भारतीय चित्रकला के प्रकार, अंग और प्रयोजन

Dr. SajivaCulture, History4 Comments

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वात्सायन ने अपने ग्रन्थ कामसूत्र में 64 कलाओं की गणना की है जिनमें चित्रकला का भी स्थान है. चित्रकला का महत्त्वपूर्ण अंग है चित्र. चलिए जानते हैं हर एक काल (प्रागैतिहासिक, आद्यैतिहासिक, ऐतिहासिक, मध्यकाल, साहित्यिक) भारतीय चित्रकला क्या स्थान रहा. साथ-साथ यह भी जानेंगे कि भारतीय चित्रकला के कितने प्रकार और अंग हैं एवं इनका प्रयोजन कहाँ-कहाँ किस रूप में होता है.

विष्णुधर्मोत्तर पुराण में चित्र सकल कलाओं में श्रेष्ठ कहा गया है और उसे धर्म, अर्थ, काम आतता मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का प्रदाता भी माना गया है –

कलानांं प्रवरंं चित्रं धर्मकामार्थमोक्षकम्

अतएव चित्र का इससे बड़ा उद्देश्य और इससे बड़ी प्रशंसा और कौन हो सकती है? समरांगणसूत्रधार (भारतीय वास्तुशास्त्र से सम्बन्धित ज्ञानकोशीय ग्रन्थ) में भी लगभग इसी प्रकार से चित्र का वर्णन किया गया है – “चित्रं हि सर्वशिल्पानां मुखं लोकस्य च प्रियम्”.

प्रागैतिहासिक काल

भारत में चित्रकला की परम्परा बड़ी पुराणी है. प्रागैतिहासिक काल से ही भारत में चित्रकला के अस्तित्व के साक्ष्य पाए गये हैं. मनुष्य जब आदिम अवस्था में था और गुहाजीवन अथवा वन्य जीवन व्यतीत कर रहा था, तभी से उसमें चित्रकला के प्रति रुझान था. उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की अनेक प्रागैतिहासिक गुफाओं से तत्कालीन मनुष्यों के बनाए चित्रांकन पाए गये हैं. उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर जिले के अंतर्गत तथा मध्यप्रदेश में पचमढ़ी, सिंहनपुर, रायसेन, होशंगाबाद आदि अनेक स्थानों से गुफाओं अथवा शिलाओं पर अंकित चित्र पाए गये हैं. होशंगाबाद के निकट भीमबेटका नामक स्थान पर लगभग 600 चित्रित गुफाएँ मिली हैं.

भारतीय चित्रकला

ये चित्र विषय, शैली तथा सामग्री की दृष्टि से तत्कालीन मानव-जीवन के प्रतीक हैं. इनके मुख्य विषय वन्य पशुओं का आखेट, आपस में युद्ध करते हुए मनुष्य अथवा उनके धार्मिक अनुष्ठान या पूजा की आकृतियाँ हैं. ये चित्र प्रायः धातुरंगों (गेरू, रामरज आदि) से तीन प्रकार से अंकित किये गये थे –

  1. केवल दो-तीन रेखाओं द्वारा बनाई गई आकृतियाँ जिनमें चौड़ाई या मोटाई नहीं है.
  2. चौड़ी आकृतियाँ जिन्हें रेखाओं से भरा गया है तथा
  3. चौड़ी आकृतियाँ जिनका सम्पूर्ण अथवा कुछ भाग पूरी तरह रंग से भरा है और शेष भाग में रेखाएँ हैं. लाल रंग से बनाई जाने के कारण स्थानीय लोग इन्हें “रक्त की पुतरियाँ” (रक्त-पुत्तलिका) कहते हैं.

आद्यैतिहासिक काल

भारतीय चित्रकला की परम्परा का अगला चरण आद्यैतिहासिकाल है. इस काल में सिन्धु घाटी की उपत्यका में एक अति विकसित सभ्यता विद्यमान थी. इस सभ्यता के विविधपक्षी अवशेष प्रारम्भ में हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो से मिले थे. अब तक इस सभ्यता के अवशेष रंगपुर, लोथल, अतरंजीखेड़ा तथा आलमगीरपुर आदि अनेक स्थानों से प्राप्त हो चुके हैं. इस सभ्यता में अन्य सामग्री के साथ मिट्टी के बर्तनों के अंसख्य टुकड़े भी मिले हैं जिन पर काले या सफ़ेद रंगों के चित्रांकन पाए गये हैं. ये बर्तन पूजा-अनुष्ठान में तो काम आते ही थे, नित्य-प्रति के उपयोग में भी लाये जाते थे और मृतक के साथ दफनाये भी जाते थे. इससे स्पष्ट होता है कि उस काल के मनुष्य कितने कलाप्रेमी थे. कला उनके जन्म-मरण की संगिनी थी. आद्यैतिहासिक पात्रों के चित्रांकन में ज्यामितिक आकृतियाँ जैसे सरल टेढ़ी रेखाएँ, कोण, वृत्त आदि विशेष हैं. इनके अतिरिक्त फूल-पत्तियाँ, पशु-पक्षी तथा मानव आकृतियाँ इ हैं.

ऐतिहासिक काल

भारतीय ऐतिहासिक काल की चित्रकला आज संसार भर में प्रसिद्ध है. इस प्रसिद्धि का कारण अजंता की चित्रकला है जिस पर यहाँ विस्तार से प्रकाश डाला जाएगा. द्वितीय शताब्दी ई.पू. से भारतीय चित्रकला के अवशेष हमें अजन्ता की गुफाओं में मिलने लगते हैं जहाँ पर परम्परा का क्रमिक विकास सातवीं शताब्दी ई. तक होता रहा. अजन्ता के अतिरिक्त बाघ, बादामी, औरंगाबाद, सित्तन्नवासल आदि स्थानों से भी भारतीय चित्रकला के साक्ष्य पाए जा चुके हैं.

मध्यकाल

मध्यकाल से भारत में चित्रकला लघुचित्रों में सिमट गई. पुर्स्त्कों के पृष्ठों पर भाँति-भाँति के विषयों तथा कथानकों का चित्रण किया जाने लगा. आगे चलकर लघु चित्रांकन (मिनिएचर पेंटिग) के रूप में चित्रकला की अनेक शैलियाँ लोकप्रिय हो गयीं जिनमें पहाड़ी, शैली, राजस्थान शैली तथा मुगुल शैली विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. पिछले सौ-सवा सौ सालों से जब से हमें अजंता की चित्रकला की जानकारी मिली है भारतीय चित्रकला का पुनर्विकास हुआ है. बंगाल के कई चित्रकारों ने अपनी पुरानी परम्परा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है. इनमें अवनींद्रनाथ टैगोर, असितकुमार हलदार, यामिनीराय, राजा रविवर्मा, फिदाहुसेन आदि के नाम उल्लेखनीय हैं. इस प्रकार  भारतीय चित्रकला की परम्परा अत्यंत प्राचीन काल से आज तक अक्षुण्ण रही है.

साहित्यिक साक्ष्य

भारतीय चित्रकला के प्रकांड विद्वान् रायकृष्णदास के अनुसार ऋग्वेद (1/145) में चमड़े पर बने अग्नि के चित्र की चर्चा है. पाणिनि के द्वारा स्नाघ राज्यों के लक्षणों की चर्चा से भी अनेक पशुई-पक्षी, पुष्प अथवा नदी-पर्वत आदि के चिन्हों को अंकित किये जाने का संकेत मिलता है. बौद्धकाल अर्थात् छठी शताब्दी ई.पू. से चित्र और चित्रकला के स्पष्ट उल्लेख मिलने लते हैं. उस युग में चित्रकला अत्यंत लोकप्रिय थी. इसका आभास बौद्ध भिक्षुओं को दिए गये उस आदेश से मिलता है जिसमें उन्हें चित्रकला से विमुख रहने को कहा गया था. विनयपिटक तथा थेरी-थेरी गाथा में चित्रों का उल्लेख मिलता है. महाउम्म्ग्ग जातक में चित्रशालाओं तथा चित्र-रचना के विविध निर्देश प्राप्त होते हैं. कालिदास के रघुवंश में उजड़ी अयोध्यापुरी का वर्णन है जिसकी भित्तियों पर बने चित्रों में पद्म-सरोवर के क्रीड़ा करते हुए हाथियों का मनोहर अंकन था. मुद्राराक्षस में चित्रपटों का तथा कामसूत्र में चित्रकला की सामग्री का उल्लेख है. इसके अतिरिक्त विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अंतर्गत चित्र-सूत्र नामक अध्याय में तथा सोमेश्वरकृत मानसोल्लास के अंतर्गत अभिलषितार्थ चिंतामणि नामक अध्याय में चित्र, चित्रांकन तथा चित्र-सामग्री का विस्तृत वर्णन है. भारतीय चित्रकला के स्फुट साक्ष्य महावंस, हर्षचरित, कादम्बरी, उत्तररामचरित आदि ग्रन्थों में भी मिलते हैं. जैन ग्रन्थों में चित्रों के अनेक रूप पाए गये हैं.

भारतीय चित्रकला के प्रकार

इसी एक तल अथवा सतह पर पानी, तेल अथवा चर्बी में घोले गये अथवा सूखे रंगों से किसी आकृति के अंकन का चित्रण और उस अंकित स्वरूप को चित्र कहते हैं. ऐसा चित्रण भवन की भित्ति, प्रस्तर-फलक, काष्ठ, मिट्टी के बर्तन, चर्मपट, तालपत्र अथवा वस्त्र या कागज़ पर किया जा सकता है. भारतीय चित्रकला मोटे तौर पर चार प्रकार की जा रही है –

  1. भित्ति चित्र – अजंता, बाघ, बादामी तथा सित्तन्नवासल की गुहा-भित्तियों पर इसके उदाहरण मिले हैं.
  2. चित्रपट – चमड़े अथवा कपडे के टुकड़ों पर की गई चित्रकारी जिसे लटकाया जाता था.
  3. चित्र फलक – पत्थर, धातु अथवा लकड़ी के टुकड़ों पर किया गया चित्रांकन.
  4. लघु चित्र – बाद में पुस्तकों के पृष्ठों पर अथवा छोटे-छोटे कागज़ या वस्त्रों के टुकड़ों पर बनाए गये चित्र उन्हें प्रायः मिनिएचर पेंटिग कहा जाता है.

चित्रांकन के प्रयोजन

प्रागैतिहासिक तथा ऐतिहासिक चित्रों और साहित्यिक विवरणों के आधार पर भारतीय चित्रांकन के मुख्य प्रयोजन निम्नलिखित बताये जा सकते हैं –

  1. धार्मिक अभिव्यक्ति, पूजा-पाठ आदि
  2. ऐतिहासिक दृश्यों का संरक्षण
  3. जीवन की प्रमुख घटनाओं का संरक्षण
  4. मृत व्यक्तियों की आकृतियों का संरक्षण
  5. रसों का उद्यीपन और प्रेमाभिव्यक्ति
  6. भवनों, राजमहलों तथा मंदिरों का अलंकरण

चित्र के अंग

आम्सूत्र के लब्ध प्रतिष्ठ टीकाकार यशोधर ने चित्र के अंगों का निम्नलिखित वर्णन किया है –

रुपभेदा: प्रमाणानि लावण्यं भावयोजनम् |

सादृश्यं वर्णिकाभंग इति चित्रं षडंगकम् ||

अर्थात् रुपभेद, प्रमाण, लावनी, भावयोजना, सादृश्य तथा वर्णिकाभंग ये चित्र के छह अंग हैं.

रूपभेद – भिन्न-भिन्न चित्रों में भिन्न-भिन्न रुप.

प्रमाण – अंग-प्रत्यंग की सही नाप तथा सही अनुपात.

भावयोजना – करुणा, शांति, हास्य, प्रसन्नता आदि भावों का यथास्थान अंकन.

लावण्य – सौन्दर्य या सुन्दरता.

सादृश्य – जिस व्यक्ति अथवा वस्तु का चित्र हो उसी की भाँति चित्र का दिखाई देना.

वर्णिकाभंग – यथास्थान समुचित रंग भरना.

लावण्य कला का प्राण है. भाव-योजना से चित्रकला काव्य के समान रसास्वादन कराती है. सादृश्य में निष्णात कलाकार के कौशल का मर्म छिपा है. इसी प्रकार वर्णिकाभंग में चित्रकार के रचना-चात्रुय पर संकेत है.

भारतीय चित्रकला के प्रमुख केंद्र

सन् 1824 ई. में जब से जनरल सर जेम्स ने अजन्ता की गुफाओं का पता लगाया और इन गुफाओं की भित्तियों पर अंकित भारतीय चित्रकला की जानकारी संसार को दी तब से भारत में अनेक स्थानों से चित्रकला के ऐसे ही उदाहरण पाए जा चुके हैं. इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बाघ, बादामी तथा सित्तन्नवासल हैं जिनमें छठी-सातवीं शताब्दी ई. के चित्रांकन हैं. अजन्ता में पाई गई कला द्वितीय शाताब्दी ई.पू. से लेकर सातवीं शताब्दी ई. तक की है.

अजंता की गुफाओं के चित्रांकन के विषय में जानने के लिए यह लिंक क्लिक करें > Ajanta Arts

कला के प्रकार के विषय में जानने के लिए आप यह पोस्ट पढ़ सकते हैं > कला के प्रकार

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4 Comments on “भारतीय चित्रकला के प्रकार, अंग और प्रयोजन”

  1. Very nice,, sir Aap bahut achha kr rhe ho,
    bhut accha lga ki abhi abi acche insaan h dunia mai…warna har koi paise kamane k peeche pda h …..jabki pta h sath kuch jaane wala nhi…..Jai Hind sir….aapko Salute….

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