[Sansar Editorial] आचार समिति – राज्य सभा, लोक सभा, विधान सभा में इसकी भूमिका

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राज्यसभा में समितियों की एक सुसंगत प्रणाली है. इन्हीं में से एक समिति है आचार समिति (Committees on Ethics). राज्यसभा की आचार समिति स्थाई समिति की श्रेणी में आती है. राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू चाहते हैं कि आचार समिति को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़े. हाल ही में सभापति एम वेंकैया नायडू ने आचार समिति के कामकाज की समीक्षा की. इस समीक्षा में सभापति को जानकारी मिली कि आचार समिति ने पिछले 4 वर्षों के दौरान राज्यसभा के 19 सदस्यों के बारे में हासिल 22 शिकायतें बिना किसी जांच के लौटा दी थीं. ये शिकायतें निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार नहीं की गई थीं. मौजूदा नियम के अनुसार कोई भी व्यक्ति सदन के सदस्य के अनुपयुक्त व्यवहार के बारे में आचार समिति या समिति द्वारा प्राधिकृत अधिकारी से लिखित में शिकायत कर सकता है. इन 19 सदस्यों में सत्ता दल और विपक्ष के अतिरिक्त दो निर्दलीय सांसदों के खिलाफ शिकायत की गई थी. इन 22 शिकायतों में से 13 शिकायतों को कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने राज्यसभा सचिवालय के पास भेजा था. 4-4 शिकायतें गृह मंत्रालय और लोकसभा सचिवालय से आई थीं और एक संसदीय कार्य मंत्रालय की ओर से राज्यसभा सचिवालय के पास भेजी गई थी.

आचार समिति के गठन की सिफारिश

आजादी के बाद हमारे सांसद और विधायक अपने कामकाज और आचरण के प्रति बहुत संवेदनशील थे. उनकी पीढ़ी में अधिकतर लोग स्वाधीनता संग्राम में शामिल रहे हैं. लेकिन बाद के सालों में खासतौर पर 70 के दशक के बाद गिरावट का सिलसिला आरंभ हुआ. क्षेत्रीय दलों के उदय के बाद हालात बिगड़ने लगे. इसी नाते 23- 24 सितंबर, 1992 को दिल्ली में हुए पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में संसद और विधान मंडलों में आचार समितियों के गठन की सिफारिश की गई थी.

भारत में पहली आचार समिति का गठन 4 मार्च, 1997 को राज्यसभा के तत्कालीन सभापति के. आर. नारायण ने किया था. पूर्व केंद्रीय मंत्री शंकर राव चौहान इसके पहले अध्यक्ष बने. इस समिति ने काफी महत्वपूर्ण काम किया. 1998 में अपनी पहली प्रतिवेदन में समिति ने सदस्यों के आचरण के लिए 14 सूत्री कोड बनाया था जिसमें संसद के सम्मान और विश्वसनीयता के प्रति सदस्यों के आचरण शामिल हैं.

राज्यसभा की आचार समिति अब तक 10 प्रतिवेदन सौंप चुकी है. बाद में लोकसभा में भी आचार समिति का गठन 16 मई, 2000 को 13वीं लोकसभा के दौरान हुआ और पहले अध्यक्ष पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर बने. बाद में लालकृष्ण आडवाणी से लेकर मानिकराव गावित के अध्यक्ष रहे. इस समिति की सिफारिश पर कई सांसदों की सदस्यता तक चली गई.

राज्यसभा और लोकसभा की आचार समिति में अंतर

राज्यसभा और लोकसभा दोनों में ही आचार समिति के गठन का नियम है. राज्यसभा की आचार समिति जहां स्थाई होती है, वहीं लोकसभा की आचार समिति तदर्थ समिति है. लोकसभा में पहली आचार समिति का गठन 16 मई, 2000 को हुआ था. राज्यसभा की तरह लोकसभा की आचार समिति का काम सदस्यों के नैतिक और सदाचार व्यवहार की निगरानी रखना, सदस्य के अनैतिक व्यवहार के संबंध में या उसके संसदीय व्यवहार से संबंधित गई हर प्रकार की शिकायत की जांच करना और उपयुक्त समझाने वाली सिफारिशें करना. साथ ही ऐसे नियम बना जो यह साफ़ करते हों कि अनैतिक आचार क्या हैं. 

राज्य सभा की आचार समिति में जहां 10 सदस्य होते हैं, वहीं लोकसभा की आचार समिति में 15 सदस्य होते हैं और इनका कार्यकाल 1 वर्ष का ही होता है. आचार समिति के सदस्यों की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष करते हैं. यह समिति लोकसभा की कार्यवाही के दौरान किसी सदस्य द्वारा किए गए अनैतिक आचरण के संबंध में शिकायतों की सुनवाई करेगी जिसे लोकसभा अध्यक्ष द्वारा संज्ञान में लिया गया हो. समिति किसी भी शिकायत पर प्राथमिक जांच करती है और अपनी सिफारिशों को एक प्रतिवेदन के तौर पर लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत करती है. जिसे बाद में सदन के सम्मुख चर्चा और प्रस्ताव के लिए अध्यक्ष पेश करते हैं. राज्य सभा की गरिमापूर्ण संचालन में आचार समिति की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. अपने गठन के बाद से ही समिति प्रभावी ढंग से काम कर रही है. 

विधान सभाओं में आचार समिति

देश में कुछ गिनी चुनी विधानसभाएँ है जहां आचार समितियाँ बनी हुई हैं और वे प्रभावी हैं. विधायकों के लिए आचार संहिता भी बनाई हुई है और एक हद तक उन पर अमल भी हो रहा है. राज्यों में छत्तीसगढ़ में सबसे पहले आचार समिति बनी और कालांतर में बिहार विधान परिषद में 20 अगस्त, 2010 को नीतीश कुमार की अध्यक्षता में पहली आचार समिति गठित की गई. समिति ने 19 दिसंबर, 2014 को सदन में पहला प्रतिवेदन रखा जिसमें सदस्यों के विधान मंडल परिसर में प्रवेश से लेकर सदन के भीतर, बाहर अध्ययन यात्रा और शिष्टमंडलों में वार्ता के दौरान पालन किए जाने वाले नियमों का समावेश किया गया. महाराष्ट्र के विधायकों का सदन के भीतर और बाहर आचरण पर निगाह रखने के लिए विधानसभा ने 2016 में 19 सदस्यीय आचार समिति का गठन किया.

हाल के सालों में कई सांसदों और विधायकों के अनुचित आचरण के चलते गिरती साख को लेकर पीठासीन अधिकारियों में चिंता सताती रही है.

कार्य और महत्ता

संसद की प्रतिष्ठा और गरिमा बनी रहे यह संसद के प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी होती है. राज्यसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन को प्रभावी बनाने के लिए 2004 में आचार समिति के नियम शामिल किए गए. राज्यसभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन विषयक नियम में आचार समिति का गठन नियम 286 के तहत करने का प्रावधान है. नियम 287 के मुताबिक सभापति समय-समय पर आचार समिति नाम निर्देशित करेंगे जिसमें 10 सदस्य होंगे. इसके उप-नियम 1 के अनुसार समिति तब तक कार्य करती रहेगी जब तक की नई समिति का गठन न किया जाए. समिति में खाली हुई सीट के लिए सदस्य अध्यक्ष चुनेंगे. नियम 288 के मुताबिक समिति का अध्यक्ष राज्य सभा के सदस्यों में ही सभापति नियुक्त करेंगे. यदि अध्यक्ष कभी अनुपस्थित रहे तो समिति किसी अन्य सदस्य को अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए चुनेगी. वहीं समिति में कार्य संचालित करने के लिए कम से कम पांच सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक है. राज्य सभा के आचार समिति के गठन के बाद से ही इस समिति का दायरा काफी व्यापक हो गया है.

आचार संहिता नियम 290

आचार संहिता के नियम 290 के तहत जिम्मेदारी दी गई है –  

  • सदस्यों के आचरण पर नजर रखना.
  • सदस्यों के लिए एक आचार संहिता तैयार करना
  • राज्यसभा को प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के माध्यम से इस संहिता में समय-समय पर संशोधन करना
  • आचार समिति के बारे में कुछ जिम्मेदारी में जोड़ने का सुझाव देना
  • सदस्यों द्वारा कथित रूप से आचार संहिता का उल्लंघन संबंधी मामलों की जांच करना

राज्यसभा की आचार समिति सांसदों के व्यवहार से जुड़े शिकायतों को लेकर भी गंभीर है. इसके लिए –

  • समिति के जिम्मेदारी सदस्य पर किसी अन्य नैतिक दुराचार के संबंध में लगाए गए आरोप के संबंधित मामलों की जांच करना
  • सदस्यों को नैतिक स्तर से संबंधित प्रश्नों के संबंध में स्वत: ही या विशेष अनुरोध प्राप्त करने पर सलाह देना
  • सदस्यों पर अगर कोई अनैतिक व्यवहार या अन्य दुराचार या आचार संहिता नियमों का उल्लंघन किए जाने की बात साबित होती है तो समिति को उन पर निंदा, भर्त्सना, राज्यसभा से एक निश्चित अवधि के लिए निलंबन करने का अधिकार
  • शिकायत सही साबित होने पर समिति के पास अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की शक्तियां हैं.

आचार समिति का नियम 291

इसके तहत साक्ष्य लेने या पत्र लेने या दस्तावेज मांगने की शक्ति भी है. लेकिन अगर समिति द्वारा माँगा गया साक्ष्य दस्तावेज प्रासंगिक नहीं है तो यह मुद्दा सभापति के समक्ष जाएगा और उनका निर्णय ही आखिरी होगा. समिति के विवेक पर निर्भर होगा कि वह किसी साक्ष्य, मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य को गुप्त या गोपनीय माने या ना माने.

शिकायत करने की प्रक्रिया – नियम 295

राज्यसभा की आचार समिति में शिकायत करने की प्रक्रिया का व्यापक प्रावधान किया गया है. नियम 295 के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति आचार समिति से किसी सदस्य के कथित अनैतिक व्यवहार या आचार संहिता के उल्लंघन या किसी सदस्य के हितों की कथित गलत सूचना की शिकायत कर सकता है. इसके साथ ही समिति स्वप्रेरणा से भी किसी मामले को उठा सकती है. सदस्य भी किसी मामले को समिति के पास भेज सकते हैं. कोई भी शिकायत समिति या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी को लिखित तरीके से की जा सकती है. शिकायत संयमित भाषा में और तथ्यों तक सीमित होना आवश्यक है. समिति के समक्ष शिकायत करने वाले व्यक्ति को अपनी पहचान बतानी होती है और अपने आरोपों को सिद्ध करने के लिए सहायक दस्तावेज या अन्य प्रमाण प्रस्तुत करना होता है. समिति शिकायतकर्ता द्वारा अनुरोध करने पर उसके नाम का खुलासा नहीं करती है. यद्यपि शिकायत दर्ज करने के कुछ शर्तें भी हैं. केवल मीडिया की अप्रमाणित प्रतिवेदन के आधार पर दर्ज शिकायत पर विश्वास नहीं किया जाता है. इसके अतिरिक्त समिति ऐसे किसी मामले पर विचार नहीं करती है जो न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है.

नियम 296

वहीं नियम 296 में समिति के समक्ष आए मामलों की जांच की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है. इसके तहत यदि संतुष्ट है कि शिकायत उचित रूप में है और मामला उसके अधिकार क्षेत्र में है तो वह मामले को प्रारंभिक जांच के लिए ले सकती है. प्रारंभिक जांच के बाद यदि समिति को लगता है कि प्रथमदृष्टया कोई मामला नहीं बनता तो मामले को छोड़ा जा सकता है. इसके अतिरिक्त जांच में यदि यह पाया जाता है कि कोई शिकायत झूठी है या दुर्भावना से की गई है तो मामले को संसदीय विशेषाधिकार के उल्लंघन के रूप में लिया जा सकता है. समिति को लगता है कि प्रथमदृष्टया मामला बनता है तो मामले पर समिति द्वारा जांच और प्रतिवेदन देने के लिए विचार किया जाएगा. समिति को यह अधिकार है कि वह अपने आदेश को प्रभावी बनाने के लिए समय-समय पर नियमों की रूपरेखा तय कर सके. आमतौर पर समिति की बैठकें बंद कमरे में आयोजित की जाती हैं. 

आचार समिति की जांच में नियमों के उल्लंघन या अनैतिक आचरण में लिप्त पाए जाने पर दंड का भी प्रावधान है.

नियम 297

नियम 297 के मुताबिक जब भी यह पाया जाता है कि किसी सदस्य ने कोई अनैतिक आचरण या अन्य कदाचारपूर्ण कार्य किया है या नियमों का उल्लंघन किया है तो समिति एक या एक से अधिक दंड देने की सिफारिश कर सकती है. इन दंडों में निंदा, भर्त्सना, एक तय समय के लिए सदन से निलंबन और समिति द्वारा निर्धारित अन्य दंड शामिल हैं.

नियम 298

वहीं 298 के तहत, समिति का प्रतिवेदन समिति के अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में किसी भी सदस्य द्वारा सभा में प्रस्तुत किया जा सकता है.

नियम 299 और 301

जबकि नियम 299 के तहत प्रतिवेदन पर विचार किया जाता है और नियम 301 के तहत प्रतिवेदन पर विचार किए जाने का प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद समिति का अध्यक्ष या सदस्य यह प्रस्ताव कर सकता है कि वह संशोधनों, सिफारिशों से सहमत हैं या असहमत.

नियम 302 और 303

नियम 302 के तहत सभापति, समिति या सभा के सदस्यों के अनैतिक या कदाचार के मामलों की जांच से संबंधित प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए निर्देश जारी कर सकता है. इसके साथ ही नियम 303 के मुताबिक नैतिक और अन्य कदाचार के प्रश्न को समिति को भेजने के संबंध में सभापति को अधिकार प्राप्त है .

आचार समिति के जरिये दंड किसको और कब-कब मिले?

संसदीय इतिहास में ऐसे कई मामले आए हैं जब आचार समिति ने सांसदों को निष्कासित करने का निर्णय किया. 1951 में लोकसभा से एचडी मुद्गल को संसद में पक्ष लेने के लिए पैसे लेने के मामले में निष्कासित किया गया था. वहीं 1976 में सुब्रमण्यम स्वामी को राज्यसभा से तब निष्कासित किया गया जब सदन की एक समिति ने उनका आचरण सदन की मर्यादा के अनुरूप नहीं पाया. इसके अलावा नवंबर, 1977 में इंदिरा गांधी को सदन में कुछ खास सवालों के जवाब देने के लिए सूचनाएं एकत्रित कर रहे अधिकारियों के लिए बाधा पैदा करने, धमकाने और उनके खिलाफ झूठे मामले दर्ज कराने के लिए लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया. हालांकि, दिसंबर, 1978 में सदन में एक प्रस्ताव लाकर उनके निष्कासन को निरस्त कर दिया गया. दिसंबर, 2005 में पैसा लेकर सवाल पूछने के मामले में सांसदों को आश्रित कर दिया गया था. वहीं वर्ष 2016 में राज्यसभा की आचार समिति ने उद्योगपति विजय माल्या को निष्कासित करने का निर्णय किया.

राज्यसभा की आचार समिति ना केवल सांसदों के आचरण, अनैतिक व्यवहार और नियमों के उल्लंघन की जांच करती है बल्कि अपने कामकाज के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने का काम भी करती है ताकि राज्यसभा के कामकाज को अधिक प्रभावी बनाया जा सके.

सौजन्य : राज्यसभा  यूट्यूब चैनल

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