संख्या को वर्तमान के 67% से घटाकर 40% किया जाए.
  • निजी प्रतिष्ठानों को अनाजों के क्रय एवं भंडारण की अनुमति दी जाए.
  • राज्यों द्वारा किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर दिया जाने वाला बोनस बंद किया जाए.
  • नकद स्थानान्तरण प्रणाली अपनाई जाए जिससे कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और खाद्य सब्सिडी की राशि किसानों एवं खाद्य सुरक्षा लाभार्थियों के खातों में सीधे जमा हो सके.
  • भारतीय खाद्य निगम अनाज की खरीद उन्हीं राज्यों में करे जहाँ बहुत कम मात्रा में ऐसी खरीद हो पाती है. कहने का अभिप्राय यह हुआ कि जो राज्य क्रय के मामले में अच्छा काम कर रहे हैं, जैसे – हरियाणा, पंजाब, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा, वहाँ खरीद का काम राज्य सरकारें ही करें.
  • सरकारी लेवी चावल की नीति समाप्त कर दे. ज्ञातव्य है कि लेवी चावल वह चावल है जो सरकार मिलों से अनिवार्य रूप से ले लेती है. सरकार के द्वारा लिया जाने वाला चावल अलग-अलग राज्यों में कुल उत्पादन का 25 से 75 प्रतिशत होता है. नियम यह है कि लेवी चावल दे देने के बाद बचे चावल को ही मिल खुले बाजार बेच सकते हैं.
  • खाद्य प्रक्षेत्र का नियमन बंद कर दिया जाए अर्थात् उसे मुक्त छोड़ दिया जाए तथा किसानों को प्रति हेक्टेयर 7,000 रु. की नकद सब्सिडी दी जाए.
  • शांता कुमार समिति ने आह्वान किया है कि गोदाम रसीद की परक्राम्य प्रणाली (negotiable warehouse receipt – NWR) स्थापित की जाए. नई प्रणाली में किसान अपनी पैदावार पंजीकृत गोदामों में जमा कर सकेंगे और बैंकों से अपनी पैदावार पर 80% का अग्रिम न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के आधार पर ले सकते हैं.
  • समिति का सुझाव है कि बफर भंडार के लिए एक स्पष्ट और पारदर्शी तरलता नीति अपनाई जाए और इसके लिए भारतीय खाद्य निगम को अपना काम करने में अधिक लचीलापन दिया जाए. निगम को चाहिए कि वह आवश्यकतानुसार अधिकायी भंडार को निर्यात में लगाया करें.

निष्कर्ष

इस प्रकार आवश्यकता है कि अपनी अनाज प्रबंधन प्रणाली में सुधार लाने के लिए कड़े कदम उठाये जाएँ. इसके लिए एक नई विशेषज्ञ समिति बनाने की आवश्यकता नहीं है. यदि सरकार ऊपर लिखे सुझावों पर चले तो प्रति वर्ष 50,000 करोड़ रु. अतिरिक्त बच सकते हैं. साथ ही सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने में सफल हो सकती है. यदि तेजी से भंडारित अनाज बाहर निकल जाए तो मुद्रा स्फीति पर भी लगाम लगेगी.

Tags : Reform of grain management system. Shanta Kumar Committee Recommendations for UPSC in Hindi.

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