शुंग वंश के बारे में जानें – 185 ई.पू. से 75 ई.पू.

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अंतिम मौर्य राजा बृहद्रथ को उसी के ब्राहमण सेनापति पुष्यमित्र ने मारकर शुंग वंश (Shunga / Sunga Dynasty) की स्थापना की. बाण ने “हर्ष-चरित” में लिखा है कि अंतिम मौर्य सम्राट् बृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र ने सेना के एक प्रदर्शन का आयोजन किया और राजा को इस पर्दर्शन को देखने के लिए आमंत्रित किया. उस समय उपयुक्त अवसर समझ कर उसने राजा का वध कर दिया. चलिए जानते हैं शुंग वंश के विषय में in Hindi.

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शुंग वंश – राज्य विस्तार और शासन

“मालविकाग्निमित्र”, “दिव्यावदान” व तारानाथ के अनुसार पुष्यमित्र का राज्य नर्मदा तक फैला हुआ था. पाटलिपुत्र. अयोध्या और विदिशा उसके राज्य के मुख्य नगर थे. विदिशा में पुष्यमित्र ने अपने पुत्र अग्निमित्र को अपना प्रतिनिधि शासक नियुक्त किया. अयोध्या के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि पुष्यमित्र ने दो अश्वमेध यज्ञ किये. वहाँ उसने धनदेव नामक व्यक्ति को शासक नियुक्त किया. नर्मदा नदी के तट पर अग्निमित्र की महादेवी धारिणी का भाई वीरसेन सीमा के दुर्ग का रक्षक नियुक्त किया गया था.

विदर्भ से युद्ध

“मालविकाग्निमित्र” नाटक से हमें पता चलता है कि विदर्भ में यज्ञसेन ने एक नए राज्य की नींव डाली थी. वह मौर्य राजा वृहद्रथ के सचित का साला था. इससे प्रकट होता है कि वह पुष्यमित्र के विरुद्ध था. पुष्यमित्र के पुत्र अग्निमित्र ने यज्ञसेन के चचेरे भाई माधवसेन से मिलकर एक षड्यंत्र रचा. इसलिए यज्ञसेन के अन्तपाल ने माधाव्सें को पकड़ लिया. इस पर अग्निमित्र ने वीरसेन को यज्ञसेन के विरुद्ध भेजा. वीरसेन ने यज्ञसेन को हरा दिया. इस पर यज्ञसेन को अपने राज्य का कुछ भाग माधवसेन को देना पड़ा. इस प्रकार विदर्भ राज्य को पुष्यमित्र का आधिपत्य स्वीकार करना पड़ा.

यूनानियों का आक्रमण

पतंजली के महाभाष्य से दो बातों का हमें पता चलता है –

  1. पतंजलि ने स्वयं पुष्यमित्र के लिए अश्वमेध यज्ञ कराये
  2. उस समय एक आक्रमण में यूनानियों ने चित्तौड़ के निकट मध्यमिका नगरी और अवध में साकेत का घेरा डाला, किन्तु पुष्यमित्र ने उन्हें पराजित किया.

“गार्गी संहिता” के युगपुराण में भी लिखा है कि दुष्य, पराक्रमी यवनों ने साकेत, पंचाल और मथुरा को जीत लिया. संभवतः यह आक्रमण उस समय हुआ जब पुष्यमित्र मौर्य राजा का सेनापति था. संभव है कि इस युद्ध में विजयी होकर ही पुष्यमित्र बृहद्रथ को मारकर राजा बना हो. कालिदास ने यूनानियों के एक दूसरे आक्रमण का वर्णन अपने नाटक “मालविकाग्निमित्र” में किया है. यह युद्ध संभवतः पंजाब में सिंध नदी के तट पर हुआ और पुष्यमित्र के पोते और अग्निमित्र के पुत्र वसुमित्र ने इस युद्ध में यूनानियों को हराया. शायद यह युद्ध इस कारण हुआ हुआ हो कि यूनानियों ने अश्वमेध के घोड़े को पकड़ लिया हो. सभवतः यह यूनानी आक्रमणकारी, जिसने पुष्यमित्र के समय में आक्रमण किया, डिमेट्रियस था. इस प्रकार हम देखते हैं कि पुष्यमित्र ने यूनानियों से कुछ समय के लिए भारत की रक्षा की. यूनानियों को पराजित करके ही संभवतः पुष्यमित्र ने वे अश्वमेध यज्ञ किये जिनका उल्लेख घनदेव के अयोध्या अभिलेख में है.

पुष्यमित्र की धार्मिक नीति

बौद्ध धर्म-ग्रन्थों में लिखा है कि पुष्यमित्र ब्राह्मण धर्म का कट्टर समर्थक था. उसने बौद्धों के साथ अत्याचार किया. कहते हैं कि उसने पाटलिपुत्र के प्रसिद्ध बैद्ध मठ कुक्कुटाराम को, जिसे अशोक ने बनवाया था, नष्ट करने की योजना बनाई. उसने पूर्वी पंजाब में शाकल के बौद्ध केंद्र को भी नष्ट करने का प्रयत्न किया. “दिव्यावदान” में लिखा है कि उसने प्रत्येक बौद्ध भिक्षु के सिर के लिए 100 दीनार देने की घोषणा की. परन्तु यह वृत्तान्त ठीक नहीं प्रतीत होता. भारहुत के अभिलेख से ज्ञात होता है कि इस समय बहुत-से दानियों ने तोरण आदि के लिए स्वेच्छा से दान दिया. यदि पुष्यमित्र की नीति बौद्धों पर सख्ती करने की होती तो वह अवश्य विदिशा के राज्यपाल को आज्ञा देता कि वह बौद्धों को इमारतें बनाने की आज्ञा न दे. संभव है कि कुछ बौद्धों ने पुष्यमित्र का विरोध किया हो और राजनीतिक कारणों से पुष्यमित्र उनके साथ सख्ती का बर्ताव किया है.

पुष्यमित्र के उत्तराधिकारी

पुराणों में पुष्यमित्र के बाद नौ अन्य शुंग राजाओं के नाम लिखे हैं. अग्निमित्र का नाम कुछ सिक्कों पर खुदा है जो रूहेलखंड में मिले हैं. वसुमित्र का भी नाम “मालविकाग्निमित्र” में आता है. संभवतः हेलियोडोरस के बेस-नगर के गरुड़ध्वज अभिलेख में भागवत नाम के राजा उल्लेख है. संभव है वह भी शुंग वंश का रहा हो. इस वंश का अंतिम राजा देवभूति था जिसे उसके अमात्य वसुदेव ने मारकर 75 ई.पू. के लगभग काण्व वंश की नींव डाली.

काण्व वंश

काण्व वंश में चार राजा हुए – वसुदेव, भूमिमित्र, नारायण और सुशर्मा जिन्होंने लगभग 45 वर्ष राज्य किया.  काण्व वंश  उपरान्त मगध में कौन राजा हुए, यह कहना कठिन है. पाटलिपुत्र न कुछ काल के लिए मित्र वंश के राजाओं ने राज्य किया. उनके बाद शक-मुरुंडो का इस प्रदेश पर अधिकार हो . अंत में नाग वंश और गुप्त वंश के राजाओं ने शक-मुरुंडों का नाश किया.

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